सोमवार, 8 मार्च 2010

ज़रुरत मानसिकता बदलने की

हर तरफ जय महिला जय महिला..का शोर है.....मेरी महज़ इतनी सी इल्तिजा है कि सिर्फ  कविता लिखना या शोर करना हम सबका न हो मक़सद..अपनी कोशिश हो कि सूरत बदलनी चाहिए.बहुत पहले लिखी एक कविता अपने संकलन उर्फ़ इतिहास से आप  सभी के लिए...उन अनाम लड़कियों के नाम जो आज भी ज़िन्दगी के लिए सरगर्दां हैं:

तुम से जुदा होते लगा था
















तुम से जुदा होते लगा था :
ख़ाक हो जाएँ वे सभी आँखें
जो तकती हैं हमें
भूखे भेड़िये की तरह

समय के ताप से
चंद की उस नर्म रात में.

तुम से जुदा होते लगा था:
कर दूं बेनक़ाब उन तमाम चेहरों को
जो ओढ़ लेते हैं शराफ़त 
झक्क सफ़ेद कुरते में
भूल कर आवारगियाँ
रात के नक़ाब की.

तुम से जुदा  होते लगा था:

थूक दूं उन चेहरों पर
जो बहन -बेटी कह, थप-थपाते हैं
गाल और पीठ
यौन-तृष्णा मिटाते
दिन-दिनास्ती सरे-आम.


चित्र: पांच वर्षीय सुपुत्र आएश की कंप्यूटर कारीगीरी .

Art Poster Print - Indian Poetry - Artist: Olivier Follmi - Poster Size: 12 X 10 inchesIndian Love PoetryIndian Love Poems (Everyman's Library Pocket Poets)
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