शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

खुद भूखी चिंता दूसरों की रोटी की

सब जानते हैं कि भारत गाँव में बस्ता  है.लेकिन अभी-अभी हुए रमाकांत  कथा-सम्मान में राजेन्द्र यादव ने कहा और उचित कहा कि भारत गाँव में जीता नहीं है बल्कि मरता है.और वहाँ भी सब से अधीक दुर्दशा औरत की ही रहती है.खेती-बाडी में मजदूरी करते लोगों की संख्या करीब आठ करोड़ है और इनमें आधी संख्या औरतों की है.घर पर जो वो श्रम करती हैं.उसे जुदा रखें तो ...जिसकी चर्चा हंस के ताज़ा अंक में कवयित्री सविता सिंह ने की है कि घर न सिर्फ खाना बनाने, कपडे धोने या फिर सम्भोग को बाध्य बनाने वाली जगह है जिसेसे  परिवार में वृद्धि होती है बल्कि एक कुटीर उद्योग भी है जैसे..जहां लगातार अचार, पापड, बड़ियाँ, तिलौरियाँ, मोरेंदे इत्यादि बनते रहते हैं.इनका बनाया जाना गृहिणी होने के अतिरिक्त प्रशंसनीय गुणों को अपने आप में समाहित करना है. जैसे: अच्छी सिलाई करना, तकियों के गिलाफों या चादरों पर फूल काढना. सारियों पर गोटा लगाना, स्त्री काम का इस तरह कोई अंत नहीं, विस्तार ही विस्तार है जितना विस्तार उतना ही मुफ्त श्रम का नियोजन.

सविता जी के चिंतन-केंद्र में भरे-घर की महिलाओं की दिनचर्या है.लेकिन इस दिनचर्या को साथ जोड़ लें तो इन महिला मजदूरों के श्रम का क्या मोल है!!! लेकिन आप जानते हैं इन औरतों को मर्द मजदूरों से कम मजदूरी मिलती है.
सोलह से अठारह घंटे हाथ-तोडू, पैर -फोडू श्रम करने के बावजूद महिला श्रम को उत्पादक नहीं माना जाता!
जब  मर्दुमशुमारी हो रही थी तो सरकारी नज़र सिर्फ शहरी इलाके में कार्यरत महिला मजदूरों पर जा कर टिक गयी.जिनका प्रतिशत महज़ १५ है.जबकि चूल्हा-चक्की, बाडी-खेत में पिसती असंगठित क्षेत्र   में करीब ८६-८७ फीसदी औरतें हैं.युएनो की रपट के मुताबिक औरतें फसल कटाई के बाद उसकी गदाई .कभी दूसरी जगह से पानी का जुगाड़, जानवरों को सानी देना, बच्चों की देख-भाल खाना बनाना आदी काम करती हैं.उन्हें काम की शक्ल में नहीं देखा जाता.और बड़े सामंत या मजदूर ठेकेदारों द्वारा अस्मत से खिलवाड़ की रोज़ नौबत या बलात-कर्म!!

सुबह होते ही इनका दैहिक  और आर्थिक शोषण शुरू हो जाता है.आँख मलते ही इन्हें अपने परिवार के पेट कि चिंता और ये खुद इंधन बनने  के लिए घर से निकल जाती  हैं.भैया नरेगा अभी आया है और कितना भला हो रहा है इनका, ढंकी छुपी बात नहीं है.सबसे पहले ये पानी के लिए ..फिर अन्न के लिए और जलावन के लिए .....
इन कामों में सिर्फ ३.७ फीसदी पुरुष ही मदद  करते हैं.पचास फीसदी अनाज की कूतायी-पिसाई  भी घरेलु औरतें करती हैं.
ग्रामीण या श्रमिक औरतों को छोड़ दें तो भी एक हिन्दुस्तानी औरत अपनी ज़िन्दगी के कई अहम् साल सिर्फ चूल्हा-चौकी और उसके धुएं में गंवा देती है.ज़हरीले धुएं से उसका जिस्म खोखला हो जाता है.एक रपट का हवाला लें तो घरों के अन्दर का वायु-प्रदूषण, बाहर के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है.  नाईट रोजन ओक साइड , कार्बन मनो ओक साइड जैसी ज़हरीली गैसें इनमें मिली रहती हैं. शायद यही सबब  है कि औरतों को जो गाँव में हैं या शहर की  तंग गलियों में विवश है...उन्हें दमा  और  टीबी जैसी बीमारी हो जाती  है.मजदूरिनों की हालत और भी बदतर  है.अब सरकार ने उत्पादकता तो मान लिया..सस्ती मजदूरी कौन  करेगा???? क्या इतने भर से उनकी समस्याएं हल हो गयीं....गाँव के बड़े बाबुओं द्वारा इनका जिस्मानी शोषण आम बात है.अक्सर दूसरों के खाने का इंतजाम करने वाली खुद भूखे सो जाती  है.कमर तोड़ महंगाई , आज भी गाँव और कई परिवारों की दशा मदर इंडिया की नर्गिस की ही तरह है...बर्तन और जेवर गिरवी तो हम जैसे लोग भी रखते हैं...वहाँ पता नहीं ये औरतें क्या-क्या  रखती हैं...विडंबना है..या नियति....पता नहीं..लेकिन तल्ख़ है ज़रूर!!!!यानी क़र्ज़ अदायगी के चक्कर में कई मासूम बालाएं बंधुआ मजदूर बन जाती  हैं..और इनके स्वामी इनसे सारी  मिहनत करवाता है..कई बार इन्हें गाँव छोड़कर दूसरी जगह देस-परदेस भी जाना पड़ता है..
कुछ दिनों पहले भाई आवेश ने खबर भी दी  मजदूरों के पलायन की.मध्य-बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ से पंजाब-कश्मीर तक पलायन करती इन महिला मजदूरों की लम्बी कतार है.नयी जगह, नए लोग.नयी आबो-हवा .....लेकिन कमाल !!इन के बच्चे कहीं भी धुल-मिटटी में पड़े कभी रोते-कभी मुस्कुराते हैं! इनकी सिहत की फ़िक्र तो कभी नए मालिक की ज़बान जो चुआती रहती है .....

जहां रहता हूँ वहाँ कई दिनों से इक इमारत बन रही है...रोज़ इन्हें देखता हूँ..कईयों से बात  ....ये उसी का दर्द है...कभी उनसे हुयी बात-चीत से भी रूबरू कर वाने का इरादा है..

6 comments:

Suman ने कहा…

nice

वाणी गीत ने कहा…

बहुत सार्थक प्रविष्टि ...
पूरी प्रविष्टि का गुणन करने के बाद विस्तृत टिपण्णी दे पाऊं ...अभी बस इतना ही ..!!

सतीश सक्सेना ने कहा…

शहरोज भाई !
बहुत यथार्थ परक और मार्मिक चित्रण किया है मजदूर और मेहनतकश महिलाओं का, बड़ी बड़ी बातें करने वालों को इनकी याद कभी नहीं आती ! आज भी वही दुर्व्यवस्था और अराजकता का माहौल है हमारे गाँव में ! देश की स्थिति सुधर रही है सहरोज भाई , उम्मीद रखिये कुछ अच्छा अवश्य होगा !
सादर !

राज भाटिय़ा ने कहा…

शहरोज भाई आप ने बहुत सही बात उठाई, लेकिन सिर्फ़ नारी ही क्या पुरुष भी बेचारा पिसता है, यह गरीबी जो ना करवाये वो कम, लेकिन नारी की दशा थोडी ज्यादा खराब होती है

rashmi ravija ने कहा…

आपने वो मुद्दा उठाया है,जिसकी तरफ कभी भी कोई एक नज़र डालने की नहीं सोचता...ग्रामीण माहिलाएं,इतना कठोर श्रम करती हैं और उन्हें दो जून की भरपेट रोटी भी नसीब नहीं होती...क्यूंकि वे पहले अपने,पति और बच्चों का ख़याल रखती हैं...जलती धूप में नंगे पैर वो कोसो चलती हैं,पानी भरने को...सर्दी में गरम कपड़े नहीं होते...और बरसात में भीगती हुई खेतों में काम करती हैं....पलायन बुरा तो जरूर है...पर महानगरों की नरक सी ज़िन्दगी में भी इनकी दो रोटी और कपड़ों का जुगाड़ तो हो ही जाता है....जबतक अच्छे रोजगार गाँवों में मुहैय्या नहीं करवाए जायेंगे...इनकी दशा में कोई परिवर्तन नज़र नहीं आता.

sandhyagupta ने कहा…

Post sochne ko majboor karta hai.

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