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शुक्रवार, 5 मार्च 2010

या हुसैन वा हुसैन...तस्लीम [A] कर या न कर

नींद ....अचानक कभी नहीं ...आई लेकिन इधर ऐसा ही हो रहा है...और जानते हैं..उसका समय कब होता है जब मैं खर्राटें लेने लगता हूँ..ठीक उसी वक़्त  मुआज्ज़िन  अज़ान पुकार रहा होता है या दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही होती है ...जी आप सही समझ रहे हैं..रूह जब तक फ़िज़ूल की बक से कलांत और मस्तिष्क की शिराएँ सिकुड़ चुकी होती हैं...अजब रूह का रिश्ता है सारी दुनिया में...ऐसा उस पर पड़ते दबाव के सबब होता होगा ,,संभव है  .लेकिन मुझे कोई रोग नहीं है..मैं तो क़तई नहीं मान सकता ..हाँ इंसानियत ....की इस्मत ..लुटी जा रही है..संस्कृति का  शील भंग करने की कोशिशें की जा रही हैं  या  सभ्यता , कला, साहित्य सृजन ....का शाब्दिक बलात्कार हो रहा है....और हैरानकुन यह है कि ऐसा  करने वाले धार्मिक लोग हैं...खुद को वह ऐसा ही मानते हैं..आप न मानें ठेंगे से!!
और  ऐसे कई कारण हैं ..जैसे गोधरा, जैसे मुकम्मल तब का गुजरात...दिल्ली की दहशत..मुंबई में .....आततायियों का तीन दिनी खुला राज ....लेखक और चित्रकार का देस निकाला......ज़हन कुंद और दिमाग़ शिथिल होता जाता है..
मैं .....सोच नहीं पाता ..ऐसा क्यों..मैं मुसलमान हूँ..तो रश्दी का समर्थन करूँ या विरोध..कोई पूछता है..आपने हुसैन का समर्थन नहीं किया..क्या इसलिए कि आप मुसलमान हैं...मैं हुसैन को जानता हूँ..तसलीमा को जानता हूँ  रश्दी को उनके मुकाबले कम जानता हूँ..और हाँ उस कार्टून को भी देखा है.......जिसे लोग पैगम्बर के नाम से मंसूब करते हैं.....और एक निर्वस्त्र  स्त्री का चित्र भी देख रहा हूँ जिसे कई लोग सरस्वती कह रहे हैं...



 क्या ज़रूरी है कि आपकी माँ को लोग उसी नज़रिए से देखें...
.कोई उनमें सुन्दरता भी खोज सकता है..किसी को आपकी स्त्री कामदेवी   भी लग सकती हैं..कोई घुप्प अंधेरें में जागती आँखों उनके साथ सम्भोग भी करना चाहता हो....ये सरासर गलत हो सकता है ..इसे अपराध या पाप भी आप कह सकते हैं .

माँ की  जगह पत्नी बहन प्रेमिका कुछ भी हो..मेरा कहना  यह कि आप जिसे जिस रिश्ते, जिस स्नेह या जिस सम्मान से देखते हैं.जैसा बर्ताव करते हैं..यह ज़रूरी नहीं कि आपका पड़ोसी भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करे...ठीक है किसी ने एक कार्टून बनाया और पैगम्बर का नाम दे दिया.....किसी ने एक स्त्री को नंगा दिखाया..और उसे किसी देवी का नाम दे दिया गया....मैं नहीं जनता कि उस बनाने वाले का क्या उद्देश्य रहा होगा..मेरा तो यह कहना है.कि आप उस चित्र को अपना पैगम्बर क्यों मानते हैं..या अपनी देवी क्यों मान लिया.. बाबा तुलसी के यह शब्द :

जाकी  रही  भावना  जैसे
प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी 
 

आपने अब तक जो पढ़ा ..आपकी अपने धर्म में जैसी श्रद्धा रही..क्या ये कथित तस्वीरें उन से मिलती हैं..जवाब होगा क़तई नहीं...तो आप क्यों आसमान सर पर उठाए फिर रहे हैं..ज़माने में और भी ग़म हैं..लोगों....

और आप जानते हैं..कला और साहित्य यानी सृजन-धर्मा लोग ज़रा अलग होते हैं...आप इन्हें आज की ज़बान में एडिअट्स कह सकते हैं.....लेकिन जानते हैं आप ..अब मैं उन हदीस का क्या करूँ जिनमें लिखा है.....लेखकों की स्याही शहीदों के खून से भी पवित्र होती है......
अब रश्दी ..तसलीमा  .......किसी ने कहा..आप इनमें हुसैन को भी साथ कर लें ..इन्हें आता-जाता कुछ नहीं..हाँ इनकी पकड़ बाज़ार पर खूब है..और बस ...यही उनकी सफलता का राज़ है  [इसे आप सार्थकता क़तई न समझें...सार्थक फ़नकार तो रामकुमार, रज़ा या प्रभा खेतान  और अरुंधती राय जैसे लोग होते हैं].

क्या हम मान लें.....आवेश की बात कि तसलीमा तोगड़िया की ज़बान  बोलती हैं.....या एक दूसरे मित्र का ब्यान कि रश्दी रोज़ सिगरेट की तरह स्त्री क्यों बदलते हैं ......हुसैन को सिर्फ माधुरी और स्तन-नितम्ब ही दिखाई क्यों देता है...



नाश्ता ..नहीं किया..बच्चा रो रहा है..आप कहाँ हैं..जब पत्नी ने टोका..तो तन्द्रा भंग हुई....




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ....क्या ज़रूरी नहीं..क्या समाज के निर्माण में आप लेखक-फ़नकारों के योगदान को यूँ ही ख़ारिज कर देंगे....
आज़ादी का अर्थ यह तो नहीं कि आप अपनी धुन में ..नाली पर ढेला दर ढेला चलाते जाएँ..और किसी को उसकी गंदगी पर आपत्ति हो तो उस से मुंहजोरी करें......

 साहित्य  या ऐसी दूसरी कलागत विधा क्या आपसी नफरतों का विस्तार है.....
.प्रेमचंद गलत  थे या लूशुन ! जिन्होंने साहित्य कला को सबसे उंचा मक़ाम दिया....समाज के विवेक ..आगे चलने वाली मशाल ......
 अजंता या एलोरा या इरानी मुसव्विर जिसने ढ़ेरों नबियों के चित्र बनाए...जिनका ज़िक्र क़ुर्रतुल एन   हैदर ने अपने एक उपन्यास गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन में  किया है ,..
आप क्या करेंगे !!!!माथा टन..टन करता  है न !!

तीन वर्गों में विभक्त लोगों से क्या स्वस्थ्य  वाद-विवाद संभव है!!दो से तो ऐसी कल्पना करना  फ़िज़ूल है.इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही भली लगती है  कि उन पर या उनके धर्म पर किसी तरह की आंच न आये.एक ग्रुप जो हुसैन के समर्थन में है..उसे रश्दी और तसलीमा से उतना ही दुराव है.और जिन्हें तसलीमा और रश्दी या वह कार्टूनिस्ट सब से बड़ा मुक्तिबोध नज़र आता है  उन्हें हुसैन से  ओसामा लादेन की हद तक नफ़रत है.
ऐसी दोहरी मानसिकता या दोहरे मापदंड ....पूछने की कोई ज़रुरत नहीं है कि यार तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?  तीसरा ख़ाना भी है  जिस में चंद लोगों की टोली है जो गाहे-ब-गाहे अपनी उपस्थिति इस नाते दर्ज कराता रहता है कि हम अभी ज़िंदा हैं.लेकिन नक्क़ार ख़ाने में तूती की भला क्या औक़ात!!


अदब-नवाज़ एक दोस्त ने किसी का शेर अपने तईं बदल कर मेरे चेहरे पर चस्पां कर दिया:

अदब का खून होता है तो मेरी रूह रोती है
अदब के साथ बे-अदबी बहुत तकलीफ़ होती है.

बे-अदबी कौन कर रहा है....बे-अदब कौन हैं यहाँ मानने को....विवेकानंद  का स्मरण यूँ नहीं होता....जो दूसरों से नफरत करता है वह खुद पतीत हुए बिना नहीं रहता..
क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी सदी के आखरी दशकों में ज्यादा से ज़्यादा धार्मिक होते गए...जिसे मैं धर्मांध होना कहता हूँ....फिर विवेकानंद ...धार्मिक पुनरुत्थान से गौरव भी है और खतरा भी, क्योंकि पुनरुत्थान कभी-कभी धर्मान्धता को जन्म देता है.धर्मान्धता इस सीमा तक पहुच जाति है की जिन लोगों ने इसकी शुरुआत की थी वे एक सीमा पश्चात इस पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो यह उनके नियंत्रण में नहीं रहती...हम ठीक इसी दौर में नहीं आ पहुंचे....
.क्या ईमान या किसी तरह की आस्था इतनी बौनी हो गयी कि कोई भी दुत्कार दे, लतिया दे.......क्या ऐसे सवाल गैर वाजिब हैं....

या कि यह अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक की सत्ता का खेल है..जहां आम लोगों की हैसियत .महज़ गिनती के लिए होती है..बगला देश , इरान या हिन्दुस्तान से रुसवा फ़नकारों के हाल-ज़ार को [यकीनन  वह फ़नकार  हैं!! ]  सी ए ज़ेड के इस उद्धरण से समझा जा सकता है: मनुष्य समाज का जो कबीला, जो जाति, जो धर्म सत्ता में आता  है तो वह समाज की श्रेष्ठता के पैमाने अपनी श्रेष्ठता के आधार पर बना देता है. यानी सत्ता पाए हुए की शक्ति ही व्यवस्था और कानून हो जाया करती है.
मेरी कैफ़ियत फिलवक्त अजब कश-म-कश की शिकार है  ..लेकिन अब बक़ौल लाओत्से , मैं जो भी कह रहा हूँ या कहना चाहता हूँ वह सत्य  के आस-पास भी  हो सकता है .

 आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं .

Indian Art (World of Art) Indian PaintingKama Sutra - Essentials for Lasting Intimacy

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

नेताओं का मिशन :कमीशन दर कमीशन

हाल-बेहाल बैसाखी छोड़ , खड़ा हो मुसलमान


तुष्टिकरण

भाजपा नेतृत्व की सरकार हो तो हर ओर हिन्दू-हिन्दू !!और इसके बरक्स सरकार कांग्रेसी नेतृत्व की रही तो मुसलमानों  का शोर है.हमें इस तरह के शोर की मुखालिफ़त करनी चाहिए.ऐसी सारी राजनितिक क़वायद "तुष्टिकरण" के खाते में ही चली जाती है.

विभाजन

 ऐसा नासूर जो रह-रह कर टीस देता रहता है.लेकिन इसका खामियाजा सबसे ज्यादा मुसलमानों  को ही भुगतना  पड़ा.दीगर कि  आज की नस्ल इन सब से किसी तरह का लेना-देना रखना नहीं चाहती.विभाजन से पूर्व मुसलमानों की स्थिति सरकारी सेवाओं में ३३-३५ फीसदी तक आंकड़ों में थी , आज महज़ एक फीसदी पर आ टिकी है.घोर सेकुलर वामपंथी हुकूमत में ३२ सालों बाद भी पश्चिम बंगाल में ये फ़ीसद चार के आस-पास है.सरकारी आंकड़े कहते हैं कि  मुसलमानों  की हैसियत दलितों से भी बदतर है.यह कडुआ सच है!

इसकी कई वजहें हैं.बंटवारे के समय के भीषण  दंगे.पलायन का न ख़त्म होने वाला सिलसिला.अजब कश-म-कश रही कि इधर जाएँ या उधर रहे.आज़ादी-बाद के दो दशक इसी में निकल गए.फिर ज़रा स्थिरता आई तो लोग काम-धंधे, पढाई-लिखाई में लगे कि बांग्लादेश का मामला आ टपका.आज भी लाखों आबादी अधर में लटकी है.न बांग्लादेश  रखने को राज़ी है, न पाकिस्तान और न ही भारत! इनकी अलग दुखांत-कथा है.इन्हें इनके हाल पर छोड़ कर!

हम आगे बढ़ते हैं..लेकिन भारतीय मुसलमान ने फिर कोशिश की चार क़दम  आगे बढाने की ..लेकिन क्रम से हुए आर्थिक ठिकाने वाले उसके शहरों के दंगे ने उसकी कमर तोड़ दी.बाबरी नाम का जिन सामने आ गया..जिसने घी का ही काम क्या..घर जलते रहे....बावजूद एक तबका अपनी जद्दोजिहद में लीन रहा...जिसका परिणाम है कि आज हर क्षेत्र में मुस्लिम नाम नज़र आने लगा है.लेकिन बुरी नज़र फिर लग गयी.ओसामा जैसे लोगों को यह पसंद न आया..उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी करतूतों में करने की रार ले ली.कुछ तो आ गए  ग़ालिब की उनकी जन्नत में...बकिया को हमारी कर्मठ पुलिस ने ज़बरदस्ती आतंकवादी बनाने में कसर न छोडी.लेकिन उसकी तरक्की की रफ़्तार जारी है...उनकी ज़िद है:

नशेमन-दर-नशेमन इस क़दर तामीर करता जा
बिजली गिरते-गिरते खुद-ब-खुद बेज़ार हो जाय!


ठीक है कि यह आंकडा कोई ग्राफ नहीं बनाता..लेकिन नाउम्मीदी कुफ्र है..यह वह  जानता है...गर अपनी तमाम कोशिशों और विश्वासों के साथ उसने आगे बढ़ने की  ठान  ली है तो ग्राफ भी अवश्य ही बढेगा.

सियासत

मुसलमानों की दुर्दशा को लेकर हरेक दल ने आंसू बहाए..हरेक ने उसे गोद लेना चाहा.पुचकारने की कोशिश की..समय-समय पर कमीशन-दर-कमीशन बनाए जाते रहे..तुष्टिकरण का नारा लगानेवाली भाजपा ने भी अपने यहाँ अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बरक़रार रखा..उसकी हुकूमत में भी ऐसे आयोग काम करते रहे..इसके अलावा कई नीतियाँ कई घोषणाएं सरकारी अमले करते रहे...लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि इसका फायदा आज तक आम मुसलमान को नहीं मिला..यूँ हर एलान के वक़्त वह खुश होता रहा कि अब उसका कुछ भला अवश्य होगा..उसके दिन फिरेंगे..काया पलट होगी..उसकी भी...लेकिन यह पलट तो होती है..लेकिन उनकी जो इनके रहनुमा कहे जाते हैं..जो इनकी सियासत करते हैं..और ऐसे नामों की ज़रूरत हर सियासी पार्टियों को रहती है.यही गोटियाँ बिठाते हैं और मुस्लिम के नाम पर सेंकी  गयी रोटियाँ भी यही चुभलाते, डकारते रहते हैं..सरकार अरबों-खरबों का फंड देती है..कभी तो इसकी राशि  सरकारी खजाने में  वापस चली जाती है..तो कभी इसका इस्तेमाल दर्शित हुआ भी, तो लाभ उन्हें मिला जिनके पेट भरे ही रहते हैं..यानी ..जो नेता या आक़ा के करीबी हैं.आम धारणा है कि  बड़े ओहदे पर पहुंचे कुछ ही मुस्लिम रहनुमा ऐसे हुए हैं जिन्होंने कौम के लिए कुछ भला किया.ऐसे लोगों में मौलाना आज़ाद, रफ़ी अहमद किदवई, ज़ाकिर हुसैन और जाफ़र शरीफ़ का शुमार किया जा सकता है.

आरक्षण का शोशा

अब तक ज्यादा-तर हुकूमत कांग्रस की रही है.उन्नति-अवनति का दारोमदार बेहिचक उसके सर है.लेकिन उसे औचक  होश आया [जैसा अब वामपंथियों को आ रहा है] कि मुसलमान-मुसलमान तो हम रटते रहे , किया क्या उनके लिए.यूँ भी उनसे यह तबक़ा नाराज़ चल रहा था. क्यों न एक आयोग बैठा दिया जाय.फैसला तो लोकसभा को करना है.जी जनाब!! तो इस तरह यूपीए ने अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समाज की स्थिति आंकने के लिए दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश रहे राजेन्द्र सच्चर की सदारत में एक कमीशन का गठन करवा दिया.कमीशन ने मुसलमानों की दुर्दशा का बेबाक वर्णन किया. जिसका लाभ लेते हुए मुर्दे पड़े मुस्लिम नेतृत्व  में जान आ गयी विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा है कि विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.

इंदिरा  गांधी ने भी ऐसा ही एक आयोग गोपाल सिंह  की अध्यक्षता में बनवाया था.उसकी रपट भी दर्दनाक है.लेकिन भैया अब तक उस पर अमल क्या हुआ !!
खैर !! सच्चर रिपोर्ट को कैसे लागू किया जाय.एक और आयोग ! अब श्री रंगनाथ मिश्रा का चयन.आप भी जज रहे हैं.इन्हों ने राय दी कि सरकारी नौकरियों में पिछड़े समूहों को दिए जाने वाले २७% आरक्षण कोटे में ८% अल्पसंख्यकों को भी दिया जाय.और मुस्लिम आबादी के हिसाब से उन्हें ६% सुविधा दी जाय.तुरंत कभी दिग्गज रहे मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने मांग की  "मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए, रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए."

यह सच है कि संविधान की धारा-२९ में शैक्षिक इन्तिज़ाम होने के बावजूद मुसलमान शैक्षणिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर पिछड़ता  चला गया है.लेकिन क्या वास्तव में सियासत उनकी दशा सुधारना चाहती है.क्या रंगनाथ कमीशन की संस्तुतियों को पूरा करना सहज है!!जैसे सुझाव दिए गए हैं, उस से विवाद के अलावा और क्या रास्ता बचता है !क्या अनुसूचित जाति  या जनजाति  या पिछड़े अपनी हिस्सेदारी में इनका हिस्सा सहर्ष दे देंगे ! दूसरी जानिब महिला आरक्षण का बिल लंबित है .सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि ५०% से ज़्यादा कोटा नहीं होना चाहिए ! वहीँ रंगनाथ कमीशन इसी में से १५% कोटा अल्पसंख्यकों  के लिए चाहता है.यानी न नौ मन तेल होगा, न ही राधा नाचेगी!!


भीख का प्याला नहीं चाहिए

मेरे मुस्लिम  साथियों, बहनों, भाइयों, बुजुर्गों !

आप  सियासत को बखूबी समझने की कोशिश कीजिये.किसी भी तरह के सरकारी आरक्षण की मुखालिफ़त कीजिये.हाँ सरकार से या रहनुमाओं से बस इतनी गुजारिश करें कि उनके साथ सौतेला बर्ताव न किया जाय, उनके बच्चों को नाहक़ पुलिस परेशान न करे.उन्हें अपने बूते पढने-लिखने दिया जाय...हर तरह की स्पर्धा में वह हिस्सा लेने  की सामर्थ्य रखते हैं. बस अवसर की ज़रूरत है.बहुत कुछ करने की गर उनकी मंशा है तो बस इतना करे सरकार कि उन्हें पढने-लिखने की सहूलियतें फराहम कराये.उनके लिए स्कूल खोले जाएँ.मदरसा को आधुनिक  शिक्षा से जोड़ा जाय.
आपको खुद आगे आना होगा... अपनी ताक़त पैदा करनी होगी..इस सिलसिले में हमवतन गैर-मुस्लिम भाइयों को भी खुले दिल-मन से साथ देना होगा.जब तक आप अपने बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे..तरक्की असंभव है.किसी भी तरह के कमीशन पर भरोसा हरगिज़ न करें इस में सिवाय वोट बैंक सियासत के इनके लिए कुछ भी धरा नहीं है.आप अच्छी तरह समझ लें  कि किसी भी किस्म का आरक्षण उन्हें लाभ पहुचने वाला नहीं है.गर वह भीख के इस प्याले के चक्कर में रहे तो जो दो-चार नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होंकर सामने आ पाते हैं, वह  भी मेहनत  से जी चुराने लगेंगे.जानता हूँ, स्थितियां अनुकूल नहीं हैं, आप पर कई तरह के पहरे हैं..लेकिन इम्तिहान का मज़ा भी तब ही है यारो!!  अंत में यही कहने का जी है:

डर गए मौजों से जो साहिल से पतथर ले गए
डूबने का शौक़ जिसको है गुहर ले जाएगा 





Indian MuslimNa Main Hindu Na Main MuslimSeparatism Among Indian Muslims: The Politics of the United Provinces' Muslims, 1860-1923 (Cambridge South Asian Studies)

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

अफ़ज़ल से हम हिसाब करें

, यह मीनारों मेहनत से उठती अज़ानें
मशीनों में ढलते यह ग़म के तराने

नए साल की खै़रियत चाहते हैं
इबादत में डूबे यह कल कारख़ाने

यह माटी की महिमा है, माथे से लगा लो
यह पत्थर की मूरत है, सर को झुका लो

यह लाशें तरसती रही hain कफ़न को
नए साल में पहले इसको संभालो

बहुत पहले नर्मेश्वर उपाध्याय की यह कविता पढ़ी थी। कुछ पंक्तियां एक पुरानी डायरी में मिल गईं। लगा आप से साझा कर लें। नए वर्ष की आप सभी को नेक मुबारकबाद!
नए सवेरे में कोई दहशत में न जीये। राहत इंदौरी के इस शे’र को हम साकार करें, यही तमन्ना हैः

दहशत पसार पाए न पैर अपने मुल्क  में
अफ़ज़ल से हम हिसाब करें,साध्वी से तुम



Terrorism in India: A Strategy of Deterrence for India's National SecurityTerrorism: History and Facets in the World and in India 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

बच्चे कभी दूध की बोतल नहीं पीते

फिर बच्चे चर्चा में हैं । एक ताज़ा सर्वे कहता है कि देश में 52 फीसदी बच्चे यौन दुर्व्यवहार   के शिकार होते हैं। 14 साला बच्ची से यौन अनाचार करने वाले पुलिस के एक वरिष्ठ अफ़सर की तस्वीर दांत निपोरते हुए छपती है। उसे महज़ छह माह की सज़ा मिली है और तुर्रा यह कि उसे ज़मानत भी मिल गयी। इस अफ़सर ने उदीयमान टेनिस खिलाड़ी के साथ यौन उत्पीड़न करने की कायरपूर्ण हरकत की थी। उसे इंसाफ़ मिलना तो दूर पुलिस ने उसे और उसके घरवालों को  ही धमकी देनी शुरू कर दी, जिसका कुपरिणाम यह हुआ कि उस किशोरी ने आत्महत्या कर ली। यह पढ़े लिखे घर का किस्सा है, जिसे न्याय नहीं मिला। उन बच्चों की दशा तो और भी बदतर है, जो गली कूचे में कबाड़ बीनते दिखलाई पड़ते हैं। किसी ढाबा में बरतन मांजते हैं। स्टेशन पर बूट पालिश करते हैं।

बचपन से यह फ़िक़रा सुनते आए हैं कि बच्चे देश के कर्णधार होते हैं, आज के यही बच्चे कल मुल्क की बागडोर संभालेंगे। पूरी तरह सच लगने वाली ऐसी कई उक्तियां जनमानस में सदियों से सत्य की शक्ल में दर्ज है। लेकिन कौन से बच्चे?फुटपाथ पर कबाड़ बीनने वाले या झुग्गियों में गोली बाटी खेलते अर्धनग्न बच्चे या 30से 40 हज़ार प्रतिमाह फ़ीस देकर कान्वेंट में पढ़ने वाले बच्चे? भावी कर्णधारों की श्रेणी में दाने दाने और अक्षर अक्षर को मोहताज बच्चों की गिनती है? या आलीशान कोठियों में संचालित पब्लिक स्कूलों में हाय हैलो के माहौल में जीते पलते बच्चों की? ज़ाहिर है देश की बागडोर भविष्य में थामने और संचालित करने का सौभाग्य फुटपाथी बच्चों को क़तइ नहीे मिल सकता! थ्कसी मिलिनियर डाग जैसे यथार्थ चमत्कार की बात अलग है। समाजिक ढांचे का यह ताना बाना वर्षो से चला आ रहा है।

कभी दिल से उतरकर यह शेर कागज़ पर उतरा था:

सो जाते हैं फुटपाथ पर बस यूंही दुबककर
यह बच्चे कभी दूध की बोतल नहीं पीते


ऐसे बच्चे आप को राजधानी दिल्ली के बस अड्डे और रेल्वे स्टेश्नों पर खूब दिखाई दे जाएंगे। यहां इनका ऐसा शोषण होता है कि भावुक ह्रदय मन कांप उठे!कई बच्चे गरीबी और मां बाप की डांट फटकार से तंग आकर घर से इसलिए भाग आए थे कि उन्हें मंक्ति मिल जाएगी। पर वह दूसरे दुष्चक्र में आ फंसे। यहां उन्हे नसीब हुई पुलिस की गालियां, भूखए शोषण और अप्राकृतिक यौनाचार करने वालों की एक लंबी क़तार। इन स्थितियों में लड़की की! आप कल्पना कर सकते हैं । नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर ऐसे बच्चों की तादाद सबसे ज़्यादा है। यहां हर क्षेत्र अंचल के बच्चे? हर उम्र के मिल जाते हैं। आपसी दुख दर्द साझा करने के लिए यह जाति, धर्म  और क्षेत्रियता के बंधनों से मुक्त होते हैं। ज़्यादातर बच्चे कबाड़ बीनने का काम करते हैं। कबाड़ी इनसे बस, कार और रेल के पुरज़े तक चुराने का काम लेते हैं। इसके एवज़ इन्हें 15 से 20 रु रोज़ाना मिलता है। कभी इन मासूमों को भूख से बिलखना भी पड़ता है। यह भी ब्याज़ पर पैसे लेते हैं। और वापसी की कथा बहुत ही दर्दनाक होती है। पुलिस के रोज़ के डंडे खना अब इनकी आदत सी हो चुकी है।

इन से ज़रा बेहतर स्थिति ढाबा या होटलों में बर्तन मांज रहे बच्चों की है। काम के घंटे यहां भी तय नहीं! लेकिन  पगार इन्हें समय पर ज़रूर मिल जाती है। कहते हैं, पेट तो डांगर भी भर लेता है। कमोबेश यही मनोदशा इन बच्चों की है। लेकिन रोज़्- रोज़ की मार- कुटाई और अप्राकृतिक यौन शोषण से यहाँ  भी छुटकार नहीं। घरेलू नौकरों की दशा और भी बदतर है। एक मिसाल का तो मैं महिनों गवाह रहा हूं। दक्षिण दिल्ली में स्थित एक पाश कही जाने वाली कालोनी में कभी मज़दूरों के अधिकारों के लिए  लड़ाई लड़ने वाली सक्रिय एक्टिविस्ट और एक पत्रिका की संपादक कवयित्री साहित्कार रहती हैं। पत्रिका का मैं सहायक संपादक था। रहता वहीँ  था। देर रात तक वह जगतीं और हमें भी जगना पड़ता। कोफ़्त होती जब वह रात बारह बजे सारे काम निबटा कर सो रहे 12 साला किशोर को चाय बनाने के लिए उठाने लगतीं। हमारे कहने पर उनका जवाब होताः अरे खाली खाता रहता है और सोता है। जबकि उसकी दिनचर्या के हम साक्ष्य थे। एक दिन इसी मुद्दे को लेकर हमारी बहस हो गयी।

सरकार ने बाल सुधार गृह बनवाए तो हैं। यहां दिल्ली गेट स्थित भी एक है। लेकिन यहां से भी अक्सर बच्चे भाग जाते है। फ़िलवक्त यहां लगभग दो सौ के आस पास बच्चे हैं, लेकिन हरेक के मन में यहां से मुक्ति की अकांक्षा है। सरकार तो इनके बेहतर खान -पान, रहन -सहन और कपड़े- लत्ते तथा शिक्षा -दीक्षा का वायदा करती है। लेकिन ज़मीनी सच यह कहता है कि इन्हें यहां भी आध पेट खाना कपड़े के नाम पर जर्जर वर्दी और बड़े बच्चे द्वारा अप्राकृतिक यौनाचार मिलता है।






गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

कैसे करोगे शादी ! वधु मिले तब न!!

खुशियाँ और रंगीनियाँ किसे भली नहीं लगतीं.और ज़िंदगी में शादी!! ऐसा लड्डू जो खाए तो पछताए और न खाए तो भी आंसू बहाए.लेकिन जिन्हें ज़िंदगी से कूट-कूट कर प्यार है,उनकी भी तमन्ना लबरेज़ है और ढेरों लबाबब अपेक्षाएं हैं अपने संसार की! अपने घर-आँगन की, अपने राज-दुलारों की.जिनके संग वो हंसें, किलकारियों से उनकी छत गूंजे!लेकिन नियती उनसे उनका सपना , उनकी खुशियाँ छीनने को आमादा है.





अधिकाँश युवा विकलांग : नहीं राज़ी कोई शादी  करने  को



 बौद्ध की धरती मध्यबिहार हमेशा अभाव और विसंगतियों के लिए जाना जाता है। विकास के असमान  वितरण के कारण ही असंतोष जन्म लेता है। जिसका लाभ नक्सली उठाते हैं। गया से महज़ चौसठ  किलोमीटर के फ़ासले पर है आमस प्रखंड का गांव भूपनगर जहां के युवक इस बार भी अपनी शादी का सपना संजोए ही रह गए कोई उनसे विवाह को राज़ी न हुआ। वह दिल मसोस कर रह गए। वजह है उनकी विक्लांगता। इनके हाथ-पैर आड़े-तिरछे हैं, दांत झड़ चुके हैं। बक़ौल अकबर इलाहाबादी जवानी में बूढ़ापा देखा! जी हां! यहां के लोग फलोरोसिस जैसी घातक बीमारी का दंश झेलने को विवश हैं। इलाज की ख़बर यह है कि हल्की सर्दी-खांसी के लिह भी इन्हें पहाड़ लांघकर आमस जाना पड़ता है। भूदान में मिली ज़मीन की खेती कैसी होगी? बराए नाम जवाब है इसका। तो जंगल से लकड़ी काटना और बेचना यही इनका रोज़गार है।

पहले लबे-जीटी रोड झरी , छोटकी बहेरा और देल्हा गांव में खेतिहर गरीब माझी परिवार रहा करता था । बड़े ज़मींदारों की बेगारी इनका पेशा था । बदले में जो भी बासी या सड़ा-गला अनाज मिलता, गुज़र-बसर करते। भूदान आंदोलन का जलवा जब जहां पहुंचा तो ज़मींदार बनिहार प्रसाद भूप ने सन् 1956 में इन्हें यहां ज़मीन देकर बसा दिया। और यह भूपनगर हो गया। आज यहां पचास घर है। अब साक्षरता ज़रा दीखती है, लेकिन पंद्रह साल पहले अक्षरज्ञान से भी लोग अनजान थे। फ़लोरासिस की ख़बर से जब प्रशासन की आंख खुली तो लीपापोती की कड़ी में एक प्राइमरी स्कूल क़ायम कर दिया गया।

 अचानक कोई लंगड़ा कर चलने लगा तो उसके पैर की मालिश की गयी।  यह 1995 की बात है। ऐसे लोंगों की तादाद बढ़ी तो ओझा के पास दौड़े। ख़बर किसी तरह ज़िला मुख्यालय पहुंची तो जांच दल के पहुंचते 1998 का साल आ लगा था जब तक ढेरों बच्चे जवान कुबड़े हो चुके थे। चिकित्सकों ने जांच के लिए यहां का पानी प्रयोगशाला भेजा। जांच के बाद जो रिपोर्ट आई उससे न सिर्फ़ गांववाले बल्कि शासन-प्रशासन के भी कान खड़े हो गए।  लोग ज़हरीला पानी पी रहे हैं। गांव फलोरोसिस के चपेट में हैं। पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक है। इंडिया इंस्टिट्युट आफ़ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ के इंजीनियरों ने भी यहां का भुगर्भीय सर्वेक्षण किया था। जल स्रोत का अध्ययन कर रिपोर्ट दी थी। और तत्कालीन जिलाधिकारी ब्रजेश मेहरोत्रा ने गांव के मुखिया को पत्र लिखकर फ़लोरोसिस की सूचना दी थी। मानो इस घातक बीमारी से छुटकारा देना मुखिया बुलाकी मांझी के बस में हो! रीढ़ की हड्डी सिकुड़ी और कमर झुकी हुई है उनकी। अब उनकी पत्नी मतिया देवी मुखिया हैं।

शेरघाटी के एक्टिविस्ट इमरान अली कहते हैं कि राज्य विधान सभा में विपक्ष के उपनेता शकील अहमद ख़ां जब ऊर्जा मंत्री थे तो सरकारी अमले के साथ भूपनगर का दौरा किया था। उन्होंने कहा था कि आनेवाली पीढ़ी को इस भयंकर रोग से बचाने के लिए ज़रूरी है कि भूपनगर को कहीं और बसाया जाए। इस गांवबदर वाली सूचना ज़िलाधिकारी दफ्तर से तत्कालीन मुखिया को दी गयी थी कि गांव यहां से दो किलो मीटर दूर बसाया जाना है। लेकिन पुनर्वास की समुचित व्यवस्था न होने के कारण गांववालों ने मरेंगे जिएंगे यहीं रहेंगे की तर्ज़ पर भूपनगर नहीं छोड़ा। इस बीमारी में समय से पहले रीढ़ की हड्डी सिकुड़ जाती है, कमर झुक जाती है और दांत झड़ने लगते हैं। हिंदुस्तान के स्थानीय संवाददाता एस के उल्लाह ने बताया कि कुछ महिने पहले सरकार ने यहां जल शुद्धिकरण के लिए संयत्र लगाया है। लेकिन सवाल यह है कि जो लोग इस रोग के शिकार हो चुके हैं, उनके भविष्य का क्या होगा? आखि़र प्रशासन की आंख खुलने में इतनी देर क्यों होती है। वहीं मुखिया मतिया देवी की बात सच मानी जाए तो गांव अब भी इस ख़तरनाक बीमारी के चपेट में है ।

यहाँ भी पढ़ सकते हैं 


विस्तृत रपट पढने के लिए रविवार देखिये






शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

खुद भूखी चिंता दूसरों की रोटी की

सब जानते हैं कि भारत गाँव में बस्ता  है.लेकिन अभी-अभी हुए रमाकांत  कथा-सम्मान में राजेन्द्र यादव ने कहा और उचित कहा कि भारत गाँव में जीता नहीं है बल्कि मरता है.और वहाँ भी सब से अधीक दुर्दशा औरत की ही रहती है.खेती-बाडी में मजदूरी करते लोगों की संख्या करीब आठ करोड़ है और इनमें आधी संख्या औरतों की है.घर पर जो वो श्रम करती हैं.उसे जुदा रखें तो ...जिसकी चर्चा हंस के ताज़ा अंक में कवयित्री सविता सिंह ने की है कि घर न सिर्फ खाना बनाने, कपडे धोने या फिर सम्भोग को बाध्य बनाने वाली जगह है जिसेसे  परिवार में वृद्धि होती है बल्कि एक कुटीर उद्योग भी है जैसे..जहां लगातार अचार, पापड, बड़ियाँ, तिलौरियाँ, मोरेंदे इत्यादि बनते रहते हैं.इनका बनाया जाना गृहिणी होने के अतिरिक्त प्रशंसनीय गुणों को अपने आप में समाहित करना है. जैसे: अच्छी सिलाई करना, तकियों के गिलाफों या चादरों पर फूल काढना. सारियों पर गोटा लगाना, स्त्री काम का इस तरह कोई अंत नहीं, विस्तार ही विस्तार है जितना विस्तार उतना ही मुफ्त श्रम का नियोजन.

सविता जी के चिंतन-केंद्र में भरे-घर की महिलाओं की दिनचर्या है.लेकिन इस दिनचर्या को साथ जोड़ लें तो इन महिला मजदूरों के श्रम का क्या मोल है!!! लेकिन आप जानते हैं इन औरतों को मर्द मजदूरों से कम मजदूरी मिलती है.
सोलह से अठारह घंटे हाथ-तोडू, पैर -फोडू श्रम करने के बावजूद महिला श्रम को उत्पादक नहीं माना जाता!
जब  मर्दुमशुमारी हो रही थी तो सरकारी नज़र सिर्फ शहरी इलाके में कार्यरत महिला मजदूरों पर जा कर टिक गयी.जिनका प्रतिशत महज़ १५ है.जबकि चूल्हा-चक्की, बाडी-खेत में पिसती असंगठित क्षेत्र   में करीब ८६-८७ फीसदी औरतें हैं.युएनो की रपट के मुताबिक औरतें फसल कटाई के बाद उसकी गदाई .कभी दूसरी जगह से पानी का जुगाड़, जानवरों को सानी देना, बच्चों की देख-भाल खाना बनाना आदी काम करती हैं.उन्हें काम की शक्ल में नहीं देखा जाता.और बड़े सामंत या मजदूर ठेकेदारों द्वारा अस्मत से खिलवाड़ की रोज़ नौबत या बलात-कर्म!!

सुबह होते ही इनका दैहिक  और आर्थिक शोषण शुरू हो जाता है.आँख मलते ही इन्हें अपने परिवार के पेट कि चिंता और ये खुद इंधन बनने  के लिए घर से निकल जाती  हैं.भैया नरेगा अभी आया है और कितना भला हो रहा है इनका, ढंकी छुपी बात नहीं है.सबसे पहले ये पानी के लिए ..फिर अन्न के लिए और जलावन के लिए .....
इन कामों में सिर्फ ३.७ फीसदी पुरुष ही मदद  करते हैं.पचास फीसदी अनाज की कूतायी-पिसाई  भी घरेलु औरतें करती हैं.
ग्रामीण या श्रमिक औरतों को छोड़ दें तो भी एक हिन्दुस्तानी औरत अपनी ज़िन्दगी के कई अहम् साल सिर्फ चूल्हा-चौकी और उसके धुएं में गंवा देती है.ज़हरीले धुएं से उसका जिस्म खोखला हो जाता है.एक रपट का हवाला लें तो घरों के अन्दर का वायु-प्रदूषण, बाहर के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है.  नाईट रोजन ओक साइड , कार्बन मनो ओक साइड जैसी ज़हरीली गैसें इनमें मिली रहती हैं. शायद यही सबब  है कि औरतों को जो गाँव में हैं या शहर की  तंग गलियों में विवश है...उन्हें दमा  और  टीबी जैसी बीमारी हो जाती  है.मजदूरिनों की हालत और भी बदतर  है.अब सरकार ने उत्पादकता तो मान लिया..सस्ती मजदूरी कौन  करेगा???? क्या इतने भर से उनकी समस्याएं हल हो गयीं....गाँव के बड़े बाबुओं द्वारा इनका जिस्मानी शोषण आम बात है.अक्सर दूसरों के खाने का इंतजाम करने वाली खुद भूखे सो जाती  है.कमर तोड़ महंगाई , आज भी गाँव और कई परिवारों की दशा मदर इंडिया की नर्गिस की ही तरह है...बर्तन और जेवर गिरवी तो हम जैसे लोग भी रखते हैं...वहाँ पता नहीं ये औरतें क्या-क्या  रखती हैं...विडंबना है..या नियति....पता नहीं..लेकिन तल्ख़ है ज़रूर!!!!यानी क़र्ज़ अदायगी के चक्कर में कई मासूम बालाएं बंधुआ मजदूर बन जाती  हैं..और इनके स्वामी इनसे सारी  मिहनत करवाता है..कई बार इन्हें गाँव छोड़कर दूसरी जगह देस-परदेस भी जाना पड़ता है..
कुछ दिनों पहले भाई आवेश ने खबर भी दी  मजदूरों के पलायन की.मध्य-बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ से पंजाब-कश्मीर तक पलायन करती इन महिला मजदूरों की लम्बी कतार है.नयी जगह, नए लोग.नयी आबो-हवा .....लेकिन कमाल !!इन के बच्चे कहीं भी धुल-मिटटी में पड़े कभी रोते-कभी मुस्कुराते हैं! इनकी सिहत की फ़िक्र तो कभी नए मालिक की ज़बान जो चुआती रहती है .....

जहां रहता हूँ वहाँ कई दिनों से इक इमारत बन रही है...रोज़ इन्हें देखता हूँ..कईयों से बात  ....ये उसी का दर्द है...कभी उनसे हुयी बात-चीत से भी रूबरू कर वाने का इरादा है..

बुधवार, 25 नवंबर 2009

नाम तो मुझको भी अपने क़ातिलों का याद है








आज मुंबई हादसे की बरसी है. विशेष लोक अदालत में २६५ गवाहों की सुनवाई हो चुकी है. सिर्फ़ दस गवाह रह गये हैं और पूरी आशा है कि मामले की सुनवाई जल्द ही मुकम्मल कर ली जाएगी. लेकिन आम जनता के बीच असली सच कब आएगा या आकर भी अपना चेहरा तकता रह जाएगा, खुदा ही जाने! क्योनिकि सब-कुछ तो सरे आम घटा ठीक ६ /१२ की तरह जब एक पुरानी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया गया था. क़रीब दो दशक होने को आए और खर्च हुआ आठकरोड़. लेकिन हासिल पाया शून्य! यानी खोदा पहाड़ निकली चुहिया!

बहुत पहले एक कविता ज़हन में आई थी और उसको लेकर हिन्दी अकादमी ने मेरी पुस्तक से अपनी प्रकाशन सहयोग योजना वापस ले ली थी अघोषित ढंग से. ...

सब कुछ हमारे सामने घटा था
लेकिन हम कायर थे
और अंधे बहरे हो चले थे.
हमने छेह साऔ साल पुरानी इमारत को
ढाँचा कहना शुरू कर दिया था
और ढाँचा को इमारत कहने की तैयारी कर रहे थे.

जब मैं दिल्ली में ही था. दोपहर को उमा भारती की खिलखिलती यह तस्वीर सांध्य-टाइम्स में छपी थी.यानि अब महाराज! काम हो गया हमने आख़िर विदेशी चिन्ह को मतियामेट कर ही दिया , ऐसा वो मुरली मनोहर जोशी से कह रही थी. जिनके काँधे पर वो सवार दिखीं.

हम क्या बताएँ! कोई ढाकी-छुपि बात है नहीं. हम तो ये कहना चाहते हैं की आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव को बरी कैसे कर दिया यानी दोष-मुक्त!!! मस्जिद शहीद की जारही है.ये न सिर्फ़ उन्हें बल्कि सारी दून्या को सुबह पता चल गया थं मस्जिद की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ राज्य सरकार की ही नहीं केंद्र की भी थी.लेकिन केंद्र खामोश रहा . जब तक कि .दूसरे दिन दुपहर पूरी इमारत को ज़मीन दोz कर अस्थाई ढाँचा खड़ा नहीं कर दिया गया.

उस दिन केंद्रीय सुरक्षा बाल को घटना-स्थल से पहले ही रोक दिया गया. और जो पुलिस बल वहाँ था. वो न सिर्फ़ तमाशायी था बल्कि कहीं न कहीं घटने में शामिल भी .दूसरे दिन सुबह आठ बजे के आस-पास राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा.लेकिन कारसेवकों को शाम तक खुली आज़ादी दी गयी. ताकि मंदिर का स्थाई निर्माण हो सकेऽउर उस एटिहासिक क़स्बे में आतंकवादियों को नंगा नाच !करने की छूट!! जब यही शब्दावली थी! मुसलमानों के ३०० घर खाक हुये.कइयों की जान गयी! उनपर कोई मुक़दमा नहीं! तब की सरकार को सारी ख़ुफ़िया जानकारी थी. बावजूद? और दूसरे दिन भी आँख मूंदना?

संघ क्या है और क्या चाहते हैं उनके लोग ये हर कोई जानता है!

लिब्रानी रपट से संघी हैं गो परेशान
अपने किए पर हरगिज़ लेकिन नहीं पेशमान!

वो परेशान भी हरगिज़ नहीं! और पेशमान तो लज्जा वाले होते हैं.


लेकिन कथित सेकुलर लोगों की करामात!! तेरी सादगी पर कौन मर जाए न खुदा!

खुशी की बात ये है कि अब जनता सियासत की चालों को जान-समझ चुकी है.जिसका डर था कि मुसलमान न भड़क जाएँ ! हिंदू आग बगोला न हो ! ऐसा आज का सच है सॉफ-सॉफ!! लेकिन सियासत के लोगों को चैन कहाँ! अमर सिंह मुसलमानों के मसीहा कब हो गये!

खामोश! अब हम जाग चुके हैं. संघ की बातें संघी जाने???


एक शायर के हवाले से मैं इतना ही कहूँगा:

मिंहदम-गुंबद अभी तक माइल-ए-फर्याद है
मेरी इक-इक ईंट मज़लूमी की इक रूदाद है
देखना है क़ातिलों को कौन देता है सज़ा
नाम तो मुझको भी अपने क़ातिलों का याद है!!!


१. नष्ट गुंबद, २. फर्याद करता है,३. अत्याचार, ४. दुखांत-कथा

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

आतंक के विरुद्ध जिहाद!


देश के लिए कुर्बान मुजाहिदीनों को सलाम!


पाठक चौंक रहे होंगे । मैं क्या बेवकूफाना हरकत कर रहा हूँ.सच मानिए उन आतंकवादियों से लड़ते हुए जामे-शहादत पी जानेवाले वो तमाम जांबाज़ मुल्क के सिपाही, अफसर और आम नागरिक ही मेरी नज़र में सबसे बड़े मुजाहिदीन हैं।


मुजाहिदीन अर्थात जिहद, प्रतिकार, संघर्ष करनेवाला
, ऐसा संघर्ष जो आंतंक,अन्याय,असत्य,ज़ुल्म और अत्यचार के विरुद्ध हो। ऐसे मकसद के लिए जद्दोजिहद जिसका ईमान इंसान की जान बचाना और ज़मीन पर अमनो-अमन कायम करना हो।


अबुलकलाम आजाद, भगत सिंह, अशफाक, रामप्रसाद, विद्यार्थी,नेहरू, सुभाष जैसे अनगिनत लोग हुए जिन्होंने अंग्रेजों से मुल्क को आज़ादी दिलाने के लिए जिहाद किया.और आज इतिहास उन्हें मुजाहिदे-आज़ादी कहता है।
और मुंबई में शहीद हमारे देशवासियों ने हमें विदेशियों की नापाक साजिश से मुक्त कराने के लिए जिहद किया और शहीद तो हुए लेकिन उन्हों ने ये विश्व को दिखा दिया की तिरंगा झुकनेवाला नहीं है।
समूची इंसानियत को बंदूक की नोक पर नचाने का सपना देखने वाले इस्लाम समेत किसी भी धर्म-सभ्यता में मुजाहिदीन नहीं कहे जा सकते।
वे आतंकवादी हैं, उग्रवादी हैं, दहशतगर्द हैं।
उन्होंने कठोर से कठोर सज़ा मिलनी चाहिए।
उन्हें मज़हब और धर्म का इस्तेमाल करने की इजाज़त किसी भी कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए.इस्लाम ऐसे दहशतगर्दों के लिए कठोरतम सज़ा की हिमायत करता है.मुस्लिम परिवार मेंजन्म लेने के कारण इस्लाम की थोड़ी-बहुत जो समझ , और संस्कार ने जो तमीज दी है , उसके आधार पर मैं सबसे पहले मुसलामानों से अपील करता हूँ की आप आगे आयें और इस्लाम को बदनाम करनेवाले इन दहशतगर्दों के विरुद्ध जिहाद करें.अपने सभी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए, पूरी शक्ती के साथ आतंकवादियों का मुकाबला कीजिये,आतंकवाद की कमर तोड़ दीजिये.आपके प्यारे नबी की हदीस है ; वतनपरस्ती ॥ अपने वतन की तरफ़ बुरी नज़र से देखने की कोई हिमाक़त करे तो उसकी आँख फोड़ दीजिये।

जिहाद वो नहीं जैसा नाम-निहादी कर रहे हैं बल्कि उनके ख़िलाफ़ खड़े होना जिहाद है।
इस्लाम में जिहाद

बे-ईमानी के विरुद्ध ईमानदारी के लिए संघर्ष।
असत्य के विरुद्ध सत्य के लिए संघर्ष।
अत्याचार, ज़ुल्म, खून-खराबा और अन्याय के विरुद्ध सद्भाव, प्रेम, अमन और न्याय के लिए संघर्ष।


अब कुरान क्या कहती है:
...जो तुम पर हाथ उठाए , तुम भी उसी तरह उस पर हाथ उठा सकते हो,अलबत्ता ईश्वर से डरते रहो और यह जान रखो कि ईश्वर उन्हीं लोगों के साथ ही जो उसकी सीमाओं के उलंघन से बचते हैं।
२:१९४
....उन लोगों से लड़ो,जो तुमसे ladte हैं,परन्तु ज्यादती न करो।अल्लाह ज्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता.
२:१९०
....और यदि तुम बदला लो तो बस उतना ही ले लो जितनी तुम पर ज्यादती की गयी हो. किन्तु यदि तुम सबर से काम लो तो निश्चय ही धैर्य वालों के लिए यह अधीक अच्छा है।
१६:२६


शान्ति, सलामती इस्लाम की पहचान रही है.जभी आप एक-दूसरे से मिलने पर अस्सलाम अल्लैकुम यानी इश्वर की आप पर सलामती हो , कहते हैं.आप कुरान की ये आयत जानते ही हैं:
जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सभी इंसानों को जीवनदान दिया।
५:३२


मुंबई के हादसे पर इंसानियत आपसे सवाल करती है.यूँ देश के तमाम मुस्लिम sansthaaon, इमामों और उल्माओं ने घटना की कठोर निंदा के साथ दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा की मांग की है.समय-समय पर एक मुस्लिम संघठन आतंकवाद-विरोधी जलसा वर्ष-भर से जगह-जगह आयोजित करता रहा है.दूसरे प्रमुख संगठन ने अभी अपना अमन-मार्च ख़त्म किया है.लेकिन महज़ निंदा और जलसे जुलुस से अब कुछ नहीं होने वाला अब ज़रूरत खुलकर आतंकवादियों का मुकाबला करने की है.पास-पड़ोस में पनप रही ऐसी किसी भी तरह की मानसिकता को ख़त्म करने की.सरकार और पुलिस को सहयोग करने की.संसार के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक है आतंकवाद!जिसका समूल नाश बेहद ज़रूरी है॥ वसुधैव कुटुंब बकम .ये हमारी विरासत है।
और पगैम्बर मुहम्मद की ये हदीस हमारा ईमान :
सम्पूर्ण स्रष्टि इश्वर का परिवार है.अतःइश्वर को सबसे प्रिय वो है जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यव्हार करे।


शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

मुसलमान जज़्बाती होना छोड़ें



मायूस न हों और आक्रोशित न हों।
-हज़रत मोहम्मद स.




विभाजन के ठीक वर्ष-भर बाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक सर्वेक्षण कराया गया था। यह सन् १९४८-४९ की बात है। सात बड़े शहरों यथा मुंबई, कोलकाता, चेन्नई , अहमदाबाद, पटना, अलीगढ और लखनऊ में रहने वाले मुसलामानों से बात-चीत की गई थी। इस सर्वे में एक सहयोगी गार्डन मर्फी यूनेस्को की ओर से थे। जिन्होंने बाद में इक किताब लिखी इन दी मायन्ड्स ऑफ़ मेन , जिसमें उन्होंने लिखा :





आज का मुसलमान डरा हुआ है, अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित रहता है। सरकार उसके जान-माल की रक्षा नहीं कर पा रही है। नौकरियों और रोज़गार में उसके साथ भेद-भाव बरता जा रहा है। राजनितिक क्षेत्र में उसकी शक्ति और महत्त्व को ख़त्म किया जा रहा है।




आज इस हालत में बहुत ज्यादा तब्दीली नहीं आई है।




आज जिस असमंजस की दशा में वो जी रहा है। ऐसी हालत में कमोबेश हर कमज़ोर वर्ग रहता है। जो क़ौम शिक्षा और आर्थिक मामले में आत्म निर्भर रहती है, उसे बहुत जल्दी जज़्बात में नहीं भड़काया जा सकता। लेकिन मुसलामानों का दुर्भाग्य है कि इस भारतीय उपमहाद्वीप में वो इस क्षेत्र में अभी भी पिछडा है। अपवाद जनाब कहाँ नहीं होते हैं। यही वजह कि उसे हमेशा मज़हब के नाम पर बरगलाया जाता रहा है। भारत में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक हुकूमत है। लेकिन ऊंचे मकाम पर बैठे लोगों की नियत में कहीं न कहीं खोट कभी-कभार देखाई दे जाता है। और इसी खोट को चालाक लोग मुद्दा बना देते हैं। और मुस्लिम युवा सड़क पर चला आता है। विरोधी शक्तियां इसी फिराक में रहती हैं कि कब उन्हें इक बहाना मिले। दरअसल इन शक्तियों का भी अपना गणित-लाभ रहता है। इन दो-ढाई दशक में ऐसी शक्तियों को खाद्य-पानी बहुत मिला है। और इधर अल्पसंख्यकों को लगातार हतोत्साहित करने उन्हें किसी न किसी बहाने परेशान करने कि घटनाएं बढ़ी हैं। और इक शायर तुफैल लखनवी कहता है:


ऐसा होता है क्या निज़ामे-दस्तूर


हर तरफ़ क़त्ल-खून दंगा है


अब तो हम्माम में सियासत के


जिसको देखो वो शख्स नंगा है











आजकल फिर कुछ सर-फिरों की बदौलत पैदाहालत का लाभ सियासत उठाना चाह रही है।ये सियासी दल जहाँ एक डराता है तो दूसरा उसका विस्तार करता है, हमदर्दी जतलाने की कोशिश करता है । और मुसलामानों में असुरक्षाबोध को बढ़ाने में कट्टरवादी और उदारवादी दोनों तरह के लोग शिरकत करते दिखलाई देते हैं। जबकि ये कथित हमदर्दियां बहुत दिनों तक उसमें ऊर्जा का संचार नहीं कर पातीं। फिलहाल फिर खौफ पैदा की जाने की कोशिश की जा रही है। ये सही है कि आप के साथ ग़लत हुआ है , आपकी राष्ट्रीयता पर सवाल किए जा रहे हैं। बावजूद इसके आप होश से काम लें , अपना जोश कायम रखें।





हुजुर-अकरम मोहम्मद स. की हदीस याद रखिये जब वो ऐसे वक्त कहा करते थे:





मायूस न हों और आक्रोशित न हों।





आप मायूस इसलिए न हों कि अल्लाह आपके साथ है। हमारा मुल्क हमारी हिफाज़त करेगा। यहाँ के कानून पर यकीन है। और अभी मुल्क सेकुलर इसलिए है कि ज़्यादातर आबादी ईमानदार है। कानून की कुर्सियों पर भी सभी बेईमान नहीं बैठे हैं। आप अपने हकों के लिए , इन्साफ के लिए अमन के साथ अपना जद्दोजिहद चलाईये। और देश के सच्चे और जनपक्षधर लोगों को साथ रखिये। आपके नेताओं ने ही आपको हमेशा लूटा है। उनके नारों के पीछे न पड़िये।





आपको हमेशा इस्लाम के नाम पर उल्लू बनाया गया है। इन नेताओं ने रोज़ी-रोटी जैसी मूलभूत समस्याओं के लिए कभी राष्ट्रिय आन्दोलन खड़ा किया ? सच्चर-सच्चर चिल्लाते रहे , कभी आपके नेताओं ने सरकारी गद्दी छोड़ी?

मुसलमानों का दुर्भाग्य रहा की उसने किसी एक का नेतृत्व कभी स्वीकार नहीं किया. अपने बीच से उसने कभी एक राष्ट्रिय क़द-काठी का नेता पैदा नहीं किया. मौलाना आजाद को छोड़कर. जिसमें सलाहियत रही उसे समय ने खारिज कर दिया. मुसलामानों के नेता शुरू से ही गैर-मुस्लिम रहे . पंडित नेहरु के जादुई शख्सियत का असर बरसों तक उन पर रहा, फिर इसकी जगह इंदिरा गाँधी ने ली. उसके बाद हेमवतीनंदन बहुगुणा , चरण सिंह , वी.पी. सिंह तथा मुलायम सिंह यादव और लालू यादव क्रमश:आते गए
लेकिन उनकी हमदर्दी उतनी ही रही जितनी हम पड़ोस के बच्चे के साथ निभाते हैं। अभी भी सभी सियासी जमात मुसलामानों को अपनी तरफ लाने में जी-जान से जुड़े हुए हैं. लेकिन सत्ता-प्राप्ति के बाद इनकी ये नाम-निहादी हमदर्दी भी काफूर हो जाती है.और इनकी टिकट पर मुस्लिम वोटों के बूते जीते मुस्लिम रहनुमा का किरदार भी अन्य देसी नेताओं से अपेक्षकृत बहुत अच्छा नहीं रहता. इनका भी कोई उसूल नहीं कायम रह पाता है , और बक़ौल मासूम गाज़ियाबादी:

जहां रहबर उसूले-रहबरी को छोड़ देता
वहीँ लुटते हुए देखे हैं अक्सर कारवाँ मैंने

प्यारे भाईओं, आप अपना उसूल न भूलें जभी कारवाँ को बचाया जा सकता है। आपने अलीगढ , मुरादाबाद, भिवंडी, मुरादाबाद जैसे अपने औद्योगिक नगरों को जलते देखा, इक तहजीब जिसमें गंगा-जमना का पानी छल-छलाता था, उसे मिस्मार होते देखा, इक सूबे में हुक्मरान की बजती बांसुरी देखी और गाँव-शहर धुंआ उगलते रहे.....आपने सब देखा ...लेकिन आप कुछ दिनों के बाद फिर अपनी जद्दोजिहद में लग गए, रोज़ी-रोटी के लिए जुट गए. पढने-लिखने और नौकरी-चाकरी के लिए दौड़-धूप करने लगे. आपने गर सब्र किया तो उसका फल भी आपको ही मिलेगा.

आप जज़्बाती नारों से गुरेज़ करें। कोई ऐसा क़दम न लें जिसका खामियाजा आपको ही भुगतना पड़े।
मुस्लिम रहनुमाओं और मुस्लिम वोट की सियासत करने वालों से भी आग्रह है कि अब बहुत हो चूका अब और इन्हें गाजर-मूली न बनाओ.इनकी तालीम और रोज़ी का इंतजाम करो अगर करना ही चाहते हो कुछ .

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

दिल पर रख कर हाथ कहिये, देश क्या आजाद है

सवाल दर सवाल है , हमें जवाब चाहिए



और ये सवाल उनका है, जो दमित हैं, दलित हैं, शोषित हैं ।

बड़े अनमने ढंग से लिख रहा हूँ। उत्सव की गहमा-गहमी और मैं कहाँ दुखियारों और पीडितों , गरीबों की बात लेकर बैठ गया।

मुझे सिवा अश्वनी की एतिहासिक जीत के कुछ और नज़र नहीं आता कि मैं खुश हो सकूं।

भले कुछ लोग बाईसवीं सदी में हों लेकिन अपन तो अभी तक अठारहवीं में जी रहे हैं और कई तो सोलहवीं या तेरहवीं में ही हों।


लेकिन भाई खबरें तो इक्कीसवीं या बाईसवीं की ही पढाई-देखाई जाती है।
हाँ हम जैसे कलम के सुरमा भोपाली सर ज़रूर फोड़ सकते हैं।

अभी हाल में ही एक आयोजन में शिरकत करते हुए ख्यात देसी - चिन्तक-पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा :

अब तो मध्य-वर्ग के साथ समाचार माध्यमों ने भी देश में बढती असमानता की और देखना बंद कर दिया है।
जबकि स्थिति यह है कि देश में २००४ में ९ खरबपति थे जो २००८ में बढ़कर ५६ हो गए। यानी फ़क़त चार बरस में ही खरबपतियों की संख्या छः गुना बढ़ गई.(खरबपतियों आज़ादी तुम्हें मुबारक ! ) और दूसरी ओर अर्जुन सेन गुप्ता कि रपट के मुताबिक ८४ करोड़ यानी ७७ फीसदी लोग रोजाना बीस रूपये भी नहीं पाते। उनमें से ३२ करोड़ लोग तो सिर्फ़ एक समय का भोजन जुटा पाते हैं। २२ करोड़ ऐसे हैं जिन्हें पता नहीं कि उनका अगला भोजन कब कहाँ से आएगा या आयेगा भी या नहीं।

हर वर्ष यह पन्द्रह अगस्त आता है, और चला जाता है .रमुआ आज भी रिक्शा चलाता है.उसका बाप भी यही करता था.किसन अब तक मुंबई से नहीं लौओटा है.समीर दत्त अपनी माँ से मिलने जम्मू नहीं जा पा रहा है. जुबैदा अब भी मेम साहब के यहाँ बरतां मांजा करती है.इलाहाबाद की सड़क पर आज भी औरत पत्थर तोड़ती है.गरीबी हटाओ के नाम पर देश पर खरबों का क़र्ज़ हो गया है.पर यह पैसा गरीबों तक नहीं पहुँचा.आँख फाड़कर देखिये तो यह पैसा आपको सड़कों पर भागती चम्-चमाती गाड़ियों,ब्यूटी पार्लरों से ले पाँच सितारा होटलों की लम्बी कतारों, ऊँची-ऊँची मीनारों, खद्दर धारीओं के कुरते झांकती तोंदों और फार्म हौसों में दिख जाएगा।

तेजपाल सिंह तेज ने सही कहा है :

भुखमरी के वोट ने बदले हैं तख्तो-टाज
पर भुखमरी के मील के पत्थर नहीं बदले



बहुत ही सुनियोजित ढंग से अब खेती-किसानी पर भी कब्जे किए जा रहे हैं.खेती को उद्योग का दर्जा देने की बात के साथ-साथ विदेशियों को भी नेवते दिए जा रहे हैं.अब खेती किसानों के लिए नहीं.किसी किसान को कुछ जुगाड़ में मिल जाए गनीमत जानिए.आंध्र से लेकार बस्तर और महारष्ट्र के इलाकों में किसान आत्महत्या कर रहे हैं.अभी नोइडा में किसान पुलिस की गोलिओं का ग्रास बने।

बात महज़ गाँव की नहीं.शहर में पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद बढ़ रही है। जो बेरोजगार है.चमक-दमक से प्रभावित होकर इनमें से कई अनैतिक और भ्रष्ट कामों की ओर प्रेरित कर दिए जाते हैं.अपराध के आंकडें बढ़ रहे हैं.श्याम ८ बरस का है.होटल में बर्तन माजता है.करोड़ों बच्चे पढने और खेलने कूदने की उम्र में कबाड़ में अपना भविष्य तलाश कर रहे हैं.महानगर की ओर भागती लम्बी फोज है.दिल्ली, मुंबई और कोल्कता जाने वाली रेल गाँव और कस्बों के जवानों से पटी रहती है.सुंदर कल की खोज में निकले ये लोग घर लोटना चेन तो भी नहीं जा पाते.एकाक भाग्यशाली हो सकते हैं।



आप ही बताएं क्या इन्हें मुबारकबाद कहूं!



अदम गोंडवी याद आ रहे हैं:

सो में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है
कोठियों से मुल्क की मियार को मत आंकिये
असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ प आबाद है



रविवार, 3 अगस्त 2008

उर्दू लेखकों की धर्मान्धता

यास यगाना पर इस्लाम-विरोध का इल्ज़ाम
शर्म उनको मगर नहीं आती

तहजीब और गंगा-जमनी गहवारे का गवाह शहर लखनऊ से बहुत बुरी ख़बर मिली है.अपने समय के मशहूर उर्दू शायर यास यगाना पर आयोजित होने वाले परिसंवाद को कथित कट्टरवादी उर्दू के लेखकों के दबाव के कारण स्थगित कर दिया गया . ये हादिसा जून का है . साहित्य अकादमी ये आयोजित कर रही थी.विरोधियों ने ये कहकर आयोजन न होने दिया कि यगाना इसलाम-विरोधी थे.और लखनऊ में किसी तरह का प्रोग्राम नहीं होने दिया जायेगा.
इलाही माजरा क्या है?
ये अदब के भी लोग हैं या नहीं जिन्होंने यगाना जैसे शायर की मुखालिफत की।

इस घटना ने वही पुरानी बहस को जिंदा कर दिया कि क्या ज़बान किसी धर्म-मज़हब की बपोती होती है.
तो क्या प्रेमचंद,सरशार,फिराक पर ये लखनऊ वाले naam-nihadi उर्दू premi -मुस्लिम कभी अपने यहाँ कोई आयोजन नहीं होने देंगे.
क्या अहमक़ानापन है.
फिर बात ये समझ में नहीं आती कि साहित्य अकादमी उनसे डर क्यों गयी.
अगर अदब यानी साहित्य धर्म या मज़हब के मातहत होता तो क्या मीरजैसा शायर ये कहने की जुर्रत करता:

मीर के दीन-ओ-मज़हब को पूछते क्या हो ,उन से
क़शका खींचा, दैर में बैठा कब का तर्क इसलाम किया
तो ग़ालिब कहते हैं:
हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन
दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है

शओक़ लखनवी ने बहुत तीखे तेवर में शायरी की है।और भी कई शायर-लेखक हुए.क्या ग़ालिब और मीर या यगाना के समय के मुसलमान से आज के ये लखनवी मुस्लिम जिन्होंने विरोध किया ज्यादा ईमान के पक्के हैं? क्या ईमान महज़ किसी के विरोध और समर्थन पर टिका होता है?क्या पाकिस्तान की सरकार गैर-इस्लामी हो गयी ?
मुश्फिक ख्वाजा के संपादन में वहां कुल्लियात-यगाना प्रकाशित हो चुका है।

यूँ ये ख़बर भी और ज़रूरी ख़बर की तरह गुम हो गई थी.अभी उर्दू के लेखक नामी अंसारी का इक ख़त उर्दू के इक अख़बार में छपा तो खाकसार को जानकारी मिली।उनके हम आभारी हैं.इस घटना की जितनी निंदा की जाए कम है.इक शे'र को थोडा सा रद्द-ओ-बदल कर कहने का मन करता है:

अदब का खून होता है
तो मेरी रूह रोती है
अदब के साथ बेअदबी
बहुत तकलीफ़ होती है

(साहित्, आत्मा, सम्मानहीनता,असम्मान)

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