मंगलवार, 6 जुलाई 2010

इस्लाम में कंडोम !



चौंकिए मत ! मुझे कह लेने दीजिये कि इस्लाम परिवार कल्याण की अनुमति देता है.यानी कंडोम का इस्तेमाल इस सिलसिले में प्रतिबंधित नहीं है.पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल की खूब परम्परा रही है.यह अज़्ल कंडोम का ही पर्याय है.अज़्ल यानी वीर्य का बाह्य स्खलन,रोक,गर्भ की सुरक्षा.मिश्र में एक बहुत ही प्राचीन विश्वविद्यालय है जिसकी मुस्लिम जगत में मान्य प्रतिष्ठा है जामा [जामिया ] अल अज़हर ,यहाँ के ख्यात इस्लामी चिन्तक शेख जादउल हक़ अली कहते हैं:
कुरआन की तमाम आयतों के गहरे अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसमें से ऐसी कोई आयत नहीं है जो गर्भ रोकने या बच्चों की संख्या को कम करने को हराम क़रार देती हो.

अन्यथा हरगिज़ न लें तो इस तरफ ध्यान दिलाने की गुस्ताखी करूँगा कि कहने का अर्थ कतई यह नहीं है कि भारत मे बढ़ती जनसंख्या के पीछे मुस्लिम समुदाय का योगदान खूब तर है.सच तो यह है, अब तक के तमाम सर्वे ने इस झूठ की कलई खोल दी है.जहां निरक्षरता है उस समाज में परिवार कल्याण को लेकर जाग्रति नहीं है.ऐसा मुस्लिम समेत अन्य समुदायों में भी देखने को मिलता है.बहुविवाह को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को भी अनगिनत शोध्य ने गलत साबित किया .बहुविवाह का मुस्लिमों की अपेक्षा आदिवासी समाज में अधिक चलन है.अब तो ढेरों हिन्दू भी कई शादियाँ कर रहे हैं. यह दीगर है कि इसके लिए इस्लाम का सहारा लेते हैं.खैर विषय से ज़रा इतर भाग रहे अपने घोड़े को यहीं विराम देता हूँ.
तो मैं कह रहा था कि मुस्लिम समाज में अक्सर धर्म को हर मर्ज़ की दवा बताये जाने की परम्परा है.लेकिन ऐसा कहने वाले खुद अपने धर्म के मूल स्वर या उसकी गूढ़ बातों से अनजान रहते हैं.मुल्लाओं के बतलाये मार्ग पर चलना ही तब इन्हें श्रेयस्कर लगता है.और इसका खामियाजा यह होता है कि मुस्लिम विरोधी शक्तियां सीधे इस्लाम पर ही आक्रमण करने लगती हैं.कुरआन की अपने अपने ढंग से समझने और अपने मुताबिक तोड़ मरोड़ कर आयतों के इस्तेमाल की कुपरम्परा रही है.ऐसा मुस्लिम विरोधी अक्सर करते हैं.और कभी कभी कई वर्गों में विभक्त मुस्लिम समाज के धर्म गुरुओं ने भी किया है.कईयों ने गहन अध्ययन मनन के बाद निष्कर्ष निकालने के सार्थक यास भी किये हैं.कुरआन और हदीस में किसी बात का समाधान न हो तो इस तरह के कोशिशों के लिए इज्तीहाद के परम्परा रही है.

यूँ तो हर समूह ने परिवार कल्याण के समर्थन और विरोध में कुरआन और हदीस का ही हवाला दिया है.इसके विरोध में प्राय यह कहा जाता है कि किसी जिव को जिंदा दर्गोर करना गुनाह है.कुरआन की कुछ आयतें :

अपनी औलाद को गरीबी के डर से क़त्ल न करो.हम तुम्हें रोज़ी देते हैं उन्हें भी देंगे.
[अल अनआम-६]

और जब जीवित गाडी गयी लडकी से पूछा जाएगा कि उसकी ह्त्या किस गुनाह के कारण की गयी.
[अत तक्वीर ८-9]

परिवार कल्याण के विरोध में कुछ लोग ऐसी ही आयतों को सामने रखते हैं.उन्हीं यह बखूबी ज़ेहन में रखना चाहिए कि इस्लाम से पूर्व समाज में लड़कियों को जिंदा ही ज़मीन में दफन करने की गलत परम्परा थी.मुफलिसी के कारण भी लोग संतानों को मार दिया करते थे.यह आयतें उस गलत चलन के विरोध में है.इस सिलसिले में अपन आगे और स्पष्ट करेंगे.लेकिन परिवार कल्याण के विरोधी जन इस बात को स्वीकार करते हैं कि अज़्ल या गर्भ निरोध यानी गर्भ धारण रोकने के विरुद्ध कुरआन में कोई स्पष्ट प्रतिबंध का ज़िक्र नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल का चलन था.और मुसलमान इस से अछूते न थे.और कुछ सहाबियों पैग़म्बर के समकालीन उनके शिष्यों ने ऐसा परिवार कल्याण यानी गर्भ रोकने के ध्येय से भी किया.इसकी जानकारी पैग़म्बर को भी थी लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना नहीं किया.जबकि उस समय कुरआन नाजिल हो रही थी बावजूद इसके प्रतिबंध का प्रश्न खड़ा नहीं हुआ.
कुछ हदीसों से:
एक सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने कहा कि रसूल अल्लाह के समय हम अज़्ल किया करते थे और कुरआन नाजिल हो रहा था.
[मुस्लिम,तिरमिज़ी,इब्न माजा]

आप आगे कहते हैं हवाला मुस्लिम हदीस कि रसूल अल्लाह को इस बात का पता चला तो उन्होंने हमें इस से मना नहीं फरमाया.
एक हदीस के सूत्रधार हज़रत सुफियान कहते हैं कि [जब कुरआन नाजिल हो रहा था ]यदि यह प्रतिबंधित होता तो कुरआन हमें रोक देता .

ताबायीन [सहाबियों के शिष्यों को कहा जाता है.] के समय भी अज़्ल का चलन रहा.और गर्भ धारण रोकने के लिए ऐसा किया जाता रहा.पैग़म्बर के देहावसान के काफी बाद तक ऐसी परम्परा रही.मुसलामानों के चार प्रमुख इमामों में से एक इमाम हज़रत मालिक ने भी अज़्ल को जायज़ क़रार दिया है.हाँ ! यह सही है कि पहले खलीफा हज़रत अबू बकर, हज़रत उम्र,हज़रत उस्मान बिन अफ्फान, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र आदी सहबियों और खलीफाओं ने अज़्ल को नापसंद ज़रूर किया है.लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि अज़्ल हराम है.
कईयों को शंका हो सकती है किअज्ल के बाद भी तो गर्भ जिसे ठहरना हो , आप रोक नहीं सकते.इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है जैसा कि मशहूर हदीस है कि पहले ऊँट को बाँध दो फिर अल्लाह पर भरोसा करो.यानी अपनी तरफ से बचाओ के उपाय अवश्य करो , नियति में जो लिखा है वो तो होंकर रहेगा,चिंता मत करें.लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि सुरक्षा न की जाय! अबू सईद से रिवायत है ,आपने कहा रसूल अल्लाह से पुछा गया तो आपने फरमाया : हर पानी से बच्चा पैदा नहीं होता और जब अल्लाह किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है तो उसे ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता .[मुस्लिम]
मुस्लिम,इब्न माजा,इब्न हम्बल. दारमी और इब्न शेबा जैसे हदीसों के जानकारों ने हवाले से लिखा है कि पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने गर्भ रोकने के लिए अज़्ल को बताया.
कशानी ने रसूल अल्लाह के हवाले से कहा कि आपने फरमाया औरतों से अज़्ल करो या न करो जब अल्लाह किसी को पैदा करना चाहता है तो वह उसे पैदा करेगा.

कुरआन की सूरत बक़रा की एक आयत का हवाला खूब दिया जाता है.
और स्त्री-विरोध के नाते.लेकिन इसका अर्थ इधर खुला.आयत है:
तुम्हारी बीवियां तुम्हारी खेतियाँ हैं बस अपने खेतों में जैसे चाहो, आओ.

इस आयत का अर्थ इमाम अबू हनीफा के हवाले अहकामुल कुरआन में इस तरह है :चाहो तो अज़्ल करो , चाहो तो अज़्ल न करो.
और हाँ इस सम्बन्ध में पत्नी की रज़ामंदी को वरीयता दी गयी है.अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूल ने फरमाया पत्नी की सहमती से ही अज़्ल किया जाय.
[अबू दाऊद, अबन माजा और हम्बल ]
एक और हदीस में आया है कि जब स्त्री स्तन पान करा रही हो यानी अपने बच्चे को यानी उसका बच्चा छोटा हो तब भी अज़्ल किया जाय.

गर्भ-निरोध उपाय के सम्बन्ध में अक्सर लोग तर्क देते हैं कि ऐसा करना हत्या के बराबर है.इस सम्बन्ध में कई हदीसें हैं.सिर्फ एकाध की मिसाल ही फिलवक्त पर्याप्त है.
हज़रत अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल अल्लाह से सहाबियों ने पूछा कि यहूदी तो अज़्ल को छोटा क़त्ल कहते हैं.तो अल्लाह के रसूल ने कहा ,वह झूठ बोलते हैं. [बेहक़ी,अबू दूद,इब्न हम्बल]

बेहक़ी और निसाई में भी दर्ज है कि हज़रत अली ने भी इसे हत्या मानने से इनकार कियाहै.जब तक कि यह सात मंजिल तय न कर ले.हज़रत अली ने सूरत अल मोमीनून का भी ज़िक्र किया.

मैं इस्लाम का मान्य विश्लेषक या विद्वान् नहीं हूँ.बस जो अध्ययन में सामने आया उसी के हवाले से अपनी बात रखने की कोशिश की है,कहाँ तक सफल रहा हूँ..यह निर्णय पाठक कर सकते हैं.वैचारिक मतभेद भी संभव है, लेकिन इतनी गुजारिश ज़रूर है कि तर्कों के साथ आप अपनी बात रखें.कुतर्क से बात का बतनगड़ तो हो सकता है कोई सार्थक संवाद कतई नहीं.

और हाँ यह भी सूचना बता देना अहम समझता हूँ कि तुर्की, मिश्र,इराक,पाकिस्तान, बँगला देश,इंडोनेशिया समेत सोवियत रूस से विभक्त आधा दर्जन मुल्कों सहित ढेरों मुस्लिम देशों में परिवार कल्याण योजना को स्वीकृति हासिल है.
और अपने मुल्क में भी पढ़ा लिखा मुस्लिम तबक़ा इसका पालन करता है.जैसे जैसे शिक्षा का उजास फैलेगा लोग कुरआन,हदीस और विज्ञान के प्रकाश में दीन और दुनिया को देखेंगे .


Family Planning in the Legacy of Islam''Women do what they want'': Islam and permanent contraception in Northern Tanzania [An article from: Social Science & Medicine] Family planning among Muslims in India: A study of the reproductive behaviour of Muslims in an urban setting

30 comments:

दीनबन्धु ने कहा…

शहरोज़ बाबू मान गये कि कलम के पक्के हो भावनाओं को निचोड़ना जानते हो। कुछ दिन पहले आत्महत्या से बचने का पमाड़ा फैला कर सहानुभूति बटोर रहे थे शायद पैसा भी बटोरा होगा,उससे पहले मनीषा नारायण और मुनव्वर सुल्ताना से प्रभावित होने का ड्रामा कर रहे थे आजकल इस्लाम कबड्डी खेल रहे हो कुछ वैसे ही अंदाज में जैसे सुरेश चिपलूणकर हिंदू कबड्डी खेलता है। यदि सचमुच कुरान के जानकार हो तो बस इतना बता दो कि भारत काफ़िर मुल्क है या नहीं??? जिस पर आगे बात करी जा सके।

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

इस्लाम में कंडोम जैसे उन्वान देकर आखिर आप कहना क्या चाहते हैं.जिस तरह आपने अपनी दलील दी है आखिर कहाँ से उठा लाये ये सब क़दीम बातें.अरे भाई कुछ काम की भी बात करो.

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

.

इस्लाम को कितन जानते हैं..और बिना जाने फतवा देने की जुर्रत कैसे.....

shabd ने कहा…

हमें नहीं लगता कि आपकी बातें पढ़े लिखे भी समझ पायें.

Voice Of The People ने कहा…

इस्लाम मैं अज्ल रिजक के खौफ से मना है, क्योंकि रिजक देने वाला अल्लाह है. इसमें बीवी की रजामंदी ज़रूरी है. इस्लाम मैं मुस्तकिल तौर पे (नसबंदी) औलाद का होना रोकना मना है.
दीन बंधू साहब किसी पे जाती हमला मुनासिब नहीं. मुल्क ना काफ़िर होता है, ना मुशरिक और ना मुस्लिम. अगर आप बुतपरस्त हैं तो इस्लाम इसकी सही नहीं कहता और अगर आप मुसलमान हैं तो बुतपरस्ती इस को सही नहीं मानती. लेकिन दोनों एक दुसरे के जज्बातों की, इज्ज़त तो कर सकते हैं ना..?

shabd ने कहा…

@deenbandhu

bandhu kaise deen ke bandhu ho.kya batane ka kasht karenge ki kitne logon ne sharoj ji ki aarthik madad ki bhai sabut aur prmaan chahiye.

aapko unki post aur unke sabhi blog thik se padhna hoga tabhi aap unhain jaan paayenge ya unse milna hoga.

ye kaisi kuntha hai aapki.....

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

हम आपको कई बार कह चुके की मज़हबी मामले में ज़रा सूझ बूझ कर लिखा करें

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

अल्लाह आपको सद्बुद्धि दे

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

yahan ek baddeenbhai bhi dekhai de rahe hain..

नईम ने कहा…

काहे का सोचना.दोस्तों बड़े भाइयों शहरोज़ साहब ने तो लिखा है की वो कोई आलिम नहीं हैं.सभी को अपनी बात रखने का हक है लेकिन.कायदे से.

नईम ने कहा…

ये DEEN बंधू कौन हैं !!


JANKAR KHUSHI HAI KI BANDHU JI DESH K HAIN APNE AAUR EK URDU BLOG SE JUDE HUYE HAIN.

Shah Nawaz ने कहा…

किसी भी मुद्दे पर कोई फतवा तो केवल आलिम ही दे सकता है....... बात अगर विचार की जाए तो मेरे विचार से बच्चों को पालने की चिंता से परिवार नियोजन के तरीके इस्तेमाल करना बेहद गलत है. अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि (अर्थ की व्याख्या) "रोज़ी का ज़िम्मेदार तो वह है". हाँ किसी परेशानी अथवा बच्चों की उम्र में अंतर के लिए परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

वैसे कंडोम भी इसकी सौ फीसदी गारंटी नहीं देता कि उसके इस्तेमाल से बच्चे पैदा नहीं होंगे.

सहसपुरिया ने कहा…

आपने अपने नज़रिए से बात कही है,
मेरे ख़याल से इस मुद्दे पर आलिमो की राय भी ली जाए तो अच्छा होगा. इस बारे में कई बार बहस भी हो चुकी है. अज़हर यूनिवर्सिटी के आलिमो ने इस बारे में बहुत खोज बीन की है.
सभी से गुज़ारिश है इस मसले पर तर्क से बात करें. शहरोज़ साहब की बात को समझ कर ही कॉमेंट दें.

आवेश ने कहा…

@दीनबंधु जी ,सादर अभिवादन ,आपके कमेन्ट से एक बात तो साबित हो गयी न आप दिन है न ही बन्धु कहे जाने लायक है,फिर भी आपको धन्यवाद कि आपने माना शहरोज भावनाओं को निचोड़ना जानते हैं ,संभवतः इसीलिए आप इतने लाल पीले हो रहे हैं ,जहाँ तक आत्महत्या से बचने को लेकर पैसा बटोरने की बात है ,मुझे यकीन है आप मरेंगे तो शायद आपको चादर भी नसीब न हो ,क्यूंकि मुझे नहीं लगता जो शहरोज जैसे खुद्दार इंसान के सम्बंध में ऐसा बोल सकता है उसका कोई अपना होगा |और हाँ डिब्बी जी आपका खर्चा चलता है क्या भारत के काफिर होने न होने से ?क्यूँ बताएं ,नहीं बताएँगे |जाइए डुगडुगी पिटिए कि हिंदुस्तान खतरे में है |शहरोज बोलेंगे और निर्भीकता से बोलेंगे |

नीरज जाट जी ने कहा…

अब तो ढेरों हिन्दु भी कई शादियां कर रहे हैं।
आप कहना क्या चाहते हैं। अरे, आपको ना तो इस्लाम का पता, ना ही हिन्दु का। चले हैं बुद्धिजीवी बनने।

राकेश पाठक ने कहा…

Din bandhu ji
pahle poori tahrir to padhte.....comments se aisa lag raha hai ki koi purani abdharnayen aapne sahroz ji ke bare me bana rakhi hai usi aadhar par bina padhe hi comments likh diya...kuch to akal lagaya hota........asise sach kahu to bebkuphi ka koi paimana nahi hota.....aur rahi sahroz ji ki baat to wo kuch alag likhte rahe hai....khari-khari bhi...itni himmat to hai likhen ki.....

राकेश पाठक ने कहा…

bhaiya Isalam par kuch bhi likhne se pahle himmat honi chahiye....aapne wo himmat dikhayi.dhanyad..
Par bhaiya agar aapne ye himat naam kamane ke liye dikhayi hai to mai ise thik nahi manta....lekin agar aap ise ek budhjiwi ki tarah dharm ka darpan dikhya hai to thik hai .... aapke samrthan me kitne haath uthte hai ab ye dekhna hai ..........

khalid a ने कहा…

dinbandhu ji aap ko kisi par pasnral cammenat nahi karna chahiye ..... saroj ji ne is mude par ke behesh ki surwat ki hai aur is aap aur baat honi chahiye ......kuch islamik jankaro ki bhi raye ki jarurat hai

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

मानवहितकारी विषयों पर सार्थक विमर्श सदैव होते रहने चाहिएं। इस प्रकार के विमर्श के उपरांत ही सही नतीजे प्राप्‍त होते हैं। इन्‍हें जाति इत्‍यादि के बंधनों में बांधकर गरीब नहीं बनाना चाहिए।

Alam ने कहा…

अब देखिये यहाँ , काम की और एक अच्छी बात पर जिसमे मानवता का हित है, ज्यादातर मुस्लिम पढ़े लिखों की कैसी फुकी .आप खुद देख लीजिये , यही देश के असली दुश्मन है .

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

कन्या भ्रूण-हत्या
आज गूगल में देख रहा था कि हिंदी दुनिया में क्या चल रहा है ?
इसी दरमियान इस लेख पर नज़र पड़ गयी और मैं इसे उठा लाया आपके लिए,
http://vedquran.blogspot.com/2010/07/islam-is-saviour-of-girlchild.html

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

शहरोज़ भाई ने अच्छी जानकारी दी . ये बात सही है कि इस्लाम में नसबंदी करना हरम है और परिवार कल्याण वाजिब है . परिवार का कल्याण होता है कुरआन पाक कि तालीम पर चलने से . वक्ती ज़रूरत के तहत आदमी अज़ल कर सकता है . लेकिन आजकल तो ज़िनाकारी / व्यभिचार के लिए बिक रहे है कंडोम . लोग ज़कात देने लगें तो फिर परिवार का पूरा ही कल्याण हो जायेगा . शहरोज़ जैसे मोमिन को अगर आज एक मुशरिक ताना दे रहा है तो इसका वबाल ज़कात न देने वालों पर पड़ना तय है . लेकिन जल्द ही हरेक मुशरिक तौबा करेगा और अपने मालिक को पहचानेगा , ऐसी हमें उम्मीद है . मुस्लिम दुश्मन तुर्क अगर इस्लाम के झंडाबरदार हो सकते हैं तो फिर हिन्दू कब तक सच को झुटला पाएंगे ?

HAKEEM YUNUS KHAN ने कहा…

...हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है।

सुज्ञ ने कहा…

समझ नहिं आया दिनबन्धु चाह्ते क्या है?
जरा खुलकर कहो।

Rangnath Singh ने कहा…

इस मामले में हम क्या कहें। आप लोग जो कहें वो हमारे लिए नई जानकारी होगी।

प्रवीण शाह ने कहा…

.
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.
एक वाकई ज्वलंत मुद्दा उठाया है भाई आपने...
पर कुछ अजीब सा भी लगता है...क्या हर दुनियावी मुद्दे के लिये दीन से हल या जवाब मिलेगा ?

कुछ ऐसे ही सवाल मैंने भी उठायें हैं यहाँ पर...असली जि्दगी से !
'उस' का गुनहगार तो जब बनूंगा तब देखी जायेगी पर अपने बच्चों का गुनहगार नहीं बन सकता मैं अभी से !

आभार!


...

सत्य गौतम ने कहा…

जय भीम! दीनबँधु भी उसी स्वर्णवादी मानसिकता का है जो वंचितो को सदैव बदनाम करने में लगे रहते है शहरोज जी जिस तरह आपको एक दानी स्वर्ण द्वारा छोटी सी सहायता करके उसे सबको बताया गया वह भी इसी मानसिकता का परिचायक है यह इन स्वर्णो की हजारो वर्ष पुरानी सोच है जो आज तक नही बदली

दीनबन्धु ने कहा…

दीनबंधु सवर्ण है,पूर्वाग्रही है,हजारों साल से इसकी सोच नहीं बदली है,आवेश से लेकर जितने भी लोग ऐसे हैं जो ये मानते हैं कि मुझे मरने के बाद चादर भी नसीब न होगी तो उनके लिये कि नंगा आया था नंगा जाउंगा तुम लोग चादर साथ ले जाना साथ में चड्ढी और बनियान भी। शहरोज के लिये जो लिखा उस पर आप सिर्फ़ अपना नजरिया दे रहे हो और मैं अपना, कोई दिक्कत है??वैसे तो आप में से एक भी टिप्पणीकार साहस नहीं रखता कि सच बात पर बहस कर सके या अपना विचार रख सके यदि साहस है तो
मुझ जाति के बिहारी चमार के पत्रा पर पधार कर कुरान शरीफ़ से जन्मे उस सवाल का उत्तर दे देना जिसे देख कर ही गुफ़रान सिद्दकी जैसे लोग मुंह छिपा कर भाग गये और आज तक न आए।
शहरोज जी ने खंडित संभोग को जिस तरह से कंडोम से जबरन चिपकाने की बात रखी है वह पिष्टपेषण मात्र है। जो कंडोम व्यवहार करते हैं वे जानते हैं कि कंडोम प्रयोग के दौरान पुरुष की मानसिक स्थिति और अज़्ल(खंडित सम्भोग) के दौरान बिलकुल भिन्न-भिन्न स्थितियां रहती हैं अज्ल में पूर्ण संतुष्टि नहीं रहती जबकि कंडोम लगभग उस स्थिति तक ले जाता है,कई स्त्रियां कंडोम के प्रयोग को साफ़ मना कर देती हैं जबकि स्त्री की रजामंदी की भी बात करी जा रही है। जो टिप्पणीकार साहस करके मेरे पीछे आ सकें उन्हें यहां से बाहर भी दुनिया दिखेगी। विकार ग्रस्त सोच है जो अपनी मनमानी से इस्लाम की व्याख्या करके जबरन श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास कर रही है।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html

रंजना ने कहा…

आपका यह पुनीत प्रयास सराहनीय वन्दनीय है....
शत प्रतिशत सहमत हूँ आपके विचारों से..
दिग्भ्रमिता की यह स्थिति सभी धर्मो पंथों के अनुयायियों बीच है...और इसका समाधान निस्संदेह शिक्षा तथा जागरूकता ही है...

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