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शनिवार, 10 जुलाई 2010

बाज़ार ,रिश्ते और हम









हसीं वादियों में इठलाते एक देश
जहां स्याही सफेद हो जाया करती थी
में जा जा देसी कव्वे इतराते
देस में आकर इनका दर्प तीक्ष्ण हो जाया करता.

श्रद्धा,विश्वास,नैतिकता, ईमानदारी,सत्य,
अहिंसा,करुणा,वात्सल्य ..
ऐसे ढेर सारे फेशियल बाज़ार में मौजूद थे
जिनका इस्तेमाल गाहे बगाहे लोग खूब किया करते.



 





पुरखों की आत्माएं व्यथित थीं
उनकी भी जिन्होंने धर्मशालाएं बनवाईं,
लंगर आम हुआ
उनकी भी जिन्होंने सर्वस्व त्याग हिमालय में धुनी रमाई..

आत्माएं ऐसी माँ थी जिसके दिल से पहला शब्द उच्चारित हुआ था:
बेटे चोट तो  नहीं लगी
जबकि बेटा माँ का  कलेजा निकाल भागा कि 
ठोकर लगने पर गिर पड़ा था.

व्यथित इसलिए नहीं कि 
इमारतों से 
उनकी नाम पट्टी हटा दी गयी
दरअसल उन्होंने कभी नाम पट्टी लगवाई ही नहीं
आत्माएं
दुखी  इसलिए थीं कि
समय फेशियल का हो चुका था
और अब जगह  जगह 
गोयबल्स के साकार रूपों की जय जय कार हो रही थी...

गोयबल्स को नहीं जानते तो
यह अवश्य  सुना  होगा 

दिल्ली में बन्दर का धमाल
गणपति बप्पा का दुग्ध सेवन
हाजी पीर में समुद्री पानी  मीठा हुआ.



Modern Indian Poetry in English (Oxford India Collection)Indian PoetryIndian Love Poetry 

रविवार, 27 जून 2010

आएश और आमश के लिए

यह हँसते हैं तो पौ फूटती है...गर अश्क उभर आए इन पलकों पर तो शिराएँ शिथिल हो जाती हैं , यकबयक ! इनकी खूब याद आ रही है, इन दिनों हमसे दूर हैं.छुट्टियों में नानी के घर.पिछले वर्ष लिखी कुछ कविता-नुमा पंक्तियाँ उनके तांबांक कल के लिए समर्पित उनके ही नाम!










बाबा की पाती 


हमारे पास कुछ भी नहीं है

चंद औराक़ गर्दिशे-दौराँ  के
चंद नसीहतें जो नस्ल दर नस्ल हम तक पहुंचीं
ऐसा विश्वास जहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त
सारे सवाल अनुत्तरित और प्रतिबंधित
हैं

मैं कांपता था , लड़खडाने लगते थे क़दम
पसीने लगते थे छूटने
तुम मत डरना
कभी कुत्ते के भौंकने और बिल्ली के म्याओं म्याओं से

शिनाख्त रखना नहीं
न वजूद के पीछे
भागना
रैपर बन जाना
किसी भी साबुन की टिकिया
का चमकदार और भड़क दार ,
टिकिया  के बारे में न सवाल करना, न करने देना ;
वे एक सी होती हैं
सभी

हाँ !रैपर का नाम ही तुम्हारा होगा
यह मान बढायेगा तुम्हारा

अनुभव की पोटली से निकले यह चंद
सिक्के बेईमानी , झूठ और मक्कारी
कल तुम्हारे मुद्रा-अस्त्र होंगे

सहेजकर रखना इस वसीयत
को

मुझे याद मत
करना

किरदार और गुफ्तार रफ़्तार की
रखना रेत के टीले मत बनाना ।


Childe Harold's Pilgrimage Childe Hassam (1922)The Jungle Book & Second Jungle Book (Wordsworth Childern's Classics) (Wordsworth Collection)

सोमवार, 8 मार्च 2010

ज़रुरत मानसिकता बदलने की

हर तरफ जय महिला जय महिला..का शोर है.....मेरी महज़ इतनी सी इल्तिजा है कि सिर्फ  कविता लिखना या शोर करना हम सबका न हो मक़सद..अपनी कोशिश हो कि सूरत बदलनी चाहिए.बहुत पहले लिखी एक कविता अपने संकलन उर्फ़ इतिहास से आप  सभी के लिए...उन अनाम लड़कियों के नाम जो आज भी ज़िन्दगी के लिए सरगर्दां हैं:

तुम से जुदा होते लगा था
















तुम से जुदा होते लगा था :
ख़ाक हो जाएँ वे सभी आँखें
जो तकती हैं हमें
भूखे भेड़िये की तरह

समय के ताप से
चंद की उस नर्म रात में.

तुम से जुदा होते लगा था:
कर दूं बेनक़ाब उन तमाम चेहरों को
जो ओढ़ लेते हैं शराफ़त 
झक्क सफ़ेद कुरते में
भूल कर आवारगियाँ
रात के नक़ाब की.

तुम से जुदा  होते लगा था:

थूक दूं उन चेहरों पर
जो बहन -बेटी कह, थप-थपाते हैं
गाल और पीठ
यौन-तृष्णा मिटाते
दिन-दिनास्ती सरे-आम.


चित्र: पांच वर्षीय सुपुत्र आएश की कंप्यूटर कारीगीरी .

Art Poster Print - Indian Poetry - Artist: Olivier Follmi - Poster Size: 12 X 10 inchesIndian Love PoetryIndian Love Poems (Everyman's Library Pocket Poets)

बुधवार, 27 जनवरी 2010

मेरे न रहने पर

मेरे न रहने पर
खिड़की पर चाँद अटक जायेगा
कमरे में रौशनी छिटका करेगी
कुछ न कुछ चमक रहा होगा
मेज़ पर बिखरे पन्ने
फर्श पर खिलौने



टिफिन तैयार कर स्त्री पति को सौंपेगी
समय पर खा लेने की ताकीद के साथ



हर पुरुष की पत्नी और प्रेमिका
विश्व की सबसे सुन्दर कृति होगी
देह बिना प्रेम अपूर्ण माना जायेगा
स्त्री बस देह हो जाया करेंगी



कामकाजी स्त्रियों को उसी तरह घूरा करेंगे लोग
हलकी मुस्कान के बूते भीड़ भरी बस में भी
उन्हें जगह ज़रुर मिल जाया करेगी

घरों में अखबार तब भी आया करेगा
हाँ, वो आल इन कलर हो सकता है
अपना हिंदुस्तान तब भी
धूसर मटमैला और बदरंग रहेगा
स्याह को सफ़ेद करने की तरकीबें बताई जाएँगी
चंद ज़िन्दगी आल इन कलर होगी
मेरे न रहने पर



चेहरे की लकीरें हाल बता रहीं होंगी
कोई किसी को तक रहा होगा
कोई सड़क की तरफ़
जल्दबाजी की ज़िद ठाने अपने नंबर की बस के
इंतज़ार में खड़े लोग दुःख और सुख लपेटे होंगे


खिड़की वाली सीट पर बैठा होगा अधेड़
शायद सुंदर -आकर्षक लड़की उसके पास बैठे या स्वस्थ महिला ही
तब शादीशुदा औरतें ज्यादा आकर्षित करती हैं
खिड़की से झांकता हुआ पार्क या बस स्टाप पर गुटुरगूं करते युगल को
देख कबाब बन धुंआ उगलता जाएगा
उसका विश्वास लबरेज़ होगा कि  सारी स्त्रियों को
सिर्फ़ वही तृप्त कर सकता है


क्रांतिकारी संगठन से जुड़ा कवि
सरकारी महकमे में आ टिकेगा
तीन घंटे के अनुबंध पर सहायक से आठ घंटे की चाकरी
कराना उसका धेय  नहीं, विवशता होगी
अधिकाँश समय अपनी कवितायें उससे टाइप कराएगा जो
अन्याय, अत्याचार, शोषण के विरुद्ध होंगी
सेठाश्रयी अखबार की पचास हज़ार की नोकरी से हटा दिए
जाने का संताप उसे पल -पल सालता रहेगा
 

बस भाड़े से बचा मासिक साढ़े पाँच हज़ार सही
सहायक की अदद ज़रूरत होगी
पहली बार उसे पत्नी का जेवर बंधक रखना पड़ेगा
सारे क़र्ज़ अदा करने के बाद वो खुश खुश
घर लौटेगा बाज़ार से मछली लेकर

स्थितियों की सडांध
तेल में तैरने , उफनने , पकने के बावजूद
समुद्री मछली की सडांध से पराजित हो जाया करेगी
भर पेट भोजन कर पत्नी से लिपट वो खर्राटे लेने लगेगा


अचानक सरकारी अफसरों और धनाड्यों की रचनाएँ महान हो जाएँगी
साहित्य में सब कुछ पहली बार होने लगेगा
बुलंद पिंजड़े में बंद सुंदर और भरी -पूरी
लगती सेठों की पत्नियाँ बाहर निकलते ही
नए सीमोनवाद का जयघोष करने लगेंगी

हॉउस जर्नल में क्रांति का बिगुल फूँक दूसरे लोग
दम लेने के लिए राजधानियां आने की जुगत भिड़ाएंगे 


क्रांतिकारी लेखक चर्चित प्रकाशक के विरुद्ध
षड़यंत्र में शामिल रहकर किताब वहीँ से छपवाकर गौरवान्वित होगा
प्रकाशक को ऐसे आयोजनों की सूचना देगा
जहाँ फलां -फलां लोगों से मिलना हो
जो उसके स्याह -सफ़ेद में सहायक होंगे

दिन भर की मजदूरी के बाद घर लौटा पिता
बच्चे को छाती से चिपटायेगा
उसके गर्म स्पर्श से संगृहीत करेगा ऊष्मा ,उर्जा
पिता की तरह टांगो पर टांग चढाये
बच्चा अख़बार देखेगा
पिता पुलकित होगा मंद-मंद


दूब, कुकरौन्दा , पुटुस, रेंड, ढेंकी, चक्की, कोल्हू, सिलबट्टा
टमटम, पवनचक्की, कोलसार, जगत
जैसे अनगिनत शब्द शब्दकोशों से भी हटा लिए जाएंगे
किसी परिशिष्ठ पर कौव्वा, कबूतर, बुलबुल, उल्लू, पीपल, बरगद, बघ्घी, बैलगाड़ी
जैसे शब्द दिखलाई पड़ जाएंगे

नीम विदेशों में उगा करेगा


सत्य, न्याय, विश्वास, श्रद्धा, नैतिकता, संवेदना,
जैसे शब्द ग्रंथों में सिमट कर रह जाएंगे
विलोम के लिए कभी कभार इनकी जरुरत पड़ा करेगी


देशवासी अंबेडकर नगर, श्रीराम कॉलोनी और मुस्तफाबाद
जैसी जगहों में रहने की कोशिश करेंगे
उनका अपना फासिले-शहर या अपार्टमेंट्स भी हो सकता है
दरअसल उन्हें अपने अपने धार्मिक, जातीय और क्षेत्रिय समूहों की तलाश होगी
धार्मिकता से उतना ही दुराव
धर्मान्धता से लगाव  


भगवान रंगीन परदे पर अवतरित होगा
स्वर्ण सिंहासन पर बैठ, देगा प्रवचन
भक्तजनों में महिलाओं की संख्या ज्यादा होगी
धर्म का नया संस्करण धड़ाधड़ लोकार्पित होगा


तमाम खलनायकी के बावजूद उसका
जयगान होगा समूचे विश्व में
उसके देश का पेय  गंगाजल और आब-ए-ज़मज़म
की तरह पवित्र और संग्रहणीय समझा जाएगा


मर खपने तक सभी बंदरिया की तरह अपने अपने गांव कस्बे
को चिपकाए शहर में रहेंगे
शहर से गरीबी हटा दी जाएगी

दरअसल गरीबों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी
धीरे धीरे वे गांवो में वापस जाएंगे
हर तरफ अमीरी-अमीरी का शंखनाद होगा

कुछ लोगों को सुंदर माँ, बहन, बेटियों का आसरा रहेगा
ऐसे भाग्यवानों का शहर सम्मान करेगा

विरोधियों को विडंबना का मुकुट पहना दिया जाएगा
कवि गवइये के संग थिरक राजसी महफिलों की शोभा बढ़ाएंगे


कश्मीर के हिंदू की अरदास होगी :
अगले जन्म मोहे हिंदू ना कीजो
गुजरात के मुसलमान अपने होने पर शक किया करेंगे.



[पिछले वर्ष इस कविता को रविवार ने जगह दी थी.लेकिन आप लोगों के बीच आज पहली बार पूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ.]


 

Indian Love PoetryThe Oxford Anthology of Modern Indian PoetryAlfaaz - In the World of Gulzar's Poetry 

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

ऐसा नया साल हो!







समय खुशियों का नहीं , सो इक निवेदन अवश्य है, बक़ौल शकील शम्सी :

गुल कर गए कितने ही चरागों को धमाके
मुमकिन हो तो इस साल चरागाँ नहीं करना
हैं खून से रंगीन हर इक शहर की गलियाँ
इस दौर में तुम जश्न का सामां नहीं करना


लेकिन हम भारतीय जन्मजात उत्सव-धर्मी हैं। सो नेक तमन्नाओं के साथ नए साल के लिए कुछ दुआएं ,कुछ विशवास, कुछ संकल्प:


सब की फरयाद हो
गाँव शाद-बाद हो
इरादा चट्टान हो
खुला आसमान हो

ज़िन्दगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो

हर होंट प गुलाब हो
पके आम-सा शबाब हो
खूबसूरत मकान हो
मुट्ठी में जहान हो

ज़िन्दगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो

हर गाल प गुलाल हो
रिश्ता न मुहाल हो
माँ का ख्वाब हो
आँगन शादाब हो

ज़िन्दगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो

कोयल ka साज़ हो
सबकी आवाज़ हो
मसला न सवाल हो
हर हाथ में कुदाल हों


ज़िन्दगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो

नदी की रवानी हो
न कभी बदगुमानी हो
हर सोच ताबांक हो
वक्त न हौलनाक हो

ज़िन्दगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो




















शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

बोलना चाहता हूँ प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ

इधर इतना कुछ टूटा, इतना बिखरा कि सँभालते- सँभालते .बार-बार इक शे'र जेहन में आता रहा :

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

जिस इलाके में रहता हूँ, इसे ही ख़ास मानसिकता में पल्लवित पत्रकार आतंकवादियों का अड्डा बताते हैं।
अनगिनत पढने-लिखने वाले छात्रों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
दहशत और संशय की तलवार अब भी गर्दनों पर लटकी है .
पुलिसिया बर्बरता की ताब न लाकर कोई भी नया मास्टर-मायंड हो सकता है।

ईद आयी ज़रूर पर मुहर्रम की तरह गुज़र गयी।
यही हाल दशहरा-दीपावली का होगा।
जो कुछ हुआ या जो कुछ दिल्ली से लेकर साबरकांठा , मालेगाँव , कर्नाटक और कंधमाल में हो रहा है, बस यही कहने का मन है:
हे ईश्वर इन्हें क्षमा मत करना क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं।

साथियों ज़रा हटकर दो कविता पेश-खिदमत है:

१

हम सच बोलते
वोह झूठ की तुरपाई कर देते।

हम घरोंदे के लिए तिनके सहेजते-संवारते
वोह उसे शो-पीस के लिए सरिया लेते।

हम ब्यान देते
वोह चुप रहते।
वोह झूठ बोलते
सब वाह! वाह!
कह उठ ते ।

२

कविता लिखना चाहता हूँ
शर्त रख दी जाती है
मुसलमान हो तो
कुरआन-हदीस पर मत लिखना।

हिंदू हो तो
अयोध्या छोड़कर सारी रामायण
बांच सकते हो।

ईसाई हो तो
ईसा के पिता का
सवाल नहीं उठाओगे ।

मैं बोलना चाहता हूँ
तो प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ।

रविवार, 27 जुलाई 2008

इस्लाम की व्याख्या !



आतंक के ग्रास बने तमाम मासूमों के नाम

वक़्त फ़ज्र का
मुअज़्ज़िन की सदा
अस्सलातो-खैरुन-मिनन-नोम

और तुम्हारा इस्लामिक बम
आ गिरता है

नमाज़ी-समेत
मस्जिद
हो जाती है
शहीद।

ऐ ! पाक हुक्मराँ
व्याख्या करो
अपने
इस्लाम की।

(प्रात:काल की नमाज़,अज़ान पुकारनेवाला, नमाज़ नींद से बेहतर है, पवित्र और पाकिस्तान )

बुधवार, 23 जुलाई 2008

आदमी,आदमी सा






























सूरज, सूरज सा
चाँद, चाँद

कुत्ता, कुत्ता सा
गिरगिट, गिरगिट


फूल, फूल सा
शूल, शूल


मित्र ! कब दिखेगा
आदमी, आदमी सा

बुधवार, 2 जुलाई 2008

खड्गसिंह

बस्स धुन में चढ़ते जाना
पहाड़ों और पेड़ों पर
इससे बिल्कुल अंजान कि
वहाँ काँटे और ज़हरीले जीव भी हैं
बचपन की आदतें कहीं छूटती भी हैं ।


हम सब कुछ भला-भला सा समझने के
आदीजो ठैरे
जानती तो थी कि वह कई अस्तबलों में जाता है
अब उबकाई आती है कहते कि
वह बिल्कुल पिता की तरह था
हर संकट में साथ देने को तत्पर
उसकी डांट भी कभी बुरी नहीं लगी






सुलतान पर उसकी दृष्टि तो थी
पर मैंने हमेशा इसे वात्सल्य समझा


उस शाम
ज़रूरी निर्देश समझाते-समझाते
उसके हाथ पीठ पर रेंगे
तो उसकी कुटिल मुस्कान की हिंसा
मेरी आंखों से काफ़ी दूर थी कि
अचानक
उसकी पकड़ मज़बूत हो गई



सुलतान को मुझसे ज़बरदस्ती झपटने के
प्रतिकार में मैं बुक्का मार दहाड़ी




वह आज का खड्गसिंह है माँ
देर तक मुझे समझाता रहा और
नए-नए प्रलोभनों की साजिशें बुनता रहा




माँ , मुझे लोग सहनशील कहते हैं
उन्हें पता है इसमें छुपी यातनाओं का



मदद को बढ़ा अब हर हाथ सर्प-सा लहराता है
अपनत्व से निहारती निगाहें चिंगारियां उगलती हैं




हे प्रभु! मुझे क्षमा करना
मैं ने सभी संपर्क ख़त्म कर लिए हैं
पर माँ , हर कोई खड्गसिंह तो नहीं होता !

मुझे गर्भ में छुपा लो माँ
बहुत-बहुत डर लगता है




(रेखांकन चार साला साहबजादे आयेश लबीब का
जो अक्सर वह कंप्यूटर पर बैठ कर किया करते हैं )

मंगलवार, 24 जून 2008

बी.बी.सी. : चार कवितायें

http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/05/070503_kavita_shahroz.shtml

क्यों रहूँ इस शहर में
अब क्यों रहूँ इस शहर में
नहीं रहे यहाँ अब खेत
न ही साहस है किसी बीज में
उर्वरता के अर्थ बदल चुके हैं
प्रतिभा का चतुराई ने कर लिया है अपहरण.
नहीं आता है कोई कौव्वा छत की मुंडेर पर
चमगादड़ उड़ना भूल, सरकता है रिश्तों की दीवारों पर.
नहीं झरता है वाणी से निर्मल जल
न ही उगलती है आँख अंगारे.
इस जंगल का शेर भी वैसा नहीं दहाड़ता
बहुत स्नेहपूर्वक करता है शिकार
उसकी गर्दन में लटकती ज़बान लपलपा रही होती है.

चित्रांकन-हेम ज्योतिका
चित्रांकन-हेम ज्योतिका
हँसता नहीं कोई खुलकर
रोता भी नहीं बुक्काफाड़कर
दीवारों से नहीं चिपटता दुख का अवसाद
हर्ष का आह्लाद भी नहीं फोड़ता छत
पड़ोसी की गोद में नहीं सुबकता बालक
उसकी मुस्कान माँ की घूरती निगाहों में हो जाती है क़ैद
धड़ाम्! बंद करती दरवाज़ा, बतियाती है घंटों फ़ोन पर
किसी अनदेखे व्यक्ति से, अपनी जाँघों की तिल से पड़ोसिन के नितंबों तक.
बच्चे बड़ों की तरह हो रहे हैं बड़े
लड़कियाँ स्कूल छोड़ते-छोड़ते बन चुकी होती हैं औरतें.
बसंत में भी चिड़िया ने नहीं गाया फाग.
पोशाक से सिर्फ़ दुर्गंध नहीं आती
त्वचा को चुभते हैं उनके कँटीले रेशे
काँधा नहीं मिलता बरसने को आतुर उमड़ते-घुमड़ते बादल को.
सिक्के की चमक गिलास भर पानी में धुल चुकी है
भरी जेब काग़ज़ों का पुलिंदा है.
तुम कहते हो दूरियाँ कम हो गई हैं
हमारा फ़ासला तो और बढ़ता जा रहा है
तुम तक पहुँचने की आशंका
बीच की खाई के जबड़े में दम तोड़ती है
जबड़े के अंदर तुम्हार अट्टाहास गूंजता है.
****
कविता पर रोक
कविता लिखना चाहता हूँ
शर्त रख दी जाती हैः
मुसलमान हो तो;
कुरआन-हदीस पर मत लिखना.
ईसाई हो तो; ईसा के पिता का सवाल
नहीं उठाओगे.
हिंदू हो तो; अयोध्या छोड़कर सारी
‘रामायण’ लिख सकते हो.
मैं बोलना चाहता हूँ
तो प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ.
****
दिल्ली आकर

चित्रांकन-हेम ज्योतिका
चित्रांकन-हेम ज्योतिका
गाँव में थे
क़स्बे से आए व्यक्ति को
घूर-घूर कर देखते.
क़स्बे में थे
शहर से आए उस रिक्शे के पीछे-पीछे भागते
जिस पर सिनेमा का पोस्टर चिपका होता.
शहर में आए
महानगर का सपना देखते.
दिल्ली आकर
गाँव जाने का ख़ूब जी करता है.
****
सपने थे
सपने थे
नेक नियत के.
सपने थे
नेक चलनी के.
सपने थे
नेक इरादों के.
सपने थे
हर्ष-उल्लास के.
सपने थे और सिर्फ़ सपने थे.

आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं  

मंगलवार, 17 जून 2008

अन्तिम भाग

दिन भर की मजदूरी के बाद घर लौटा पिता
बच्चे को छाती से चिपटायेगा
उसके गर्म स्पर्श से संगृहीत करेगा ऊष्मा ,उर्जा
पिता की तरह टांगो पर टांग चढाये
बच्चा अख़बार देखेगा
पिता पुलकित होगा मंद -मंद..............

पूरी कविता पढने के लिए रविवार देखिये 

शेष .....


खिड़की से झांकता हुआ पार्क या बस स्टाप पर गुटुरगूं करते युगल को
देख कबाब बन धुंआ उगलता जाएगा
उसका विश्वास लबरेज़ होगा की सारी स्त्रियों को
सिर्फ़ वही तृप्त कर सकता है ।


शेष रविवार में ...

सोमवार, 16 जून 2008

मेरे न रहने पर

मेरे न रहने पर
खिड़की पर चाँद अटक जायेगा
कमरे में रौशनी छिटका करेगी
कुछ न कुछ चमक रहा होगा
मेज़ पर बिखरे पन्ने
फर्श पर खिलोने ।


पूरी कविता पढने के लिए क्लिक करें :

रविवार, 15 जून 2008

ग़ज़ल

लहू गो अश्क बन कर बह गया है
मेरे दामन पे धब्बा रह गया है

कहाँ जाऊं मैं तेरे दर से उठ कर
यही ले दे के इक दर रह गया है

मेरी मजबूरियाँ मत देख जालिम
सितम ढाले जो बाक़ी रह गया है

नज़र आते हैं तेवर बदले -बदले
कोई कुछ चुपके -चुपके कह गया है

पड़ीं क्या -क्या नहीं इस पर बलाएँ
भला हो दिल का सब कुछ सह गया है

उन्हें हो उनकी खुशनुदी मुबारक
मेरी किस्मत में गिरया रह गया है

क़मर कुछ शे 'र और पढिये
ज़माना अब भी तिशना रह गया है

सोमवार, 9 जून 2008

बाबा की पाती



(आयेश और आमश के लिए )

हमारे पास कुछ भी नहीं है
चंद औराक गर्दिशे -दोराँ के
चंद नसीहतें जो नस्ल दर नस्ल हम तक पहुंचीं
ऐसा विश्वास जहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त
सारे सवाल अनुत्तरित और प्रतिबंधित
हैं

मैं कांपता था , लड़खडाने लगते थे क़दम
पसीने लगते थे छूटने
तुम मत डरना
कभी कुत्ते के भोंकने और बिल्ली के म्याओं म्याओं से

शिनाख्त रखना नहीं
न वजूद के पीछे
भागना
रैपर बन जाना
किसी भी साबुन की टिकया
का चमकदार और भड़क दार ,
टिकया के बारे में न सवाल करना न करने देना ;
वे एक सी होती हैं
सभी
हाँ !रैपर का नाम ही तुम्हारा होगा
यह मान बढायेगा तुम्हारा

अनुभव की पोटली से निकले ये चंद
सिक्के बेईमानी ,झूठ और मक्कारी
कल तुम्हारे मुद्रा -अस्त्र होंगे

सहेजकर रखना इस वसीयत
को

मुझे याद मत
करना

किरदार और गुफ्तार रफ़्तार की
रखना रेत के टीले मत बनाना ।

रविवार, 1 जून 2008

ग़ज़ल -1

इश्क़ गर बेहिसाब हो जाए
ज़िंदगी कामयाब हो जाए

वो अगर बेनकाब हो जाए
ज़र्रा भी आफताब हो जाए

तुमने देखा कहीं हुस्न -अज़्ल
देख लो इंकलाब हो जाए



मुस्कुरा दें गर वो गुलशन में
कांटा-कांटा गुलाब हो जाए



उनसे गर इंतेसाब हो जाए
रग-रेशा  शादाब हो जाए




ज़िन्दगी गर अताब हो जाए
क़तरा-क़तरा तेज़ाब हो जाए

ग़ज़ल

न शओकत, न शोहरत , न ज़र चाहिए
फ़क़त इक तेरी नज़र चाहिए

वफाएं, जफाएं हैं अपनी जगह
दुआओं में कुछ असर चाहिए

समझकर बताओ ,ज़रा शेख जी
ख़ुदा चाहिए उसका घर चाहिए

तगाफुल बहुत हो लिया ऐ क़मर
कहो जिसको घर ,वैसा घर चाहिए

शर से महफूज़ हो ले हर इक पर
यूं मज़बूत दीवारों-दर चाहिए

शुक्रवार, 30 मई 2008

ग़ज़ल के चंद शे'र

जाने तकदीर कैसी पाई है
हमने हर बार मात खाई है

उसने देखा न एक बार हमें
हम समझते थे शनासाई है

ज़िक्र दैरो हरम बहाना है
ज़िंदगी किसको रास आई है

सिर्फ़ अहले नज़र का धोका है
क्या अच्छाई है क्या बुराई है
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