शनिवार, 10 जुलाई 2010

बाज़ार ,रिश्ते और हम

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हसीं वादियों में इठलाते एक देश
जहां स्याही सफेद हो जाया करती थी
में जा जा देसी कव्वे इतराते
देस में आकर इनका दर्प तीक्ष्ण हो जाया करता.

श्रद्धा,विश्वास,नैतिकता, ईमानदारी,सत्य,
अहिंसा,करुणा,वात्सल्य ..
ऐसे ढेर सारे फेशियल बाज़ार में मौजूद थे
जिनका इस्तेमाल गाहे बगाहे लोग खूब किया करते.



 








पुरखों की आत्माएं व्यथित थीं
उनकी भी जिन्होंने धर्मशालाएं बनवाईं,
लंगर आम हुआ
उनकी भी जिन्होंने सर्वस्व त्याग हिमालय में धुनी रमाई..

आत्माएं ऐसी माँ थी जिसके दिल से पहला शब्द उच्चारित हुआ था:
बेटे चोट तो  नहीं लगी
जबकि बेटा माँ का  कलेजा निकाल भागा कि 
ठोकर लगने पर गिर पड़ा था.

व्यथित इसलिए नहीं कि 
इमारतों से 
उनकी नाम पट्टी हटा दी गयी
दरअसल उन्होंने कभी नाम पट्टी लगवाई ही नहीं
आत्माएं
दुखी  इसलिए थीं कि
समय फेशियल का हो चुका था
और अब जगह  जगह 
गोयबल्स के साकार रूपों की जय जय कार हो रही थी...

गोयबल्स को नहीं जानते तो
यह अवश्य  सुना  होगा 

दिल्ली में बन्दर का धमाल
गणपति बप्पा का दुग्ध सेवन
हाजी पीर में समुद्री पानी  मीठा हुआ.



Modern Indian Poetry in English (Oxford India Collection)Indian PoetryIndian Love Poetry 

रविवार, 27 जून 2010

आएश और आमश के लिए

यह हँसते हैं तो पौ फूटती है...गर अश्क उभर आए इन पलकों पर तो शिराएँ शिथिल हो जाती हैं , यकबयक ! इनकी खूब याद आ रही है, इन दिनों हमसे दूर हैं.छुट्टियों में नानी के घर.पिछले वर्ष लिखी कुछ कविता-नुमा पंक्तियाँ उनके तांबांक कल के लिए समर्पित उनके ही नाम!










बाबा की पाती 


हमारे पास कुछ भी नहीं है

चंद औराक़ गर्दिशे-दौराँ  के
चंद नसीहतें जो नस्ल दर नस्ल हम तक पहुंचीं
ऐसा विश्वास जहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त
सारे सवाल अनुत्तरित और प्रतिबंधित
हैं

मैं कांपता था , लड़खडाने लगते थे क़दम
पसीने लगते थे छूटने
तुम मत डरना
कभी कुत्ते के भौंकने और बिल्ली के म्याओं म्याओं से

शिनाख्त रखना नहीं
न वजूद के पीछे
भागना
रैपर बन जाना
किसी भी साबुन की टिकिया
का चमकदार और भड़क दार ,
टिकिया  के बारे में न सवाल करना, न करने देना ;
वे एक सी होती हैं
सभी

हाँ !रैपर का नाम ही तुम्हारा होगा
यह मान बढायेगा तुम्हारा

अनुभव की पोटली से निकले यह चंद
सिक्के बेईमानी , झूठ और मक्कारी
कल तुम्हारे मुद्रा-अस्त्र होंगे

सहेजकर रखना इस वसीयत
को

मुझे याद मत
करना

किरदार और गुफ्तार रफ़्तार की
रखना रेत के टीले मत बनाना ।


Childe Harold's Pilgrimage Childe Hassam (1922)The Jungle Book & Second Jungle Book (Wordsworth Childern's Classics) (Wordsworth Collection)

रविवार, 20 जून 2010

वफ़ा के नाम पर तुम क्यों संभल कर बैठ गए....

 नीतीश के बहाने


माँ जैसी कालजयी कृती के रचयिता गोर्की अक्सर कहा करते थे ,मित्रता ऐसी करनी चाहिए जो आगे चलकर बाधक न बने.लेकिन बहुधा लोग भूल जाते हैं.अब देखिये न राज्यसभा के लिए संपन्न कुछ सदस्यों के चुनाव में पतली गली से कौन किधर गया, दीवार भी नहीं सूघ पायी.उधर अनुशासन का दंभ भरने वाली भाजपा इतनी सशंकित रही कि राजस्थान में उसने अपने विधायकों को आलीशान होटलों में क़ैद कर दिया इसलिए कि कहीं ऍन वक़्त पर कोई कहीं बिदक न जाय ! जेठमलानी साहब को जिताना जो था.और मोदी ने मित्रता धर्म निभा ही दिया , साहब जीत गए.

लेकिन इधर बिहार में हँसते-खिल-खिलाते दो मित्रों की छपी तस्वीर लोग पचा नहीं पाए.इस वजह कर भाजपा-जद [यु] के  ख्यात रिश्ते में दरार पड़ गयी , ऐसा विश्लेषक मानते हैं.मामला तूल  पकड़ता जा रहा है. संभावना जतलाई जा रही है कि नितीश सरकार से भाजपा समर्थन वापस ले सकती है.उधर नितीश के आशिक रो रहे हैं कि जिस जयश्री राम की चादर का दायरा बढाने में उन्होंने समय समय पर अवसर उपलब्ध कराये [वह अपने दिवंगत गुरु वी.पी.सिंह का उद्धरण देते हैं ] उसी चादर के एक टुकड़े ने उनके चेहरे पर कालिख पोत दी ! खुदा न खास्ता सरकार गयी तो नितीश गाते-गुनगुनाते फिरेंगे :

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है, मुझे इस बात का ग़म है


कहावत है : अकेला चना भांड नहीं फोड़ता या एक से भले दो ! इस बिना पर मित्रता का जन्म होता है .व्यक्ती जानता है कि अकेलापन अभिशाप है और दूसरों का साथ वरदान ! वह मित्रों पर भरोसा करता है और भरोसे के एवाज़ में अपेक्षित व्यवहार चाहता है.दोस्ती वही जो परस्पर विश्वास और परस्पर हित का चिंतन करती हो.संसार के उद्भव से आज तक यही होता आया है.

लेकिन सत्ता की चाह में की गयी राजनितिक मित्रता के ऐसे कई दौर गुज़रे हैं, जहां पावर के लफड़े में कहाँ और किस जगह पुष्पहार में खंजर लटका होगा, पूर्वानुमान  लगा पाना  मुश्किल हो जाता है.क्या बिहार गए उदय ये जान पाए थे . जिनके वादे पर गए वही मित्र उन्हें दग़ा दे गए और लौट के उदय बेंगलेरु पहुंचे, बाकी बची थैली संभाले . दूसरी तरफ माल्या की थैली खूब काम आयी.


निति शतक का श्लोक है जिसका भावार्थ कुछ इस तरह होगा :

स्वार्थ मूलक मैत्री मध्यान्ह पूर्व की छाया के समान आरम्भ में बहुत विशाल होंकर क्रमश:क्षीण होती जाती है और सच्चे स्नेह भाव पर पनपी हुई मैत्री दोपहर बाद की संध्याकाल की छाया के समान शुरू में छोटी होंकर बाद में प्रतिपल बढ़ती जाती है.

यानी सहज वृद्धिशील मैत्री ही सच्ची मित्रता है.पर सियासी गलियारे में इस श्लोक पर कान धरने वाला कौन है ! अब देखिये न ! जिस अफज़ल गुरु की लंबित फांसी की सज़ा को जल्द से जल्द अंजाम तक पहुँचाने की मांग को लेकर भाजपा और उसके हितैषी रोज़ आसमान सर पर लिए घुमा करते हैं उसी के वकील रहे जेठमलानी साहब को भाजपा अपना सांसद  बनाती है.और उसकी अगुवाई वर्तमान के कथित ह्रदय सम्राट नरेंद्र मोदी करते हैं.और हाँ अटल जी के खिलाफ लखनऊ में यही जेठमलानी जब चुनाव में खड़े थे तो उन्होंने संघ की जांघिया बानियान खूब उधेड़ी थी.
क्या कीजये गा जब खाने की बारी आती है तो सभी एक पांत में पालथी मार कर बैठ जाते हैं.न अछूत, न छूत ! कोई भेदभाव नहीं.न कोई बड़ा, न छोटा . गर्व से कहो हम हिन्दू हैं ! यानी भारतीय हैं !

संसदनामे की खबर रखने वाले एक मित्र ने अभी सूचित किया है कि नितीश और शरद को अब फ़र्क़ समझ में आ गया है जैसा कि गोल्ड स्मिथ कह गए हैं , जो मित्रता बराबर की नहीं होती उसका अंत हमेशा घृणा में होता है.अब आपको भी भाजपा-बसपा की यारी और बाद में पलट्वारी की याद आ गयी होगी.चचा ग़ालिब ने कहा था :

बेगानगी-ए-ख़ल्क़ से बेदिल न हो ग़ालिब
कोई नहीं तो तेरा तो, मेरी जान खुदा है !


लेकिन चचा भूल गए कि मनुष्य को इसी हांड-मांस की दुनिया में रहना है.उसे यहाँ के लोगों से वास्ता पड़ता है और बंधु-सखाओं से आशा व अपेक्षा करना ग़ैर-वाजिब भी नहीं ! इलियट को घोंट जाओ कि शायद सबसे आनंददायक मित्रताएं वे हैं जिनमें बड़ा मेल है, बड़ा झगडा है और फिर बड़ा प्यार ! मतलब यह कि दोस्ती में मेल, झगडे और प्यार के हिंडोले तो चल सकते हैं [उपेक्षा और असहयोग के नहीं ]. लेकिन होता यह है कि जब अग्निपरीक्षा की घड़ी आती है हम बाहर निकलने का दरवाज़ा टटोलने कगते हैं.

खैर ! चलते-चलते :

वफ़ा के नाम पर तुम क्यों संभलकर बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं, बात है ज़माने की !



Government and Politics in South Asia: Sixth EditionBroken Landscape: Indians, Indian Tribes, and the ConstitutionHindu Nationalism and Indian Politics ; An Omnibus Comprising The Emergence of Hindu Nationalism in India; The Saffron Wave : Democracy and Hindu Nationalism in Modern India; The BJP and the Compulsio

सोमवार, 8 मार्च 2010

ज़रुरत मानसिकता बदलने की

हर तरफ जय महिला जय महिला..का शोर है.....मेरी महज़ इतनी सी इल्तिजा है कि सिर्फ  कविता लिखना या शोर करना हम सबका न हो मक़सद..अपनी कोशिश हो कि सूरत बदलनी चाहिए.बहुत पहले लिखी एक कविता अपने संकलन उर्फ़ इतिहास से आप  सभी के लिए...उन अनाम लड़कियों के नाम जो आज भी ज़िन्दगी के लिए सरगर्दां हैं:

तुम से जुदा होते लगा था
















तुम से जुदा होते लगा था :
ख़ाक हो जाएँ वे सभी आँखें
जो तकती हैं हमें
भूखे भेड़िये की तरह

समय के ताप से
चंद की उस नर्म रात में.

तुम से जुदा होते लगा था:
कर दूं बेनक़ाब उन तमाम चेहरों को
जो ओढ़ लेते हैं शराफ़त 
झक्क सफ़ेद कुरते में
भूल कर आवारगियाँ
रात के नक़ाब की.

तुम से जुदा  होते लगा था:

थूक दूं उन चेहरों पर
जो बहन -बेटी कह, थप-थपाते हैं
गाल और पीठ
यौन-तृष्णा मिटाते
दिन-दिनास्ती सरे-आम.


चित्र: पांच वर्षीय सुपुत्र आएश की कंप्यूटर कारीगीरी .

Art Poster Print - Indian Poetry - Artist: Olivier Follmi - Poster Size: 12 X 10 inchesIndian Love PoetryIndian Love Poems (Everyman's Library Pocket Poets)

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

या हुसैन वा हुसैन...तस्लीम [A] कर या न कर

नींद ....अचानक कभी नहीं ...आई लेकिन इधर ऐसा ही हो रहा है...और जानते हैं..उसका समय कब होता है जब मैं खर्राटें लेने लगता हूँ..ठीक उसी वक़्त  मुआज्ज़िन  अज़ान पुकार रहा होता है या दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही होती है ...जी आप सही समझ रहे हैं..रूह जब तक फ़िज़ूल की बक से कलांत और मस्तिष्क की शिराएँ सिकुड़ चुकी होती हैं...अजब रूह का रिश्ता है सारी दुनिया में...ऐसा उस पर पड़ते दबाव के सबब होता होगा ,,संभव है  .लेकिन मुझे कोई रोग नहीं है..मैं तो क़तई नहीं मान सकता ..हाँ इंसानियत ....की इस्मत ..लुटी जा रही है..संस्कृति का  शील भंग करने की कोशिशें की जा रही हैं  या  सभ्यता , कला, साहित्य सृजन ....का शाब्दिक बलात्कार हो रहा है....और हैरानकुन यह है कि ऐसा  करने वाले धार्मिक लोग हैं...खुद को वह ऐसा ही मानते हैं..आप न मानें ठेंगे से!!
और  ऐसे कई कारण हैं ..जैसे गोधरा, जैसे मुकम्मल तब का गुजरात...दिल्ली की दहशत..मुंबई में .....आततायियों का तीन दिनी खुला राज ....लेखक और चित्रकार का देस निकाला......ज़हन कुंद और दिमाग़ शिथिल होता जाता है..
मैं .....सोच नहीं पाता ..ऐसा क्यों..मैं मुसलमान हूँ..तो रश्दी का समर्थन करूँ या विरोध..कोई पूछता है..आपने हुसैन का समर्थन नहीं किया..क्या इसलिए कि आप मुसलमान हैं...मैं हुसैन को जानता हूँ..तसलीमा को जानता हूँ  रश्दी को उनके मुकाबले कम जानता हूँ..और हाँ उस कार्टून को भी देखा है.......जिसे लोग पैगम्बर के नाम से मंसूब करते हैं.....और एक निर्वस्त्र  स्त्री का चित्र भी देख रहा हूँ जिसे कई लोग सरस्वती कह रहे हैं...



 क्या ज़रूरी है कि आपकी माँ को लोग उसी नज़रिए से देखें...
.कोई उनमें सुन्दरता भी खोज सकता है..किसी को आपकी स्त्री कामदेवी   भी लग सकती हैं..कोई घुप्प अंधेरें में जागती आँखों उनके साथ सम्भोग भी करना चाहता हो....ये सरासर गलत हो सकता है ..इसे अपराध या पाप भी आप कह सकते हैं .

माँ की  जगह पत्नी बहन प्रेमिका कुछ भी हो..मेरा कहना  यह कि आप जिसे जिस रिश्ते, जिस स्नेह या जिस सम्मान से देखते हैं.जैसा बर्ताव करते हैं..यह ज़रूरी नहीं कि आपका पड़ोसी भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करे...ठीक है किसी ने एक कार्टून बनाया और पैगम्बर का नाम दे दिया.....किसी ने एक स्त्री को नंगा दिखाया..और उसे किसी देवी का नाम दे दिया गया....मैं नहीं जनता कि उस बनाने वाले का क्या उद्देश्य रहा होगा..मेरा तो यह कहना है.कि आप उस चित्र को अपना पैगम्बर क्यों मानते हैं..या अपनी देवी क्यों मान लिया.. बाबा तुलसी के यह शब्द :

जाकी  रही  भावना  जैसे
प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी 
 

आपने अब तक जो पढ़ा ..आपकी अपने धर्म में जैसी श्रद्धा रही..क्या ये कथित तस्वीरें उन से मिलती हैं..जवाब होगा क़तई नहीं...तो आप क्यों आसमान सर पर उठाए फिर रहे हैं..ज़माने में और भी ग़म हैं..लोगों....

और आप जानते हैं..कला और साहित्य यानी सृजन-धर्मा लोग ज़रा अलग होते हैं...आप इन्हें आज की ज़बान में एडिअट्स कह सकते हैं.....लेकिन जानते हैं आप ..अब मैं उन हदीस का क्या करूँ जिनमें लिखा है.....लेखकों की स्याही शहीदों के खून से भी पवित्र होती है......
अब रश्दी ..तसलीमा  .......किसी ने कहा..आप इनमें हुसैन को भी साथ कर लें ..इन्हें आता-जाता कुछ नहीं..हाँ इनकी पकड़ बाज़ार पर खूब है..और बस ...यही उनकी सफलता का राज़ है  [इसे आप सार्थकता क़तई न समझें...सार्थक फ़नकार तो रामकुमार, रज़ा या प्रभा खेतान  और अरुंधती राय जैसे लोग होते हैं].

क्या हम मान लें.....आवेश की बात कि तसलीमा तोगड़िया की ज़बान  बोलती हैं.....या एक दूसरे मित्र का ब्यान कि रश्दी रोज़ सिगरेट की तरह स्त्री क्यों बदलते हैं ......हुसैन को सिर्फ माधुरी और स्तन-नितम्ब ही दिखाई क्यों देता है...



नाश्ता ..नहीं किया..बच्चा रो रहा है..आप कहाँ हैं..जब पत्नी ने टोका..तो तन्द्रा भंग हुई....




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ....क्या ज़रूरी नहीं..क्या समाज के निर्माण में आप लेखक-फ़नकारों के योगदान को यूँ ही ख़ारिज कर देंगे....
आज़ादी का अर्थ यह तो नहीं कि आप अपनी धुन में ..नाली पर ढेला दर ढेला चलाते जाएँ..और किसी को उसकी गंदगी पर आपत्ति हो तो उस से मुंहजोरी करें......

 साहित्य  या ऐसी दूसरी कलागत विधा क्या आपसी नफरतों का विस्तार है.....
.प्रेमचंद गलत  थे या लूशुन ! जिन्होंने साहित्य कला को सबसे उंचा मक़ाम दिया....समाज के विवेक ..आगे चलने वाली मशाल ......
 अजंता या एलोरा या इरानी मुसव्विर जिसने ढ़ेरों नबियों के चित्र बनाए...जिनका ज़िक्र क़ुर्रतुल एन   हैदर ने अपने एक उपन्यास गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन में  किया है ,..
आप क्या करेंगे !!!!माथा टन..टन करता  है न !!

तीन वर्गों में विभक्त लोगों से क्या स्वस्थ्य  वाद-विवाद संभव है!!दो से तो ऐसी कल्पना करना  फ़िज़ूल है.इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही भली लगती है  कि उन पर या उनके धर्म पर किसी तरह की आंच न आये.एक ग्रुप जो हुसैन के समर्थन में है..उसे रश्दी और तसलीमा से उतना ही दुराव है.और जिन्हें तसलीमा और रश्दी या वह कार्टूनिस्ट सब से बड़ा मुक्तिबोध नज़र आता है  उन्हें हुसैन से  ओसामा लादेन की हद तक नफ़रत है.
ऐसी दोहरी मानसिकता या दोहरे मापदंड ....पूछने की कोई ज़रुरत नहीं है कि यार तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?  तीसरा ख़ाना भी है  जिस में चंद लोगों की टोली है जो गाहे-ब-गाहे अपनी उपस्थिति इस नाते दर्ज कराता रहता है कि हम अभी ज़िंदा हैं.लेकिन नक्क़ार ख़ाने में तूती की भला क्या औक़ात!!


अदब-नवाज़ एक दोस्त ने किसी का शेर अपने तईं बदल कर मेरे चेहरे पर चस्पां कर दिया:

अदब का खून होता है तो मेरी रूह रोती है
अदब के साथ बे-अदबी बहुत तकलीफ़ होती है.

बे-अदबी कौन कर रहा है....बे-अदब कौन हैं यहाँ मानने को....विवेकानंद  का स्मरण यूँ नहीं होता....जो दूसरों से नफरत करता है वह खुद पतीत हुए बिना नहीं रहता..
क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी सदी के आखरी दशकों में ज्यादा से ज़्यादा धार्मिक होते गए...जिसे मैं धर्मांध होना कहता हूँ....फिर विवेकानंद ...धार्मिक पुनरुत्थान से गौरव भी है और खतरा भी, क्योंकि पुनरुत्थान कभी-कभी धर्मान्धता को जन्म देता है.धर्मान्धता इस सीमा तक पहुच जाति है की जिन लोगों ने इसकी शुरुआत की थी वे एक सीमा पश्चात इस पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो यह उनके नियंत्रण में नहीं रहती...हम ठीक इसी दौर में नहीं आ पहुंचे....
.क्या ईमान या किसी तरह की आस्था इतनी बौनी हो गयी कि कोई भी दुत्कार दे, लतिया दे.......क्या ऐसे सवाल गैर वाजिब हैं....

या कि यह अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक की सत्ता का खेल है..जहां आम लोगों की हैसियत .महज़ गिनती के लिए होती है..बगला देश , इरान या हिन्दुस्तान से रुसवा फ़नकारों के हाल-ज़ार को [यकीनन  वह फ़नकार  हैं!! ]  सी ए ज़ेड के इस उद्धरण से समझा जा सकता है: मनुष्य समाज का जो कबीला, जो जाति, जो धर्म सत्ता में आता  है तो वह समाज की श्रेष्ठता के पैमाने अपनी श्रेष्ठता के आधार पर बना देता है. यानी सत्ता पाए हुए की शक्ति ही व्यवस्था और कानून हो जाया करती है.
मेरी कैफ़ियत फिलवक्त अजब कश-म-कश की शिकार है  ..लेकिन अब बक़ौल लाओत्से , मैं जो भी कह रहा हूँ या कहना चाहता हूँ वह सत्य  के आस-पास भी  हो सकता है .

 आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं .

Indian Art (World of Art) Indian PaintingKama Sutra - Essentials for Lasting Intimacy

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

इन्द्रियों पर नियंत्रण सब से बड़ा जिहाद है.


संतान की तरह सेवकों की सेवा करो.उन्हें वही खिलाओ जो तुम खाते हो.
बदन से पसीना गिरने से पूर्व ही मजदूरों को उनकी मजदूरी दे दो.
अनाथ और औरतों का हक मारना सब से बड़ा गुनाह है.
तुम में सब से बेहतर वह है जो अपनी पत्नी के साथ सब से अच्छा व्यवहार करे.
पानी कम से कम खर्च करो.ख्वाह वुजू ही क्यों न कर रहे हो और दरिया के पास क्यों न बैठे हो.


ऐसी अनगिनत कई बातें हैं जो अत्यंत महत्वपूर्ण और संग्रहणीय  हैं जिसे इस्लाम के संस्थापक कहे जाने वाले  पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद [स.] ने कहीं है.आज दरअसल उन्हीं का जन्मोत्सव ईद  मिलादुन नबी  मनाया जा रहा है.भारत में इसकी शुरुआत [यानी जिस तरह आज यह मनाया जाता है]  कोलकाता से मानी जाती है.इस मौके पर सब से पहला जुलुस १९११ के आस-पास इसी शहर के मुसलामानों ने निकाला था.दरअसल हनफी सुन्नी सम्प्रदाय के दो मुख्य वैचारिक केद्र हैं.देवबंद स्कूल और बरेली स्कूल.देवबंद स्कूल का मान्न्ना है की जब हुजुर ने ही अपना या अपने किसी स्नेही जनों का जनोत्सव नहीं मनाया तो फिर हम लोग उनका क्यों मनाएं.और फिर इस्लामी कलेंडर के मुताबिक़ जो उनकी पैदाइश की तारीख़  है वही दुर्भाग्य से उनकी देहावसान की भी है.इस तरह ज़ाहिर है की बरेली स्कूल इसे जोर-शोर के साथ मनाता है.अब तो बाज़ाप्ता सरकारी अवकाश भी रहता है.खैर ये एक अलग मुद्दा है.बात हम प्यारे नबी की कर रहे थे.


कुछ बातें उनके बारे में [ईद मिलाद-उन-नबी पर]

अरब के रेगिस्तानी इलाके के अनाम से शहर मक्का में अब्दुल मुताल्लिब के सब से छोटे बेटे अब्दुल्लाह के यहाँ २ अप्रेल, सन ५७१ को सूरज की पहली किरण के साथ पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद का जन्म हुआ.जन्म से पूर्व ही उनके पिता की मौत हो गयी थी. कुछ ही दिनों में माँ की ममता से भी वंचित हो गए.इस अनाथ बच्चे को सहारा देने आये दादा भी दो साल बाद चल बसे.सारा दुःख-दर्द सिर्फ आठ साल के दरम्यान बच्चे की परवरिश चाचा अबू तालिब ने की.घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी.वह चरवाहा बन गए. रोज़ी-रोटी की जुगत में १२ साल का बच्चा चाचा के साथ दूर देश भी गया.यानी घर से दूर.अपने साथ बूढी और मजबूर औरतों का सामान भी ले लिया ताकि उनके बिकने पर उन मजबूरों की कुछ आमदनी हो सके.आप मजबूरों और कमजोरों का हर पल ध्यान रखते.कई ऐसे गुण थे बालपन से ही कि  उन्हें अमीन [अमानतदार]  और सादिक़ [सच्चा ] की लोक उपाधि बचपन में ही मिल गयी.मशहूर अमरीकी विज्ञानिक हार्ट मायकिल एच हार्ट ने कहा है, वह इतिहास के अकेले आदमी हैं जो धार्मिक और सांसरिक दोनों स्तरों पर काफी कामयाब रहे. [दी १०० न्यू यार्क १९७८]

वह अपना काम खुद ही कर लिया करते थे.राज्य-प्रमुख होने के बाद भी आपके स्वभाव और रहन-सहन में किंचित अंतर न आया.आपने घर से बाहर तक का दायित्व बखूबी  निभाया.कई पत्नियों [सिर्फ एक को छोड़कर बाक़ी आठ पत्नियों की उम्र आप से डेढ़ गुना थी और जब कुर'आन की सूरत ने चार बीबियों की शर्त  आयद कर दी तो उसके बाद आपकी निकाह में चार से ज्यादा पत्नी नहीं रहीं..और ये भी बताता  चलूँ   कि नए शोध्य के अनुसार उनकी आखरी पत्नी आयेशा की उम्र सत्रह वर्ष थी जब आप ब्याहकर लाये. ]और बच्चों की ज़िम्मेदारी के बावजूद आपका घरेलु, सामाजिक और अध्यात्मिक जीवन एक आदर्श है.नबूवत [इस्लाम की घोषणा] से पहले भी लड़ाई-झगड़े और वाद-विवाद के निपटारे के लिए लोग आपके पास आते थे.आपका  फ़ैसला  पतथर  की लकीर माना जाता.नबूवत के बाद भी वही नज़रिया रहा. एक दफा दो लोग आपके पास वाजिब निर्णय के लिए आये.आपने सच का साथ दिया.फ़ैसला यहूदी के पक्ष में गया.जबकि दूसरा व्यक्ति मुसलमान था.

एक बार एक शख्स आपके यहाँ आया.आपने मेहमाननवाजी में कोई कसर न छोड़ी.सुबह जब आप उसके कमरे में गए, तो उसे नदारद पाया.चारों तरफ गन्दगी फैली थी.आप जब नापाक बिस्तर धो रहे थे कि वह लौटा.आपने उसकी खैरियत पूछी.रात अचानक उसकी तैबियत खराब हो जाने की सूचना नहीं देने पर आपने नाराज़गी जतलाई.अथिति अत्यंत लज्जित हुआ.उसने कहा , मैं तो आपका क़त्ल करने के इरादे से आया था.तैबियत अचानक बिगड़ जाने के कारण सुबह-सुबह ही यहाँ से निकल पड़ा.याद आया कि तलवार तो यहीं छुट गयी उसे ही लेने अभी आया हूँ.उस व्यक्ति ने तुरंत ही क्षमा-याचना की.और शिष्य बन गया.ऐसा कई किस्से हैं जो  इंसानियत को रौशन करते हैं.सत्ता-परिवर्तन के बावजूद आपने इसाई और यहूदी जनता के साथ न-इंसाफी नहीं होने दी.दीं के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं [कुर'आन]. आपने जितनी भी लड़ाईयां लड़ीं सभी रक्षात्मक थीं.आपने कहा, किसी गोरे का किसी काले पर, किसी बड़े का किसी छोटे पर और किसी अमीर का किसी  ग़रीब पर कोई प्रभुत्व नहीं. नौकर-मालिक के कथित अंतर को अपनी बहन जैनब की शादी कतिपय गुलाम ज़ैद बिन हारिस के साथ  कर मिटाया.प्यासे कुत्ते को पानी पिलाने वाली चरित्रहीन औरत को जन्नती तो भूख-प्यास से एक बिल्ली को मारने वाली नेक-नमाज़ी औरत को जहन्नमी बताया.आर्थिक गैर-बराबरी को पाटने के लिए आपने ज़कात और फ़ितरा संपत्ति पर निश्चित अंश दान  हर साल करना  हर व्यक्ति पर वाजिब बतलाया.अगर किसी के पास कुछ नहीं है तो हुजुर ने कहा की एक मुस्कान ही सही लोगों के बीच बांटो.निदा फ़ाज़ली जैसे शायर ने जभी कहा एक रोते हुए बच्चे को हंसाया जाय!सदी के महाचिन्तक विवेकानंद ने लिखा है, किसी धर्म ने पूरी तरह से समान अधिकार की बात की है, तो वह सिर्फ इस्लाम है.[पत्र संग्रह १७५].

पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद ने जब रूढ़ीवाद, अंधविश्वास और अराजकता का विरोध करना शुरू किया तो आपको परेशान किया जाने लगा. आपके क़त्ल की कई असफल कोशिशें हुईं.लेकिन आपने कभी बदले  का विचार नहीं किया.सत्य, समानता और मानवाधिकार की शिक्षा एक ऐसे व्यक्ति ने दी, जो उम्मी [अनपढ़] था, और जो सिर्फ २२हज़ार, ३३० दिन और ६ घंटे इस नश्वर संसार में रहा.


Muhammad: A Biography of the ProphetMuhammad (PBU)_Islam-Allah-Muslim-Quran-Necklace Chain+Gift BoxAbout Our Love For Prophet Mohammad

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

नेताओं का मिशन :कमीशन दर कमीशन

हाल-बेहाल बैसाखी छोड़ , खड़ा हो मुसलमान


तुष्टिकरण

भाजपा नेतृत्व की सरकार हो तो हर ओर हिन्दू-हिन्दू !!और इसके बरक्स सरकार कांग्रेसी नेतृत्व की रही तो मुसलमानों  का शोर है.हमें इस तरह के शोर की मुखालिफ़त करनी चाहिए.ऐसी सारी राजनितिक क़वायद "तुष्टिकरण" के खाते में ही चली जाती है.

विभाजन

 ऐसा नासूर जो रह-रह कर टीस देता रहता है.लेकिन इसका खामियाजा सबसे ज्यादा मुसलमानों  को ही भुगतना  पड़ा.दीगर कि  आज की नस्ल इन सब से किसी तरह का लेना-देना रखना नहीं चाहती.विभाजन से पूर्व मुसलमानों की स्थिति सरकारी सेवाओं में ३३-३५ फीसदी तक आंकड़ों में थी , आज महज़ एक फीसदी पर आ टिकी है.घोर सेकुलर वामपंथी हुकूमत में ३२ सालों बाद भी पश्चिम बंगाल में ये फ़ीसद चार के आस-पास है.सरकारी आंकड़े कहते हैं कि  मुसलमानों  की हैसियत दलितों से भी बदतर है.यह कडुआ सच है!

इसकी कई वजहें हैं.बंटवारे के समय के भीषण  दंगे.पलायन का न ख़त्म होने वाला सिलसिला.अजब कश-म-कश रही कि इधर जाएँ या उधर रहे.आज़ादी-बाद के दो दशक इसी में निकल गए.फिर ज़रा स्थिरता आई तो लोग काम-धंधे, पढाई-लिखाई में लगे कि बांग्लादेश का मामला आ टपका.आज भी लाखों आबादी अधर में लटकी है.न बांग्लादेश  रखने को राज़ी है, न पाकिस्तान और न ही भारत! इनकी अलग दुखांत-कथा है.इन्हें इनके हाल पर छोड़ कर!

हम आगे बढ़ते हैं..लेकिन भारतीय मुसलमान ने फिर कोशिश की चार क़दम  आगे बढाने की ..लेकिन क्रम से हुए आर्थिक ठिकाने वाले उसके शहरों के दंगे ने उसकी कमर तोड़ दी.बाबरी नाम का जिन सामने आ गया..जिसने घी का ही काम क्या..घर जलते रहे....बावजूद एक तबका अपनी जद्दोजिहद में लीन रहा...जिसका परिणाम है कि आज हर क्षेत्र में मुस्लिम नाम नज़र आने लगा है.लेकिन बुरी नज़र फिर लग गयी.ओसामा जैसे लोगों को यह पसंद न आया..उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी करतूतों में करने की रार ले ली.कुछ तो आ गए  ग़ालिब की उनकी जन्नत में...बकिया को हमारी कर्मठ पुलिस ने ज़बरदस्ती आतंकवादी बनाने में कसर न छोडी.लेकिन उसकी तरक्की की रफ़्तार जारी है...उनकी ज़िद है:

नशेमन-दर-नशेमन इस क़दर तामीर करता जा
बिजली गिरते-गिरते खुद-ब-खुद बेज़ार हो जाय!


ठीक है कि यह आंकडा कोई ग्राफ नहीं बनाता..लेकिन नाउम्मीदी कुफ्र है..यह वह  जानता है...गर अपनी तमाम कोशिशों और विश्वासों के साथ उसने आगे बढ़ने की  ठान  ली है तो ग्राफ भी अवश्य ही बढेगा.

सियासत

मुसलमानों की दुर्दशा को लेकर हरेक दल ने आंसू बहाए..हरेक ने उसे गोद लेना चाहा.पुचकारने की कोशिश की..समय-समय पर कमीशन-दर-कमीशन बनाए जाते रहे..तुष्टिकरण का नारा लगानेवाली भाजपा ने भी अपने यहाँ अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बरक़रार रखा..उसकी हुकूमत में भी ऐसे आयोग काम करते रहे..इसके अलावा कई नीतियाँ कई घोषणाएं सरकारी अमले करते रहे...लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि इसका फायदा आज तक आम मुसलमान को नहीं मिला..यूँ हर एलान के वक़्त वह खुश होता रहा कि अब उसका कुछ भला अवश्य होगा..उसके दिन फिरेंगे..काया पलट होगी..उसकी भी...लेकिन यह पलट तो होती है..लेकिन उनकी जो इनके रहनुमा कहे जाते हैं..जो इनकी सियासत करते हैं..और ऐसे नामों की ज़रूरत हर सियासी पार्टियों को रहती है.यही गोटियाँ बिठाते हैं और मुस्लिम के नाम पर सेंकी  गयी रोटियाँ भी यही चुभलाते, डकारते रहते हैं..सरकार अरबों-खरबों का फंड देती है..कभी तो इसकी राशि  सरकारी खजाने में  वापस चली जाती है..तो कभी इसका इस्तेमाल दर्शित हुआ भी, तो लाभ उन्हें मिला जिनके पेट भरे ही रहते हैं..यानी ..जो नेता या आक़ा के करीबी हैं.आम धारणा है कि  बड़े ओहदे पर पहुंचे कुछ ही मुस्लिम रहनुमा ऐसे हुए हैं जिन्होंने कौम के लिए कुछ भला किया.ऐसे लोगों में मौलाना आज़ाद, रफ़ी अहमद किदवई, ज़ाकिर हुसैन और जाफ़र शरीफ़ का शुमार किया जा सकता है.

आरक्षण का शोशा

अब तक ज्यादा-तर हुकूमत कांग्रस की रही है.उन्नति-अवनति का दारोमदार बेहिचक उसके सर है.लेकिन उसे औचक  होश आया [जैसा अब वामपंथियों को आ रहा है] कि मुसलमान-मुसलमान तो हम रटते रहे , किया क्या उनके लिए.यूँ भी उनसे यह तबक़ा नाराज़ चल रहा था. क्यों न एक आयोग बैठा दिया जाय.फैसला तो लोकसभा को करना है.जी जनाब!! तो इस तरह यूपीए ने अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समाज की स्थिति आंकने के लिए दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश रहे राजेन्द्र सच्चर की सदारत में एक कमीशन का गठन करवा दिया.कमीशन ने मुसलमानों की दुर्दशा का बेबाक वर्णन किया. जिसका लाभ लेते हुए मुर्दे पड़े मुस्लिम नेतृत्व  में जान आ गयी विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा है कि विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.

इंदिरा  गांधी ने भी ऐसा ही एक आयोग गोपाल सिंह  की अध्यक्षता में बनवाया था.उसकी रपट भी दर्दनाक है.लेकिन भैया अब तक उस पर अमल क्या हुआ !!
खैर !! सच्चर रिपोर्ट को कैसे लागू किया जाय.एक और आयोग ! अब श्री रंगनाथ मिश्रा का चयन.आप भी जज रहे हैं.इन्हों ने राय दी कि सरकारी नौकरियों में पिछड़े समूहों को दिए जाने वाले २७% आरक्षण कोटे में ८% अल्पसंख्यकों को भी दिया जाय.और मुस्लिम आबादी के हिसाब से उन्हें ६% सुविधा दी जाय.तुरंत कभी दिग्गज रहे मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने मांग की  "मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए, रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए."

यह सच है कि संविधान की धारा-२९ में शैक्षिक इन्तिज़ाम होने के बावजूद मुसलमान शैक्षणिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर पिछड़ता  चला गया है.लेकिन क्या वास्तव में सियासत उनकी दशा सुधारना चाहती है.क्या रंगनाथ कमीशन की संस्तुतियों को पूरा करना सहज है!!जैसे सुझाव दिए गए हैं, उस से विवाद के अलावा और क्या रास्ता बचता है !क्या अनुसूचित जाति  या जनजाति  या पिछड़े अपनी हिस्सेदारी में इनका हिस्सा सहर्ष दे देंगे ! दूसरी जानिब महिला आरक्षण का बिल लंबित है .सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि ५०% से ज़्यादा कोटा नहीं होना चाहिए ! वहीँ रंगनाथ कमीशन इसी में से १५% कोटा अल्पसंख्यकों  के लिए चाहता है.यानी न नौ मन तेल होगा, न ही राधा नाचेगी!!


भीख का प्याला नहीं चाहिए

मेरे मुस्लिम  साथियों, बहनों, भाइयों, बुजुर्गों !

आप  सियासत को बखूबी समझने की कोशिश कीजिये.किसी भी तरह के सरकारी आरक्षण की मुखालिफ़त कीजिये.हाँ सरकार से या रहनुमाओं से बस इतनी गुजारिश करें कि उनके साथ सौतेला बर्ताव न किया जाय, उनके बच्चों को नाहक़ पुलिस परेशान न करे.उन्हें अपने बूते पढने-लिखने दिया जाय...हर तरह की स्पर्धा में वह हिस्सा लेने  की सामर्थ्य रखते हैं. बस अवसर की ज़रूरत है.बहुत कुछ करने की गर उनकी मंशा है तो बस इतना करे सरकार कि उन्हें पढने-लिखने की सहूलियतें फराहम कराये.उनके लिए स्कूल खोले जाएँ.मदरसा को आधुनिक  शिक्षा से जोड़ा जाय.
आपको खुद आगे आना होगा... अपनी ताक़त पैदा करनी होगी..इस सिलसिले में हमवतन गैर-मुस्लिम भाइयों को भी खुले दिल-मन से साथ देना होगा.जब तक आप अपने बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे..तरक्की असंभव है.किसी भी तरह के कमीशन पर भरोसा हरगिज़ न करें इस में सिवाय वोट बैंक सियासत के इनके लिए कुछ भी धरा नहीं है.आप अच्छी तरह समझ लें  कि किसी भी किस्म का आरक्षण उन्हें लाभ पहुचने वाला नहीं है.गर वह भीख के इस प्याले के चक्कर में रहे तो जो दो-चार नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होंकर सामने आ पाते हैं, वह  भी मेहनत  से जी चुराने लगेंगे.जानता हूँ, स्थितियां अनुकूल नहीं हैं, आप पर कई तरह के पहरे हैं..लेकिन इम्तिहान का मज़ा भी तब ही है यारो!!  अंत में यही कहने का जी है:

डर गए मौजों से जो साहिल से पतथर ले गए
डूबने का शौक़ जिसको है गुहर ले जाएगा 





Indian MuslimNa Main Hindu Na Main MuslimSeparatism Among Indian Muslims: The Politics of the United Provinces' Muslims, 1860-1923 (Cambridge South Asian Studies)
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