शुक्रवार, 5 मार्च 2010

या हुसैन वा हुसैन...तस्लीम [A] कर या न कर

नींद ....अचानक कभी नहीं ...आई लेकिन इधर ऐसा ही हो रहा है...और जानते हैं..उसका समय कब होता है जब मैं खर्राटें लेने लगता हूँ..ठीक उसी वक़्त  मुआज्ज़िन  अज़ान पुकार रहा होता है या दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही होती है ...जी आप सही समझ रहे हैं..रूह जब तक फ़िज़ूल की बक से कलांत और मस्तिष्क की शिराएँ सिकुड़ चुकी होती हैं...अजब रूह का रिश्ता है सारी दुनिया में...ऐसा उस पर पड़ते दबाव के सबब होता होगा ,,संभव है  .लेकिन मुझे कोई रोग नहीं है..मैं तो क़तई नहीं मान सकता ..हाँ इंसानियत ....की इस्मत ..लुटी जा रही है..संस्कृति का  शील भंग करने की कोशिशें की जा रही हैं  या  सभ्यता , कला, साहित्य सृजन ....का शाब्दिक बलात्कार हो रहा है....और हैरानकुन यह है कि ऐसा  करने वाले धार्मिक लोग हैं...खुद को वह ऐसा ही मानते हैं..आप न मानें ठेंगे से!!
और  ऐसे कई कारण हैं ..जैसे गोधरा, जैसे मुकम्मल तब का गुजरात...दिल्ली की दहशत..मुंबई में .....आततायियों का तीन दिनी खुला राज ....लेखक और चित्रकार का देस निकाला......ज़हन कुंद और दिमाग़ शिथिल होता जाता है..
मैं .....सोच नहीं पाता ..ऐसा क्यों..मैं मुसलमान हूँ..तो रश्दी का समर्थन करूँ या विरोध..कोई पूछता है..आपने हुसैन का समर्थन नहीं किया..क्या इसलिए कि आप मुसलमान हैं...मैं हुसैन को जानता हूँ..तसलीमा को जानता हूँ  रश्दी को उनके मुकाबले कम जानता हूँ..और हाँ उस कार्टून को भी देखा है.......जिसे लोग पैगम्बर के नाम से मंसूब करते हैं.....और एक निर्वस्त्र  स्त्री का चित्र भी देख रहा हूँ जिसे कई लोग सरस्वती कह रहे हैं...



 क्या ज़रूरी है कि आपकी माँ को लोग उसी नज़रिए से देखें...
.कोई उनमें सुन्दरता भी खोज सकता है..किसी को आपकी स्त्री कामदेवी   भी लग सकती हैं..कोई घुप्प अंधेरें में जागती आँखों उनके साथ सम्भोग भी करना चाहता हो....ये सरासर गलत हो सकता है ..इसे अपराध या पाप भी आप कह सकते हैं .

माँ की  जगह पत्नी बहन प्रेमिका कुछ भी हो..मेरा कहना  यह कि आप जिसे जिस रिश्ते, जिस स्नेह या जिस सम्मान से देखते हैं.जैसा बर्ताव करते हैं..यह ज़रूरी नहीं कि आपका पड़ोसी भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करे...ठीक है किसी ने एक कार्टून बनाया और पैगम्बर का नाम दे दिया.....किसी ने एक स्त्री को नंगा दिखाया..और उसे किसी देवी का नाम दे दिया गया....मैं नहीं जनता कि उस बनाने वाले का क्या उद्देश्य रहा होगा..मेरा तो यह कहना है.कि आप उस चित्र को अपना पैगम्बर क्यों मानते हैं..या अपनी देवी क्यों मान लिया.. बाबा तुलसी के यह शब्द :

जाकी  रही  भावना  जैसे
प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी 
 

आपने अब तक जो पढ़ा ..आपकी अपने धर्म में जैसी श्रद्धा रही..क्या ये कथित तस्वीरें उन से मिलती हैं..जवाब होगा क़तई नहीं...तो आप क्यों आसमान सर पर उठाए फिर रहे हैं..ज़माने में और भी ग़म हैं..लोगों....

और आप जानते हैं..कला और साहित्य यानी सृजन-धर्मा लोग ज़रा अलग होते हैं...आप इन्हें आज की ज़बान में एडिअट्स कह सकते हैं.....लेकिन जानते हैं आप ..अब मैं उन हदीस का क्या करूँ जिनमें लिखा है.....लेखकों की स्याही शहीदों के खून से भी पवित्र होती है......
अब रश्दी ..तसलीमा  .......किसी ने कहा..आप इनमें हुसैन को भी साथ कर लें ..इन्हें आता-जाता कुछ नहीं..हाँ इनकी पकड़ बाज़ार पर खूब है..और बस ...यही उनकी सफलता का राज़ है  [इसे आप सार्थकता क़तई न समझें...सार्थक फ़नकार तो रामकुमार, रज़ा या प्रभा खेतान  और अरुंधती राय जैसे लोग होते हैं].

क्या हम मान लें.....आवेश की बात कि तसलीमा तोगड़िया की ज़बान  बोलती हैं.....या एक दूसरे मित्र का ब्यान कि रश्दी रोज़ सिगरेट की तरह स्त्री क्यों बदलते हैं ......हुसैन को सिर्फ माधुरी और स्तन-नितम्ब ही दिखाई क्यों देता है...



नाश्ता ..नहीं किया..बच्चा रो रहा है..आप कहाँ हैं..जब पत्नी ने टोका..तो तन्द्रा भंग हुई....




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ....क्या ज़रूरी नहीं..क्या समाज के निर्माण में आप लेखक-फ़नकारों के योगदान को यूँ ही ख़ारिज कर देंगे....
आज़ादी का अर्थ यह तो नहीं कि आप अपनी धुन में ..नाली पर ढेला दर ढेला चलाते जाएँ..और किसी को उसकी गंदगी पर आपत्ति हो तो उस से मुंहजोरी करें......

 साहित्य  या ऐसी दूसरी कलागत विधा क्या आपसी नफरतों का विस्तार है.....
.प्रेमचंद गलत  थे या लूशुन ! जिन्होंने साहित्य कला को सबसे उंचा मक़ाम दिया....समाज के विवेक ..आगे चलने वाली मशाल ......
 अजंता या एलोरा या इरानी मुसव्विर जिसने ढ़ेरों नबियों के चित्र बनाए...जिनका ज़िक्र क़ुर्रतुल एन   हैदर ने अपने एक उपन्यास गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन में  किया है ,..
आप क्या करेंगे !!!!माथा टन..टन करता  है न !!

तीन वर्गों में विभक्त लोगों से क्या स्वस्थ्य  वाद-विवाद संभव है!!दो से तो ऐसी कल्पना करना  फ़िज़ूल है.इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही भली लगती है  कि उन पर या उनके धर्म पर किसी तरह की आंच न आये.एक ग्रुप जो हुसैन के समर्थन में है..उसे रश्दी और तसलीमा से उतना ही दुराव है.और जिन्हें तसलीमा और रश्दी या वह कार्टूनिस्ट सब से बड़ा मुक्तिबोध नज़र आता है  उन्हें हुसैन से  ओसामा लादेन की हद तक नफ़रत है.
ऐसी दोहरी मानसिकता या दोहरे मापदंड ....पूछने की कोई ज़रुरत नहीं है कि यार तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?  तीसरा ख़ाना भी है  जिस में चंद लोगों की टोली है जो गाहे-ब-गाहे अपनी उपस्थिति इस नाते दर्ज कराता रहता है कि हम अभी ज़िंदा हैं.लेकिन नक्क़ार ख़ाने में तूती की भला क्या औक़ात!!


अदब-नवाज़ एक दोस्त ने किसी का शेर अपने तईं बदल कर मेरे चेहरे पर चस्पां कर दिया:

अदब का खून होता है तो मेरी रूह रोती है
अदब के साथ बे-अदबी बहुत तकलीफ़ होती है.

बे-अदबी कौन कर रहा है....बे-अदब कौन हैं यहाँ मानने को....विवेकानंद  का स्मरण यूँ नहीं होता....जो दूसरों से नफरत करता है वह खुद पतीत हुए बिना नहीं रहता..
क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी सदी के आखरी दशकों में ज्यादा से ज़्यादा धार्मिक होते गए...जिसे मैं धर्मांध होना कहता हूँ....फिर विवेकानंद ...धार्मिक पुनरुत्थान से गौरव भी है और खतरा भी, क्योंकि पुनरुत्थान कभी-कभी धर्मान्धता को जन्म देता है.धर्मान्धता इस सीमा तक पहुच जाति है की जिन लोगों ने इसकी शुरुआत की थी वे एक सीमा पश्चात इस पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो यह उनके नियंत्रण में नहीं रहती...हम ठीक इसी दौर में नहीं आ पहुंचे....
.क्या ईमान या किसी तरह की आस्था इतनी बौनी हो गयी कि कोई भी दुत्कार दे, लतिया दे.......क्या ऐसे सवाल गैर वाजिब हैं....

या कि यह अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक की सत्ता का खेल है..जहां आम लोगों की हैसियत .महज़ गिनती के लिए होती है..बगला देश , इरान या हिन्दुस्तान से रुसवा फ़नकारों के हाल-ज़ार को [यकीनन  वह फ़नकार  हैं!! ]  सी ए ज़ेड के इस उद्धरण से समझा जा सकता है: मनुष्य समाज का जो कबीला, जो जाति, जो धर्म सत्ता में आता  है तो वह समाज की श्रेष्ठता के पैमाने अपनी श्रेष्ठता के आधार पर बना देता है. यानी सत्ता पाए हुए की शक्ति ही व्यवस्था और कानून हो जाया करती है.
मेरी कैफ़ियत फिलवक्त अजब कश-म-कश की शिकार है  ..लेकिन अब बक़ौल लाओत्से , मैं जो भी कह रहा हूँ या कहना चाहता हूँ वह सत्य  के आस-पास भी  हो सकता है .

 आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं .

Indian Art (World of Art) Indian PaintingKama Sutra - Essentials for Lasting Intimacy

10 comments:

अमलेन्दु उपाध्याय ने कहा…

शहरोज भाई,
बात तो काफी हद तक सही है आपकी। मुझे तो लगता है कि रूश्दी और तस्लीमा दानों ही घटिया दर्जे के सड़कछाप लेखक हैं। लेकिन एम एफ हुसैन के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन हुसैन के समर्थन और विरोध में लोगों के अपने अपने तर्क हो सकते हैं। मेरा मानना तो यह है कि अगर किसी रूश्दी और तस्लीमा के कुछ लिखने से इस्लाम खतरे में आ जाए या हुसैन की कूची से देवियां खतरे में आ जाए तो वह मजहब काफी कमजोर है

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

जोर से बोलो अलाह हो अकबर!!!!

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

shahroz sb aap chaahte kya hain ki ham sabhi haider saahiba ki tarah un tasveeron ko kitab k pannon se niklaakar gale ka tauq pahan len ya ki cartoon ko apne ghar ki deevar par chipka den.
soch samajh kar likhen.

सतीश सक्सेना ने कहा…

शहरोज भाई !
बात सिर्फ अपने अपने सोच की है , किस परिवार में जैसे किस्से किवदंतियां और अपने अनपढ़ या पढ़े लिखे माँ बाप को सुनकर सुन कर बच्चे बड़े हुए हैं ! बचपन की शिक्षाओं और संस्कारों से बनी सोच ही उस परिवार की आगे आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाती है ! यही सोच कुछ परिवारों में कठमुल्ला और कहीं त्रिशूल धारियों को पैदा करती है ! इस सोच को पनपने से रोकने के लिए, हम सबको साथ साथ, बिना हताश हुए प्रयत्न करने होंगे ! हिन्दू और मुसलमान को समवेत गाना होगा कि यह देश हम सबका है !
आइये हम सब दुआ करें कि इसकी शुरुआत जल्दी हो सके !

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

अपने सार्वजनिक जीवन में हमें प्रयास करना होगा समझने समझाने का... और यह काम प्रेम पूर्वक ही करना होगा...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

नहीं शहरोज़ भाई, अपना धर्म, अपनी आस्था इतनी कमज़ोर नहीं है कि किसी के अंगुली उठाते ही हिल जाये. हमारे संस्कारों की नींव यदि मजबूत है तो किसी के चित्र, किसी के उपन्यास हमें विचलित नहीं कर सकते. हम में हमेशा सही का पक्ष लेने की सामर्थ्य होनी चाहिये. गलत वो चाहे किसी भी धर्म का हो, उसे गलत कहने में भी झिझक नहीं होनी चाहिये. बहुत सच्ची बात है कि- जाकि रही भावना जैसी........ खजुराहो के शिल्प में अश्लीलता देखते हैं लोग? उन्हें भी तो हम मन्दिर ही कहते हैं- खजुराहो के मन्दिर. जाति-धर्म का मसला हम कब तक हल करते रहेंगे? चन्द लोग जो जातीय विद्वेष बढाना चाहते हैं, हम परेशान हो, उनके मन्सूबे कामया क्यों कर देते हैं?

राज भाटिय़ा ने कहा…

शहरोज़ भाई,आप के लेख से सह्मत है, लेकिन जब इन मुर्खो के कारण आम जनता भडकती है तो कितने वे कसूर मारे जाते है, कितनी ओरतो की इज्जत लूटी जाती है सिर्फ़ ओर सिर्फ़ इन बेकार के लोगो के कारण, इन से ना तो इस्लाम ही खतरे मै पडता है, ओर ना ही हमारे देवी देवता,

rahil ने कहा…

भाईजब इन मुर्खो के कारण आम जनता भडकती है तो कितने वे कसूर मारे जाते हैमुझे अफ़सोस है की पढ़े लिखे लोग ऐसी गलती करते हैं ...........

rahil ने कहा…

पढकर अछा लगा बहूत उमदा लिख़ा आपने..........

Voice Of The People ने कहा…

शहरोज़ भाई आपकी बात सही है की किसी नए एक कार्टून बना के पैग़म्बर का नाम दे दिया या एक निर्वस्त्र औरत को बना के किसी देवी का नाम दे दिया तोह इस से न वोह कार्टून पैग़म्बर हो गया और न ही वोह निर्वस्त्र औरत देवी. लेकिन भाई हम एक समाज में रहते हैं जिसके कुछ कानून हैं और हम को इंसान कह जाता है. मां की इज्ज़त, देवी देवताओं की इज्ज़त करना हमारा धर्म है और दूसरों के जज़्बात को ठेस पहुँचाना इंसानियत नहीं कहलाती. और ऐसा करने वाले ही इस इंसानियत के नाम पे कलंक हैं. इन्ही लोगों के करण हज़ारूं बेगुनाह मारे जताए हैं.

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