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शनिवार, 10 जुलाई 2010

बाज़ार ,रिश्ते और हम









हसीं वादियों में इठलाते एक देश
जहां स्याही सफेद हो जाया करती थी
में जा जा देसी कव्वे इतराते
देस में आकर इनका दर्प तीक्ष्ण हो जाया करता.

श्रद्धा,विश्वास,नैतिकता, ईमानदारी,सत्य,
अहिंसा,करुणा,वात्सल्य ..
ऐसे ढेर सारे फेशियल बाज़ार में मौजूद थे
जिनका इस्तेमाल गाहे बगाहे लोग खूब किया करते.



 





पुरखों की आत्माएं व्यथित थीं
उनकी भी जिन्होंने धर्मशालाएं बनवाईं,
लंगर आम हुआ
उनकी भी जिन्होंने सर्वस्व त्याग हिमालय में धुनी रमाई..

आत्माएं ऐसी माँ थी जिसके दिल से पहला शब्द उच्चारित हुआ था:
बेटे चोट तो  नहीं लगी
जबकि बेटा माँ का  कलेजा निकाल भागा कि 
ठोकर लगने पर गिर पड़ा था.

व्यथित इसलिए नहीं कि 
इमारतों से 
उनकी नाम पट्टी हटा दी गयी
दरअसल उन्होंने कभी नाम पट्टी लगवाई ही नहीं
आत्माएं
दुखी  इसलिए थीं कि
समय फेशियल का हो चुका था
और अब जगह  जगह 
गोयबल्स के साकार रूपों की जय जय कार हो रही थी...

गोयबल्स को नहीं जानते तो
यह अवश्य  सुना  होगा 

दिल्ली में बन्दर का धमाल
गणपति बप्पा का दुग्ध सेवन
हाजी पीर में समुद्री पानी  मीठा हुआ.



Modern Indian Poetry in English (Oxford India Collection)Indian PoetryIndian Love Poetry 

रविवार, 20 जून 2010

वफ़ा के नाम पर तुम क्यों संभल कर बैठ गए....

 नीतीश के बहाने


माँ जैसी कालजयी कृती के रचयिता गोर्की अक्सर कहा करते थे ,मित्रता ऐसी करनी चाहिए जो आगे चलकर बाधक न बने.लेकिन बहुधा लोग भूल जाते हैं.अब देखिये न राज्यसभा के लिए संपन्न कुछ सदस्यों के चुनाव में पतली गली से कौन किधर गया, दीवार भी नहीं सूघ पायी.उधर अनुशासन का दंभ भरने वाली भाजपा इतनी सशंकित रही कि राजस्थान में उसने अपने विधायकों को आलीशान होटलों में क़ैद कर दिया इसलिए कि कहीं ऍन वक़्त पर कोई कहीं बिदक न जाय ! जेठमलानी साहब को जिताना जो था.और मोदी ने मित्रता धर्म निभा ही दिया , साहब जीत गए.

लेकिन इधर बिहार में हँसते-खिल-खिलाते दो मित्रों की छपी तस्वीर लोग पचा नहीं पाए.इस वजह कर भाजपा-जद [यु] के  ख्यात रिश्ते में दरार पड़ गयी , ऐसा विश्लेषक मानते हैं.मामला तूल  पकड़ता जा रहा है. संभावना जतलाई जा रही है कि नितीश सरकार से भाजपा समर्थन वापस ले सकती है.उधर नितीश के आशिक रो रहे हैं कि जिस जयश्री राम की चादर का दायरा बढाने में उन्होंने समय समय पर अवसर उपलब्ध कराये [वह अपने दिवंगत गुरु वी.पी.सिंह का उद्धरण देते हैं ] उसी चादर के एक टुकड़े ने उनके चेहरे पर कालिख पोत दी ! खुदा न खास्ता सरकार गयी तो नितीश गाते-गुनगुनाते फिरेंगे :

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है, मुझे इस बात का ग़म है


कहावत है : अकेला चना भांड नहीं फोड़ता या एक से भले दो ! इस बिना पर मित्रता का जन्म होता है .व्यक्ती जानता है कि अकेलापन अभिशाप है और दूसरों का साथ वरदान ! वह मित्रों पर भरोसा करता है और भरोसे के एवाज़ में अपेक्षित व्यवहार चाहता है.दोस्ती वही जो परस्पर विश्वास और परस्पर हित का चिंतन करती हो.संसार के उद्भव से आज तक यही होता आया है.

लेकिन सत्ता की चाह में की गयी राजनितिक मित्रता के ऐसे कई दौर गुज़रे हैं, जहां पावर के लफड़े में कहाँ और किस जगह पुष्पहार में खंजर लटका होगा, पूर्वानुमान  लगा पाना  मुश्किल हो जाता है.क्या बिहार गए उदय ये जान पाए थे . जिनके वादे पर गए वही मित्र उन्हें दग़ा दे गए और लौट के उदय बेंगलेरु पहुंचे, बाकी बची थैली संभाले . दूसरी तरफ माल्या की थैली खूब काम आयी.


निति शतक का श्लोक है जिसका भावार्थ कुछ इस तरह होगा :

स्वार्थ मूलक मैत्री मध्यान्ह पूर्व की छाया के समान आरम्भ में बहुत विशाल होंकर क्रमश:क्षीण होती जाती है और सच्चे स्नेह भाव पर पनपी हुई मैत्री दोपहर बाद की संध्याकाल की छाया के समान शुरू में छोटी होंकर बाद में प्रतिपल बढ़ती जाती है.

यानी सहज वृद्धिशील मैत्री ही सच्ची मित्रता है.पर सियासी गलियारे में इस श्लोक पर कान धरने वाला कौन है ! अब देखिये न ! जिस अफज़ल गुरु की लंबित फांसी की सज़ा को जल्द से जल्द अंजाम तक पहुँचाने की मांग को लेकर भाजपा और उसके हितैषी रोज़ आसमान सर पर लिए घुमा करते हैं उसी के वकील रहे जेठमलानी साहब को भाजपा अपना सांसद  बनाती है.और उसकी अगुवाई वर्तमान के कथित ह्रदय सम्राट नरेंद्र मोदी करते हैं.और हाँ अटल जी के खिलाफ लखनऊ में यही जेठमलानी जब चुनाव में खड़े थे तो उन्होंने संघ की जांघिया बानियान खूब उधेड़ी थी.
क्या कीजये गा जब खाने की बारी आती है तो सभी एक पांत में पालथी मार कर बैठ जाते हैं.न अछूत, न छूत ! कोई भेदभाव नहीं.न कोई बड़ा, न छोटा . गर्व से कहो हम हिन्दू हैं ! यानी भारतीय हैं !

संसदनामे की खबर रखने वाले एक मित्र ने अभी सूचित किया है कि नितीश और शरद को अब फ़र्क़ समझ में आ गया है जैसा कि गोल्ड स्मिथ कह गए हैं , जो मित्रता बराबर की नहीं होती उसका अंत हमेशा घृणा में होता है.अब आपको भी भाजपा-बसपा की यारी और बाद में पलट्वारी की याद आ गयी होगी.चचा ग़ालिब ने कहा था :

बेगानगी-ए-ख़ल्क़ से बेदिल न हो ग़ालिब
कोई नहीं तो तेरा तो, मेरी जान खुदा है !


लेकिन चचा भूल गए कि मनुष्य को इसी हांड-मांस की दुनिया में रहना है.उसे यहाँ के लोगों से वास्ता पड़ता है और बंधु-सखाओं से आशा व अपेक्षा करना ग़ैर-वाजिब भी नहीं ! इलियट को घोंट जाओ कि शायद सबसे आनंददायक मित्रताएं वे हैं जिनमें बड़ा मेल है, बड़ा झगडा है और फिर बड़ा प्यार ! मतलब यह कि दोस्ती में मेल, झगडे और प्यार के हिंडोले तो चल सकते हैं [उपेक्षा और असहयोग के नहीं ]. लेकिन होता यह है कि जब अग्निपरीक्षा की घड़ी आती है हम बाहर निकलने का दरवाज़ा टटोलने कगते हैं.

खैर ! चलते-चलते :

वफ़ा के नाम पर तुम क्यों संभलकर बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं, बात है ज़माने की !



Government and Politics in South Asia: Sixth EditionBroken Landscape: Indians, Indian Tribes, and the ConstitutionHindu Nationalism and Indian Politics ; An Omnibus Comprising The Emergence of Hindu Nationalism in India; The Saffron Wave : Democracy and Hindu Nationalism in Modern India; The BJP and the Compulsio

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

या हुसैन वा हुसैन...तस्लीम [A] कर या न कर

नींद ....अचानक कभी नहीं ...आई लेकिन इधर ऐसा ही हो रहा है...और जानते हैं..उसका समय कब होता है जब मैं खर्राटें लेने लगता हूँ..ठीक उसी वक़्त  मुआज्ज़िन  अज़ान पुकार रहा होता है या दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही होती है ...जी आप सही समझ रहे हैं..रूह जब तक फ़िज़ूल की बक से कलांत और मस्तिष्क की शिराएँ सिकुड़ चुकी होती हैं...अजब रूह का रिश्ता है सारी दुनिया में...ऐसा उस पर पड़ते दबाव के सबब होता होगा ,,संभव है  .लेकिन मुझे कोई रोग नहीं है..मैं तो क़तई नहीं मान सकता ..हाँ इंसानियत ....की इस्मत ..लुटी जा रही है..संस्कृति का  शील भंग करने की कोशिशें की जा रही हैं  या  सभ्यता , कला, साहित्य सृजन ....का शाब्दिक बलात्कार हो रहा है....और हैरानकुन यह है कि ऐसा  करने वाले धार्मिक लोग हैं...खुद को वह ऐसा ही मानते हैं..आप न मानें ठेंगे से!!
और  ऐसे कई कारण हैं ..जैसे गोधरा, जैसे मुकम्मल तब का गुजरात...दिल्ली की दहशत..मुंबई में .....आततायियों का तीन दिनी खुला राज ....लेखक और चित्रकार का देस निकाला......ज़हन कुंद और दिमाग़ शिथिल होता जाता है..
मैं .....सोच नहीं पाता ..ऐसा क्यों..मैं मुसलमान हूँ..तो रश्दी का समर्थन करूँ या विरोध..कोई पूछता है..आपने हुसैन का समर्थन नहीं किया..क्या इसलिए कि आप मुसलमान हैं...मैं हुसैन को जानता हूँ..तसलीमा को जानता हूँ  रश्दी को उनके मुकाबले कम जानता हूँ..और हाँ उस कार्टून को भी देखा है.......जिसे लोग पैगम्बर के नाम से मंसूब करते हैं.....और एक निर्वस्त्र  स्त्री का चित्र भी देख रहा हूँ जिसे कई लोग सरस्वती कह रहे हैं...



 क्या ज़रूरी है कि आपकी माँ को लोग उसी नज़रिए से देखें...
.कोई उनमें सुन्दरता भी खोज सकता है..किसी को आपकी स्त्री कामदेवी   भी लग सकती हैं..कोई घुप्प अंधेरें में जागती आँखों उनके साथ सम्भोग भी करना चाहता हो....ये सरासर गलत हो सकता है ..इसे अपराध या पाप भी आप कह सकते हैं .

माँ की  जगह पत्नी बहन प्रेमिका कुछ भी हो..मेरा कहना  यह कि आप जिसे जिस रिश्ते, जिस स्नेह या जिस सम्मान से देखते हैं.जैसा बर्ताव करते हैं..यह ज़रूरी नहीं कि आपका पड़ोसी भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करे...ठीक है किसी ने एक कार्टून बनाया और पैगम्बर का नाम दे दिया.....किसी ने एक स्त्री को नंगा दिखाया..और उसे किसी देवी का नाम दे दिया गया....मैं नहीं जनता कि उस बनाने वाले का क्या उद्देश्य रहा होगा..मेरा तो यह कहना है.कि आप उस चित्र को अपना पैगम्बर क्यों मानते हैं..या अपनी देवी क्यों मान लिया.. बाबा तुलसी के यह शब्द :

जाकी  रही  भावना  जैसे
प्रभु  मूरत देखी तिन तैसी 
 

आपने अब तक जो पढ़ा ..आपकी अपने धर्म में जैसी श्रद्धा रही..क्या ये कथित तस्वीरें उन से मिलती हैं..जवाब होगा क़तई नहीं...तो आप क्यों आसमान सर पर उठाए फिर रहे हैं..ज़माने में और भी ग़म हैं..लोगों....

और आप जानते हैं..कला और साहित्य यानी सृजन-धर्मा लोग ज़रा अलग होते हैं...आप इन्हें आज की ज़बान में एडिअट्स कह सकते हैं.....लेकिन जानते हैं आप ..अब मैं उन हदीस का क्या करूँ जिनमें लिखा है.....लेखकों की स्याही शहीदों के खून से भी पवित्र होती है......
अब रश्दी ..तसलीमा  .......किसी ने कहा..आप इनमें हुसैन को भी साथ कर लें ..इन्हें आता-जाता कुछ नहीं..हाँ इनकी पकड़ बाज़ार पर खूब है..और बस ...यही उनकी सफलता का राज़ है  [इसे आप सार्थकता क़तई न समझें...सार्थक फ़नकार तो रामकुमार, रज़ा या प्रभा खेतान  और अरुंधती राय जैसे लोग होते हैं].

क्या हम मान लें.....आवेश की बात कि तसलीमा तोगड़िया की ज़बान  बोलती हैं.....या एक दूसरे मित्र का ब्यान कि रश्दी रोज़ सिगरेट की तरह स्त्री क्यों बदलते हैं ......हुसैन को सिर्फ माधुरी और स्तन-नितम्ब ही दिखाई क्यों देता है...



नाश्ता ..नहीं किया..बच्चा रो रहा है..आप कहाँ हैं..जब पत्नी ने टोका..तो तन्द्रा भंग हुई....




अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ....क्या ज़रूरी नहीं..क्या समाज के निर्माण में आप लेखक-फ़नकारों के योगदान को यूँ ही ख़ारिज कर देंगे....
आज़ादी का अर्थ यह तो नहीं कि आप अपनी धुन में ..नाली पर ढेला दर ढेला चलाते जाएँ..और किसी को उसकी गंदगी पर आपत्ति हो तो उस से मुंहजोरी करें......

 साहित्य  या ऐसी दूसरी कलागत विधा क्या आपसी नफरतों का विस्तार है.....
.प्रेमचंद गलत  थे या लूशुन ! जिन्होंने साहित्य कला को सबसे उंचा मक़ाम दिया....समाज के विवेक ..आगे चलने वाली मशाल ......
 अजंता या एलोरा या इरानी मुसव्विर जिसने ढ़ेरों नबियों के चित्र बनाए...जिनका ज़िक्र क़ुर्रतुल एन   हैदर ने अपने एक उपन्यास गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन में  किया है ,..
आप क्या करेंगे !!!!माथा टन..टन करता  है न !!

तीन वर्गों में विभक्त लोगों से क्या स्वस्थ्य  वाद-विवाद संभव है!!दो से तो ऐसी कल्पना करना  फ़िज़ूल है.इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब तक ही भली लगती है  कि उन पर या उनके धर्म पर किसी तरह की आंच न आये.एक ग्रुप जो हुसैन के समर्थन में है..उसे रश्दी और तसलीमा से उतना ही दुराव है.और जिन्हें तसलीमा और रश्दी या वह कार्टूनिस्ट सब से बड़ा मुक्तिबोध नज़र आता है  उन्हें हुसैन से  ओसामा लादेन की हद तक नफ़रत है.
ऐसी दोहरी मानसिकता या दोहरे मापदंड ....पूछने की कोई ज़रुरत नहीं है कि यार तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है?  तीसरा ख़ाना भी है  जिस में चंद लोगों की टोली है जो गाहे-ब-गाहे अपनी उपस्थिति इस नाते दर्ज कराता रहता है कि हम अभी ज़िंदा हैं.लेकिन नक्क़ार ख़ाने में तूती की भला क्या औक़ात!!


अदब-नवाज़ एक दोस्त ने किसी का शेर अपने तईं बदल कर मेरे चेहरे पर चस्पां कर दिया:

अदब का खून होता है तो मेरी रूह रोती है
अदब के साथ बे-अदबी बहुत तकलीफ़ होती है.

बे-अदबी कौन कर रहा है....बे-अदब कौन हैं यहाँ मानने को....विवेकानंद  का स्मरण यूँ नहीं होता....जो दूसरों से नफरत करता है वह खुद पतीत हुए बिना नहीं रहता..
क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी सदी के आखरी दशकों में ज्यादा से ज़्यादा धार्मिक होते गए...जिसे मैं धर्मांध होना कहता हूँ....फिर विवेकानंद ...धार्मिक पुनरुत्थान से गौरव भी है और खतरा भी, क्योंकि पुनरुत्थान कभी-कभी धर्मान्धता को जन्म देता है.धर्मान्धता इस सीमा तक पहुच जाति है की जिन लोगों ने इसकी शुरुआत की थी वे एक सीमा पश्चात इस पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो यह उनके नियंत्रण में नहीं रहती...हम ठीक इसी दौर में नहीं आ पहुंचे....
.क्या ईमान या किसी तरह की आस्था इतनी बौनी हो गयी कि कोई भी दुत्कार दे, लतिया दे.......क्या ऐसे सवाल गैर वाजिब हैं....

या कि यह अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक की सत्ता का खेल है..जहां आम लोगों की हैसियत .महज़ गिनती के लिए होती है..बगला देश , इरान या हिन्दुस्तान से रुसवा फ़नकारों के हाल-ज़ार को [यकीनन  वह फ़नकार  हैं!! ]  सी ए ज़ेड के इस उद्धरण से समझा जा सकता है: मनुष्य समाज का जो कबीला, जो जाति, जो धर्म सत्ता में आता  है तो वह समाज की श्रेष्ठता के पैमाने अपनी श्रेष्ठता के आधार पर बना देता है. यानी सत्ता पाए हुए की शक्ति ही व्यवस्था और कानून हो जाया करती है.
मेरी कैफ़ियत फिलवक्त अजब कश-म-कश की शिकार है  ..लेकिन अब बक़ौल लाओत्से , मैं जो भी कह रहा हूँ या कहना चाहता हूँ वह सत्य  के आस-पास भी  हो सकता है .

 आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं .

Indian Art (World of Art) Indian PaintingKama Sutra - Essentials for Lasting Intimacy

रविवार, 24 जनवरी 2010

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

-बिस्मिल अज़ीमाबादी!



जी हाँ!! इस मशहूर क्रांतिकारी पंक्ति जिसने अंग्रेजों की चूलें हिला दीं थीं. जिसे गुनगुनाते हुए  अपना सर्वस्व होम करना देशवासी अपना फ़र्ज़ समझते थे. इस ग़ज़ल के रचयिता आप ही हैं. दरअसल ख्यात देशभक्त जिनपर हमें नाज़ है, रामप्रसाद बिस्मिल को ये ग़ज़ल बहुत पसंद थी और खबर ये भी है कि इस ज़मीन पर आपने भी ग़ज़ल लिखी थी , उसमें बिस्मिल अज़ीमाबादी के मिसरे यानी पहली पंक्ति का उपयोग भी किया था.तो साथियों धीरे-धीरे ये पूरी ग़ज़ल ही उनके नाम होंकर रह गयी.बहुत दिनों से लोग इस पर काम कर रहे थे.अली सरदार जाफरी ने भी इन्हें प्रकाश में लाने की सार्थक पहल की.
लेकिन बिस्मिल अज़ीमाबादी या उनके परिवार के लोगो की इसमें रुचि ज्यादा नहीं थी. उनका दीवान हिकायत-ए-हस्ती भी बहुत बाद  [1980] में प्रकाशित होंकर आ सका.

मेरा जन्म जिस कस्बाई शहर शेरघाटी में हुआ , हमारे मोहल्ले में ही बिस्मिल अज़ीमाबादी की बेटी की शादी काजी हाउस के अहमद जुबैर [कृषि वैज्ञानिक]से हुई थी. सो मेरा झुकाव  ज़ाहिर है, बिस्मिल अज़ीमाबादी की रचनाओं को ढूंढ-ढूंढ कर पढने में रहा.



इस गुमनाम रहे शायर का असली नाम सैयद शाह मोहम्मद हसन उर्फ़ शाह झब्बो था . तखल्लुस  बिस्मिल  रखा . पटना के बाशिंदे थे सो उर्दू की परम्परानुसार अज़ीमाबादी !!उर्दू-शायरों का ये स्थान-प्रेम मुझे बहुत अच्छा लगता है. यूँ जन्म आपका पटने  से तीस किलोमीटर पर स्थित गाँव खुसरू पूर में हुआ. लेकिन दो साल के रहे होंगे कि  पिता चल बसे.शिक्षा-दीक्षा का दायित्व नाना सैयद शाह मुबारक हुसैन ने संभाला. पढने-लिखने के लिए कई जगह ले जाए गए, लेकिन जिसे नामी-गिरामी सनद कहा जाता है, हासिल न कर सके. हाँ समकालीन  रिवाज की दो भाषाएँ अरबी और फ़ारसी  का ज्ञान अवश्य ग्रहण कर लिया. उर्दू तो इनकी रगों में पैवस्त थी. पढ़ते क्या ख़ाक!! मन तो मुल्क की आज़ादी के लिए मचलता था और ज़हन ग़ज़ल की तलाश में यत्नशील. शुरुआत में शाइरी की इस्लाह शाद अज़ीमाबादी से लेते रहे. इनके बाद मुबारक अज़ीमाबादी को उस्ताद माना.तब इनकी उम्र महज़ 20 साल के आसपास रही होगी, 1921 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इन्होंने  इस ग़ज़ल को सुनाया था. अगले साल जब 1922 में काज़ी अब्दुल गफ़्फ़ार ने अपनी पत्रिका ‘सबाह’ में इस ग़ज़ल को छापा, तो अंग्रेज़ी हुकूमत तिलमिला गई। सभी अंक ज़ब्त कर लिए गए थे.

अब इस संक्षिप्त भूमिका के बाद आप इनकी ख्यात ग़ज़ल से खुद रूबरू हों:

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजूए कातिल में है 

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत में तेरे ऊपर निसार
ले तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल मैं है

आज फिर मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार
आयें वह, शौक़े-शहादत जिनके-जिनके दिल में है

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यों बताएँ क्या हमारे दिल में है  

अब न अगले वलवले हैं और न वह अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिले-बिस्मिल में है


[बिहार बोर्ड के कक्षा नौवीं के उर्दू के पाठ्यक्रम में पुस्तक द्रखशाँ   में ये ग़ज़ल शामिल की गयी है.यही कहा जा सकता है, देर आयद दुरुस्त आयद! ]
स्तम्भ:व्यक्तित्व 


Masterpieces of Modern Urdu PoetryPoems from Iqbal: Renderings in English Verse with Comparative Urdu TextMirza Ghalib: Selected Lyrics and Letters

रविवार, 17 जनवरी 2010

.रमेश बत्रा .:....मौत/खुदकशी/हत्या


जिंदादिल इंसान और उम्दा लेखक का जाना !

बाबूजी के पास सुबह-सुबह पहुंचा.सहारा उठाया : रमेश बत्रा नहीं रहे!
सहसा विशवास नहीं हुआ. लेकिन दिल्ली की कई तल्खियों की तरह यह भी स्वीकारना विवशता थी.कभी लगता है, बत्रा जी ने आत्महत्या की.एकबारगी नहीं, धीरे-धीरे!खुद को मौत की जानिब धकेलते रहे.तुरंत ख्याल हुआ,पाश या सफ़दर शहीद माने जाते हैं.लेकिन क्या रमेश बत्रा! हकीकत तो यही है कि उनहोंने शराब में खुद को डुबोकर ख़ुदकुशी नहीं की, बल्कि वो भी मारे गए, समय के क्रूर पंजों ने उन्हें भी निगल लिया, आहिस्ता-आहिस्ता निचोड़ते  हुए.मारे गए,अपने ही लोगों के हाथों!!

लेखक-पत्रकार बिरादरी के छद्म से वह तंग आ चुके थे.उनके काइयांपन और मौकापरस्ती से आहत  थे.लेकिन ज़ख्म उन्हें इतने गहरे, इतने तिक्त मिले कि, इनसे संघर्ष करने की बजाय अपनी इहलीला समाप्त करना आपने उचित समझा!
कमलेश्वर जैसे लेखक उनसे बहुत स्नेह रखते थे,ऐसा बत्राजी ने मुझसे कहा था.लेकिन यह शे'र भी तो है:

साहिल के तमाशाई हर डूबने वाले पर 
अफ़सोस तो करते हैं, इमदाद नहीं करते!

एक अच्छा फ़नकार  ! जिसके कलम में गज़ब का जादू था!आँखों में लबालब संभावनाएं! ललाट पर तेज! कुछ  कर गुजरने की ऊर्जा! और विचारशील मस्तक! सारिका में उपसंपादक, सन्डे मेल में सहायक संपादक, नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता , लघु-कथा आन्दोलन के संस्थापकों में से एक . पजाबी कथा-साहित्य की श्रेष्ठ रचनाएं उनहोंने बज़रिये अनुवाद हिंदी में प्रस्तुत की . लघु-कथा के अलावा उनहोंने कई उम्दा कहानी भी हिंदी-जगत को दी, जो संग्रहणीय है.

पचास वर्ष भी तो अभी पूरे नहीं हुए थे, उनके! बहुत कुछ उन्हें करना था.बच्चे भी है.काफी दिनों से परिवार से अलग रह रहे थे.प्रेम-विवाह किया था.

शाम हीरालाल नागर के यहाँ पहुंचा.वह भी उद्विग्न दिखे.कई मार्मिक संस्मरण सुनाया, हम दोनों की आँखें पनीली होती रहीं.उन्हें रात ही खबर मिल गयी थी.

बत्राजी से मेरी मुलाक़ात कथादेश का दफ्तर-कम-हरिनारायण जी  के घर पर हुई थी.[कमोबेश दो माह मैंने बतौर उपसंपादक वहाँ काम किया है.] पहले तो मैं उन्हें लक्ष्मीप्रसाद पन्त समझता रहा.गौर वर्ण , लंबा चौड़ा कंधा, जहां हम जैसे अभागे रोया करते.कंधा ज़रा झुक जाता जब आप खड़े होते.सामने के बाल साफ़.धीरे-धीरे परिचय हुआ.बहुत जल्द ही हमारे आत्मीय हो गए.यह मेरी नहीं उनकी खूबी का असर था.नाम तो सुन ही रखा था.कहानियां भी पढ़ रखी  थीं.सारिका और सन्डे मेल की प्रिंट लाइन में नाम भी देख रखा था.रहना क्या वह  कथादेश के कार्यालय सहायक-कम-घरेलु चाकर नवीन के साथ एक गोदाम नुमा कमरे में सोया करते थे.और अक्सर दोपहर तक वहाँ मिल जाते.हरिनारायण जी  कहते, मैं उनसे ज़्यादा संपर्क न रखूं.विश्वास करने लायक आदमी नहीं हैं.लेकिन मुझे वहउतने ही अधीक विश्वसनीय लगे.जितना कोई किसी का अपना हो सकता है.

लोग कहते हैं कि एक समय बत्राजी ने विभांशु दिव्याल और हरिनारायण जी की पर्याप्त सहायता की थी.और ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा थी जिनकी उनहोंने मदद की थी.जब उक्त दोनों सज्जन दिल्ली आये थे तो नए थे.और रमेश बत्रा स्थापित नाम था.राजधानी के प्रेस और साहित्यिक गलियारे का.कथादेश के शुरूआती दौर में उनका काफी सहयोग रहा.

आख़री समय बहुत पीने लगे थे.कभी मैं कहता,
बस!!
शहरोज़ सब ठीक हो जाएगा!
हां भैया क्यों नहीं!

उनहोंने इधर लिखना-पढना बिलकुल स्थगित कर रखा था.यह स्थगन ज़िन्दगी के साथ भी था.

मुझे लगता है कि  परिवार, समाज के अलावा कहीं न कहीं लेखक बिरादरी भी उनकी असामयिक मौत की जिम्मेवार रही है.हरिनारायण जी बहुत चिढ़ते थे.उन दिनों नवीन छुट्टी पर था.अफसर-मित्र की ज्योतिष-पत्रिका के दफ्तर में एक मेज़ कथादेश को भी नसीब हो गयी थी.हरिनारायण जी दोपहर बाद वहीँ निकल जाते.फ्लैट की ताली मुझे विभान्शुजी के घर पर देनी पड़ती थी.और यह बात मुझे बत्राजी को बताने की मनाही थी.ऐसा शायद इसलिए कि  हरिनारायण जी नहीं चाहते थे कि  बत्रा जी उनके यहाँ और रात गुजारें.मुझे ऐसा करना हमेशा गुनाह लगता रहा . लेकिन नया -नया दिल्ली आया युवक और पहली नौकरी.इस पेच-ख़म से अनजान था.

और एक दिन बत्राजी वहाँ से निकल गए.वहाँ के बाद कहाँ गए, मुझे अंत तक मालूम न हो सका.अंतिम मुलाक़ात नवभारत टाइम्स में हुई.मुंह से भभका फूटा .इधर-उधर की बात-चीत तो होती रही.पर मैं यह न पूछ सका कि वह इन दिनों कहाँ क़याम-पज़ीर हैं.

मुझे नींद नहीं आ रही है!!

और हंसी भी आ रही है.कल शोक सभा होगी.और लोग टेसुए बहायेंगे.ज़ार-ज़ार!!!

[वरिष्ठ लेखक विष्णुचंद्र शर्मा जिन्हें मैं सहज ही बाबूजी कहता हूँ.इस क्रूर शहर में मुझे उन्हों ने ही आश्रय दिया था, जब अपने भी मुहं घुमाए फिर रहे थे.खैर यह अवांतर प्रसंग है.उनदिनों मैं उनके यहाँ ही रहा करता था.डायरी का अंश है, जिसे उसी दिन यानी १६.३.१९९९ रात बेचैनी के आलम में मैंने लिखा था.] स्तम्भ :संस्मरण/व्यक्तित्व


Memoires affectives / Looking for Alexander (Original French Version with English Subtitles) Memoire D'homme By Nina Ricci For Men. Eau De Toilette Spray 3.3 Ounces A Writer's Notebook: Unlocking the Writer Within You

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

उर्दू के श्रेष्ठ व्यंग्य


[जिसे पढ़कर हँसी आ जाय वो हास्य हो सकता है,लेकिन जिस रचना का पाठ अन्तस् तक विचलित कर दे वही व्यंग्य हैं।राजपाल से उर्दू व्यंग्य पर हमारी एक पुस्तक आई उर्दू के श्रेष्ट व्यंग्य इस पुस्तक की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि उर्दू के कुछ महत्त्वपूर्ण व्यंग्य लेखकों की श्रेष्ठ रचनाओं के चयन का अभाव हिन्दी में अरसे से महसूस किया जा रहा था। व्यंग्य लेखकों की सूची तो काफ़ी बड़ी है। इस चयन में उन्हीं लेखों को शामिल किया गया है, जिसका पूरा सरोकार व्यंग्य से है। मेरा पूरा प्रयास रहा है कि हर लेखक की प्रतिनिधि-रचना अवश्य ली जा सके। समय अभाव तथा कहीं यह ग्रन्थ का आकार न ले ले, इस संकट से बचने का प्रयास भी रहा है। सम्भव है किसी को इस चयन के श्रेष्ठ व्यंग्य कहने पर आपत्ति हो, जो जायज़ है। मेरा दावा भी नहीं है, कोशिश भर की है। कई महत्त्वपूर्ण लेखक छूट गए हैं। चयन या संकलन का दायित्व सदैव विवादास्पद रहा है। इस चयन को तैयार करने में मुज्तबा हुसैन साहब का सर्वाधिक योगदान रहा है। उसके बाद वरिष्ठ हिन्दी कवि-लेखक विष्णुचन्द्र शर्माजी का बार-बार दबाव है। साथी कृष्णचन्द्र चौधरी तथा भाई नईम अहमद ने सामग्री संकलन में मदद की। मैं इन सबका तहेदिल से आभारी हूँ। आईये इसके सम्पादकीय ही से सही आपका परिचय करा ता चलूँ, मुमकिन है साहित्यतिहास के खोजियों को कुछ मदद मिल सके.]



व्यंग्य-लेखन हमारे यहाँ सामान्यतः दूसरे दर्जे की विधा मानी जाती है। माना यह जाता है कि हमारे भाषायी संस्कार में हास्य और व्यंग्य का तत्व आदि समय से ही अस्तित्व में है। इसका कारण है, उर्दू तथा हिन्दी में शामिल संस्कृत तथा अरबी-फ़ारसी शब्दों, मुहावरों की बहुलता, जो देशज भाषा तथा बोलियों में आकर अनूठे आकर्षण पैदा करते हैं। शेक्सपियर, आर्नोल्ड तथा अलेक्ज़ेण्डर पोप जैसे अंग्रेज़ी कवियों की पंक्तियों में उपस्थित समसामयिक स्थितियों, विडम्बनाओं पर तीक्ष्ण वार जब व्यंग्य माने जाने लगे तो हमने भी बाज़ाप्ता भारतीय सन्दर्भों में ऐसे रचनाकारों की खोज-बीन शुरू की, पता यूँ चला कि मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के समय पैदा हुआ जाफ़र ज़टुल्ली (1659 ई.) भारत का पहला व्यंग्य-कवि है। औरंगज़ेब के शासनकाल में मृत्यु को प्राप्त इस कवि ने कछुआनामा, भूतनामा जैसे अमर-काव्य की रचना की। औरंगज़ेब की मौत के बाद सत्ता के लिए उसके पुत्रों के मध्य हुए युद्ध को केन्द्र में रखकर रचित उनकी कविता जंगनामा व्यंग्य-इतिहास में मील का पत्थर है।

योरोप की भाँति भारतीय उपमहाद्वीप में भी व्यंग्य जैसी अचूक विधा का प्रयोग सबसे अधिक पद्य में किया गया। जाफ़र ज़टुल्ली से यह शुरू होकर कबीर, मीर, सौदा, नज़ीर अकराबादी, अकबर इलाहाबादी, रंगीन इंशा आदि अनगिनत उर्दू शायरों के यहाँ सामाजिक व्यवस्थाओं तथा धार्मिक अन्धविश्वासों पर कटाक्ष मिलता है। ग़ालिब जैसा शायर अपने ख़तों के माध्यम से साहित्य जगत् को उच्च स्तर का व्यंग्य-गद्य देता है। लेकिन व्यंग्य की विधा को स्वीकृति मिली 1877 में लखनऊ से मुंशी सज्जाद हुसैन के सम्पादन में संचालित पत्र अवधपंच के प्रकाशन से।
उर्दू व्यंग्य के इतिहास को पृष्ठवद्ध करना तथा क़रीब-क़रीब सभी नामचीन लोगों की रचनाओं को शामिल करना दुष्कर न सही कठिन-कर्म अवश्य है। बीती सदी भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक विकास की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। अन्य विधाओं की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। अन्य विधाओं की तरह व्यंग्य को इसी युग में लोकप्रियता मिली। जब उर्दू में व्यंग्य की बात की जाती है तो इसका अर्थ-आशय गम्भीर-गद्य लेखन से लगाया जाता है, जहाँ शब्द समय की विसंगतियों पर प्रकाश डालते हैं तथा यही शब्द मुक्ति का मार्ग भी बतलाते हैं। यह सिर्फ़ गुदगुदाते ही नहीं हैं। हमें अपने आप को नये सिरे से सोचने पर विवश भी करते हैं। सिर्फ़ चुटकुलेबाज़ी को व्यंग्य नहीं माना जा सकता है, जैसा इन दिनों कवि-सम्मेलनों के हास्य रस के कवि कर रहे हैं।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में व्यंग्य-निबन्धकारों में महफ़ूज अली बदायूँनी, ख़्वाजा हसन निज़ामी, क़ाज़ी अब्दुल गफ़्फ़ार, हाजी लक़लक़, मौलाना अबुलकलाम आज़ाद, अब्दुल अज़ीज़, फ़लक पैमा आदि का नाम सफ़े-अव्वल है। उसके बाद फ़रहत उल्लाह बेग, पतरस बुख़ारी, रशीद अहमद सिद्दीक़ी, मुल्ला रमूज़ी, अज़ीम बेग चुग्ताई, इम्तियाज़ अली ताज, शौकत थानवी, राजा मेंहदी अली ख़ान और अंजुम मानपुरी आदि व्यंग्यलेखकों का नाम और काम नज़र आता है। इसी दौर के इब्न-ए-इंशा भी हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू व्यंग्य लेखन के इतिहास में एक के बाद कई क़लमकारों का नाम दर्ज होता गया, लेकिन जिनमें ख़म था, उन्हीं को लोग दम साधे पढ़ते रहे, सुनते रहे। ऐसे ही कागद कारे करने वालों में कन्हैया लाल कपूर, फ़िक्र तौंसवी, मोहम्मद ख़ालिद अख़्तर, शफ़ीक़ुर्रहमान, कर्नल मोहम्मद ख़ान कृश्न चन्दर, मुश्ताक़ अहमद युसफ़ी, मुश्फ़िक़ ख़्वाजा, फुरक़त काकोरवी, युसुफ़ नाज़िम, इब्राहिम जलीस, मुज्तबा हुसैन अहमद जमाल पाशा, नरेंद्र लूथर दिलीप सिंह, शफ़ीक़ा फ़रहत आदि हस्ताक्षर प्रथम पंक्ति में अंकित किए जा सकते हैं।

अज़ीम बेग चुग्ताई मूलतः व्यंग्यकार नहीं हैं। लेकिन अपने अफ़सानों में उन्होंने जगह-जगह जो व्यंग्य की छौंक लगाई उसने उनके व्यंग्य को परिपक्व किया। इक्का, कोलतार, शातिर की बीवी आदि निबन्ध चर्चित व्यंग्य हैं। चुग्ताई के समकालीन मिर्ज़ा फ़रहत उल्लाह बेग की भाषा में मुहावरों का यथेष्ट इस्तेमाल मिलता है। कहा जाता है कि चुग्ताई ने व्यंग्य-कथा को जन्म दिया तो बेग ने ठेठ व्यंग्य की बुनियाद डाली। पतरस बुख़ारी के पास व्यंग्य की जो साफ़-सुथरी तकनीक मौजूद है, वो अन्यत्र दुर्लभ है। शौकत थानवी अपने समकालीन लेखकों में सर्वाधिक आकृष्ट करते हैं। परम्परा से विद्रोह इनकी पहचान है। रशीद अहमद सिद्दीक़ी के लेखन में जहाँ मनोरंजक स्थितियों का वर्णन है, तो आसपास ही व्यंग्य की तीक्ष्णता और चुभन भी आकार ग्रहण करती है। इब्न-ए-इंशा का शिल्प उन्हें दूसरों से अलग रखता है। शिष्टतापूर्वक अपनी बात रखना, साथ ही सामने वाले पर कटाक्ष भी करना अर्थात साँप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। उन्होंने उर्दू में व्यंग्य की विधा को एक नई ऊँचाई दी। बातों-बातों में हँसा देना फिर रुला देना यह शफ़ीक़ुर्रमान के बूते में था। अंग्रेज़ी साहित्य में ऐसी कला स्टीफन लीकॉक के पास थी। अहमद जमाल पाशा के व्यंग्य निबन्धों के कई संग्रह प्रकाशित हुए। उन्होंने व्यंग्य विधा को नितान्त नये शिल्प विधान में ढालने का यत्न किया। उनके निबन्धों में हास्य-व्यंग्य ऐसे रचे-बसे हैं कि आप उनकी अलग-अलग पहचान नहीं कर सकते। युसुफ़ नाज़िम वरिष्ठ व्यंग्य लेखक हैं। जिनके व्यंग्य तथा शब्दचित्र जितने लोकप्रिय हुए, उतनी ही लोकप्रियता उनकी अन्य रचनाओं को भी मिली। दरअसल अन्य विधाओं में भी वे व्यंग्य का इस्तेमाल इतने चातुर्य से करते हैं कि देखने वालों की आँखें ख़ुली की खुली रह जाती हैं। फ़िक्र तौंसवी उर्दू व्यंग्य साहित्य का स्तम्भ हस्ताक्षर हैं। इस व्यंग्यशिल्पी की मेधा ग़जब की थी। दैनिक मिलाप में वर्षों प्रकाशित इस लेखक के कॉलम ‘प्याज़ के छिलके’ के समान ही कॉलम में तह-दर-तह विडम्बनाओं का उद्धघाटन होता जाता था।

कृश्न चन्दर अफ़सानानिसार के नाते स्थापित हैं। लेकिन अपने गद्य लेखन की शुरुआत उन्होंने व्यंग्य से ही की थी। कन्हैयलाल कपूर का सम्पूर्ण सरोकार व्यंग्य से ही सम्बद्ध रहा है। दिलीप सिंह का उदय थोड़ा विलम्ब से अवश्य होता है, लेकिन उनके निबन्धों ने गम्भीर पाठकों का ध्यान बरबस आकृष्ट किया। आज़ादी के बाद यदि सबसे ज़्यादा ध्यान किसी व्यंग्यकार ने खींचा है तो वह हैं मुज्तबा हुसैन। हर घटना में व्यंग्य का तत्व। हर बात में हास्य का रस। यह उनका परिचय है। अपने लेखन का आरम्भ आपने उर्दू दैनिक सियासत से किया। उसके बाद आपकी क़लम सतत चलायमान है। नये शब्द और मुहावरे गढ़ने में भी सिद्धहस्त हैं। व्यंग्य-निबन्धों के अतिरिक्त आपके ख़ाके (शब्दचित्र) और यात्रा-संस्मरण ने पाठक और आलोचक को प्रभावित किया है। मुज्तबा हुसैन के बाद उर्दू में व्यंग्य परम्परा को आगे ले जाने वालों में वो साहस दिखलाई नहीं पड़ता है। यूँ तो कई नाम हैं, लेकिन वे अभी तिफ़ले-मक्तब ही जान पड़ते हैं। अभी काफ़ी अभ्यास की ज़रूरत है। हास्य को ही व्यंग्य नहीं समझा जा सकता।

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

अलविदा!! अहमद फ़राज़

हिन्दुस्तानी का शायर अहमद फ़राज़ :

किस-किस को बताएँगे जुदाई के सबब हम



उर्दू ज़बान हिन्दुस्तानी उपमहाद्वीप की साझा-संस्कृति और परम्परा की उपज है.यह ऐसी भाषा है जो आज भी विभाजित दो बड़े भूभागों को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है.ग़ज़ल की इसमें महती भूमिका है.दोनों मुल्क की पत्र -पत्रिकाये , ख्वाह हिन्दी या उर्दू की हों , सीमा आर-पार के शायरों से अटी रहती हैं।

अहमद फ़राज़ ऐसा ही शायर था.उसे फैज़ और जोश की परम्परा का माना गया ।

वोह दुन्या का गीत गाता रहा।
१२ दिसम्बर १९३१ को ,नोशेहरा में जन्मा ये शायर अमरीका में जाकर आखरी नींद सो गया.कुछ दिनों क़ब्ल भी इनकी मोत की अफवाह उडी थी, पर फहमीदा रियाज़ ने अखबारों में इक लेख के माध्यम से उसे ग़लत बताया था.कहा जाता है, ऐसी ख़बरों से उस आदमी की उम्र लम्बी होती है.लेकिन नियती!
पाकिस्तान का शहरी ये शायर भारत को अपना दूसरा घर कहता था.इसकी उपश्तिथि न हो तो बड़ा सा बड़ा मुशायरा नाकाम माना जाता था.खाकसार को bhi उनसे दो बार मिलने का saobhagy मिला है.राजपाल से प्रकाशित उनकी किताब ये मेरी नज्में,ये मेरी ग़ज़लें का हिन्दी लिप्यान्तरण मैंने ही किया था.और पाकिस्तानी शायरी का संपादन करते समय उनकी दस ग़ज़ल शामिल की थी.आप शायरी में अपने दिमाग का भी तुंरत इस्तेमाल करते थे.समकाल की बेचैनी का रेखांकन भी उनकी गज़लों में खूब होता है.कहा जाता है aहमद नदीम कासमी कि भावुकता का उन पर ज्यादा असर है, लेकिन फैज़ अहमद फैज़ जैसा प्रगतिशील शायर भी उन्हें खूब भाता था.शायरी के नित्य नए पडाओं और मोडों से आप वाकिफ रहे।
फ़ारसी में मास्टर डिग्री कि सनद से याफ्ता फ़राज़ साहब ने रेडियो के रिपोर्टर से आरम्भ कर अपनी नोकरी के लिए कई दफ्तरों के चक्कर ज्यादा nahin लगाये.प्रोग्राम प्रोड्यूसर हुए.पाकिस्तानी नेशनल सेंटर के निदेशक का पद आखरी रहा.कई वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे थे.उनकी करीब दर्जन-भर से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें दर्द-आशोब, तनहा-तनहा, शब्-खून, नायाफ्त,जानाँ-जानां प्रमुख हैं.हिन्दी में भी उनकी अधिकाँश चीज़ें उपलब्ध हैं.आपने नज्मों और गज़लों के अलावा नाटक भी लिखे।

रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ

शायद ही कोई मिले जो इस ग़ज़ल से अनजान हो.फ़राज़ कहा करते थे कि इसे मेहदी हसन ने इतना गाया है और इतना मशहूर कर दिया है कि अब ये उनकी ही ग़ज़ल मालूम देती है.फिजा में बार-बार उनका ही शे'र गूंजताहै:
क्या रुखसते-यार की घड़ी थी
हंसती हुई रात रो पड़ी थी

अब आप उनकी इक ग़ज़ल से रूबरू हों, बिल्कुल शान्ति के साथ।


ग़ज़ल
____अहमद फ़राज़

शोला था जल बुझा हूँ हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदायें मुझे न दो


जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुयाएँ मुझे न दो


यह भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
खुश्खाने-शहर क़बायें मुझे न दो


ऐसा न हो कभी की पलटकर न आ सकूं
हर बार दूर जाके सदायें मुझे न दो


कब मुझको अत्राफे-मुहब्बत न था फ़राज़
कब मैंने यह कहा है सजाएं मुझे न दो


_______________नगर के धनिकों,चोगा,


अग्रज साथी-रचनाकार aflaatoon ने भी फ़राज़ साहब को याद किया
हार जाने का हौसला है मुझे अहमद फ़राज़

स्तम्भ: व्यक्तित्व 
 

सोमवार, 18 अगस्त 2008

शर्म उनको मगर नहीं आती !

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पिछले दिनों उर्दू लेखकों की धर्मान्धता पर मैंने सवाल उठाया था.अच्छा लगा कई लोग मेरे साथ खड़े हुए.मेरा मानना है कि साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यक समाज की हो या बहुसंख्यक समाज की दोनों खतरनाक होती है.सतीश सक्सेना जी ने प्रतिक्रिया दी।आप ख़ुद भी विद्वान् हैं और अपने ब्लॉग पर समय के अहम् सवालों से जूझते रहते हैं.उनकी कविता भी जनता-जनार्दन की हँसी और खुशी की बात करती है.उनके ब्लॉग का पता है :
http://satish-saxena।blogspot.com/ और http://lightmood.blogspot.com/
अभी उनका मेल मिला है इसी मुद्दे पर चूँकि वो पोस्ट इसी जगह पोस्ट हुई थी सो उनकी प्रतिक्रिया भी मैं यहाँ देना उचित समझता हूँ.जोकि बहसतलब है।
_शहरोज़
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शर्म उनको मगर नहीं आती !

सतीश सक्सेना

आपने कट्टर धार्मिक असहिष्णुता, जो हमें आपस में लड़ा दे, उसका विरोध करने की हिम्मत की है ! मुझे चिंता यह है कि कुछ लोग आप जैसे सच्चे मुसलमान को भी काफिर या काफिरों का दोस्त न समझ लें ! आपके ही कहे हुए कुछ शब्द मुझे याद आ रहे हैं !
तंग-जाहिद नज़र ने मुझे काफिर समझा
aur काफिर ये समझता है मुसलमाँ हूँ मैं

ये हम जैसे तमाम लोगों की पीडा है.....

यह अफ़सोस जनक है कि आप जैसे लोगों की इस पीड़ा को कोई नही समझना चाहता , बड़े बड़े विद्वान् यहाँ ब्लाग जगत में ही कार्य कर रहे हैं, मगर कोई यहाँ आकर साथ नही खडा होता ! मैं अपने धर्म को बहुत प्यार करता हूँ मगर मैं अपने मुस्लिम भाइयों व मुस्लिम धर्म को भी उतना ही आदर कर, उन्हें यह अहसास दिलाना चाहता हूँ कि अधिकतर देशवासी उन्हें व उनके धर्म का उतना ही आदर करते हैं जितना अपने का ! और मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकतर मुस्लिम भी यही सोचते हैं ! फिर भी प्रतिक्रियावादी इन मीठे दरियाओं को सुखाने का, कोई हथकंडा खाली नही जाने देते ! मुझे नही लगता कि आप जैसे लोगों से अधिक कोई और धार्मिक सद्भाव रखता होगा ! मेरा व्यक्तिगत विचार है कि धर्म के दुरुपयोग करने बालों को बेनकाब करना ही चाहिए ! मगर इस नाज़ुक विषय पर सिर्फ़ उन्ही को आगे आना चाहिए जिसको इसकी समझ हो ! हमें अपने अपने धर्म को सम्मान देना है, और देना चाहिए ! धर्म सबसे ऊपर है, और अपने परिवार में संस्कार और सभ्यता धर्म की ही देन हैं ! मगर धर्म के तथाकथित अपमान के नाम पर उसका दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए ! दुःख तब होता है जब एक बेहद अच्छे और निश्छल व्यक्ति के ऊपर देश तोड़ने, विद्वेष फैलाने, और उसके अपने ही धर्म के अपमान का आरोप उसके ऊपर मढ़ दिया जाता है ! आप चलते रहें , मेरे जैसे बहुत से लोग आपको देख रहे हैं और आपका साथ भी देंगे ! यगाना के बारे में कुछ और तफसील दें, उन्हें पढ़ कर अच्छा लगेगा !

धर्म की परिभाषा लोग अपनी अपनी श्रद्धा और समझ के हिसाब से लगाते हैं , मगर यह नितांत व्यक्तिगत होना चाहिए ! धर्म को साइंस और वाद विवाद की कसौटी पर नहीं आजमाया जा सकता मगर लोग अक्सर इस विषय पर दो दो हाथ करने को हर समय तैयार रहते हैं ! हर मज़हब में सबसे अधिक किसी बात पर जोर दिया गया है, तो वह है आपस में मुहब्बत से रहना, और हम धर्म के जानकार सिर्फ़ इसे ही याद नही रख पाते ! कहते हैं गुरु के बिना सद्गति नहीं मिलती तो कहाँ मिलेंगे हमें गुरु ? आज देश को जरूरत है एक कबीर की जो हम सब को सही राह दिखलायें ! उनके शब्द .....

रहना नहीं देस बिगाना है
यह संसार कागज की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है
यह संसार काँटों की बाड़ी, उलझ उलझ मर जाना है
यह संसार झाड़ अरु झंखार, आग लगे गल जाना है
कहत कबीर सुनो भाई साधो ! सतगुरु नाम ठिकाना है

और मेरा यह विश्वास है कि हम सब में वह चेतना अवश्य जागेगी, एक दिन आएगा जब :
रामू को हर गोल टोपी और दाढ़ी बाले चचा की आंखों में मुहब्बत नज़र आने लगेगी
और मन्दिर के आगे से गुजरता हुआ रहीम, पुजारी को आदाब करके ही आगे जाएगा !

मगर मौलाविओं और पुजारिओं को समझाने के लिए कबीर कब आयेंगे ?
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