सोमवार, 18 अगस्त 2008

शर्म उनको मगर नहीं आती !

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पिछले दिनों उर्दू लेखकों की धर्मान्धता पर मैंने सवाल उठाया था.अच्छा लगा कई लोग मेरे साथ खड़े हुए.मेरा मानना है कि साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यक समाज की हो या बहुसंख्यक समाज की दोनों खतरनाक होती है.सतीश सक्सेना जी ने प्रतिक्रिया दी।आप ख़ुद भी विद्वान् हैं और अपने ब्लॉग पर समय के अहम् सवालों से जूझते रहते हैं.उनकी कविता भी जनता-जनार्दन की हँसी और खुशी की बात करती है.उनके ब्लॉग का पता है :
http://satish-saxena।blogspot.com/ और http://lightmood.blogspot.com/
अभी उनका मेल मिला है इसी मुद्दे पर चूँकि वो पोस्ट इसी जगह पोस्ट हुई थी सो उनकी प्रतिक्रिया भी मैं यहाँ देना उचित समझता हूँ.जोकि बहसतलब है।
_शहरोज़
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शर्म उनको मगर नहीं आती !

सतीश सक्सेना

आपने कट्टर धार्मिक असहिष्णुता, जो हमें आपस में लड़ा दे, उसका विरोध करने की हिम्मत की है ! मुझे चिंता यह है कि कुछ लोग आप जैसे सच्चे मुसलमान को भी काफिर या काफिरों का दोस्त न समझ लें ! आपके ही कहे हुए कुछ शब्द मुझे याद आ रहे हैं !
तंग-जाहिद नज़र ने मुझे काफिर समझा
aur काफिर ये समझता है मुसलमाँ हूँ मैं

ये हम जैसे तमाम लोगों की पीडा है.....

यह अफ़सोस जनक है कि आप जैसे लोगों की इस पीड़ा को कोई नही समझना चाहता , बड़े बड़े विद्वान् यहाँ ब्लाग जगत में ही कार्य कर रहे हैं, मगर कोई यहाँ आकर साथ नही खडा होता ! मैं अपने धर्म को बहुत प्यार करता हूँ मगर मैं अपने मुस्लिम भाइयों व मुस्लिम धर्म को भी उतना ही आदर कर, उन्हें यह अहसास दिलाना चाहता हूँ कि अधिकतर देशवासी उन्हें व उनके धर्म का उतना ही आदर करते हैं जितना अपने का ! और मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकतर मुस्लिम भी यही सोचते हैं ! फिर भी प्रतिक्रियावादी इन मीठे दरियाओं को सुखाने का, कोई हथकंडा खाली नही जाने देते ! मुझे नही लगता कि आप जैसे लोगों से अधिक कोई और धार्मिक सद्भाव रखता होगा ! मेरा व्यक्तिगत विचार है कि धर्म के दुरुपयोग करने बालों को बेनकाब करना ही चाहिए ! मगर इस नाज़ुक विषय पर सिर्फ़ उन्ही को आगे आना चाहिए जिसको इसकी समझ हो ! हमें अपने अपने धर्म को सम्मान देना है, और देना चाहिए ! धर्म सबसे ऊपर है, और अपने परिवार में संस्कार और सभ्यता धर्म की ही देन हैं ! मगर धर्म के तथाकथित अपमान के नाम पर उसका दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए ! दुःख तब होता है जब एक बेहद अच्छे और निश्छल व्यक्ति के ऊपर देश तोड़ने, विद्वेष फैलाने, और उसके अपने ही धर्म के अपमान का आरोप उसके ऊपर मढ़ दिया जाता है ! आप चलते रहें , मेरे जैसे बहुत से लोग आपको देख रहे हैं और आपका साथ भी देंगे ! यगाना के बारे में कुछ और तफसील दें, उन्हें पढ़ कर अच्छा लगेगा !

धर्म की परिभाषा लोग अपनी अपनी श्रद्धा और समझ के हिसाब से लगाते हैं , मगर यह नितांत व्यक्तिगत होना चाहिए ! धर्म को साइंस और वाद विवाद की कसौटी पर नहीं आजमाया जा सकता मगर लोग अक्सर इस विषय पर दो दो हाथ करने को हर समय तैयार रहते हैं ! हर मज़हब में सबसे अधिक किसी बात पर जोर दिया गया है, तो वह है आपस में मुहब्बत से रहना, और हम धर्म के जानकार सिर्फ़ इसे ही याद नही रख पाते ! कहते हैं गुरु के बिना सद्गति नहीं मिलती तो कहाँ मिलेंगे हमें गुरु ? आज देश को जरूरत है एक कबीर की जो हम सब को सही राह दिखलायें ! उनके शब्द .....

रहना नहीं देस बिगाना है
यह संसार कागज की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है
यह संसार काँटों की बाड़ी, उलझ उलझ मर जाना है
यह संसार झाड़ अरु झंखार, आग लगे गल जाना है
कहत कबीर सुनो भाई साधो ! सतगुरु नाम ठिकाना है

और मेरा यह विश्वास है कि हम सब में वह चेतना अवश्य जागेगी, एक दिन आएगा जब :
रामू को हर गोल टोपी और दाढ़ी बाले चचा की आंखों में मुहब्बत नज़र आने लगेगी
और मन्दिर के आगे से गुजरता हुआ रहीम, पुजारी को आदाब करके ही आगे जाएगा !

मगर मौलाविओं और पुजारिओं को समझाने के लिए कबीर कब आयेंगे ?

15 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन आलेख--आभार.

Anil Pusadkar ने कहा…

shahroz bhai aapko aur satish jee ko salaam.aankhen khol de ye magar unka kya kiya jay jo dusron ki aankhon se dekhte hain

Anil Pusadkar ने कहा…

shahroz bhai aapko aur satish jee ko salaam.aankhen khol de ye magar unka kya kiya jay jo dusron ki aankhon se dekhte hain

बालकिशन ने कहा…

विचारोत्तेजक विश्लेषण.
बहुत अच्छा लिखा आपने
आपको सलाम.

सतीश सक्सेना ने कहा…

शुक्रिया अनिल भाई,
आपके साथ देने के लिए धन्यवाद ! यहाँ अच्छा सोचने तथा अच्छा लिखने की कोई कद्र नहीं है, यहाँ कद्रदान हैं मशहूर चौपालों के, मशहूर नामों के, अपने स्वयं के ! ख़ास तौर पर अगर कोई नया नाम या व्यक्ति अच्छा लिखता है तो आश्चर्य की बात है की ये मशहूर लोग आकर उसकी हौसला अफजाई कभी नही करते बल्कि इंतज़ार करते हैं, कि प्रतिक्रियावादियों के गंदे कमेंट्स एवं ईमेल्स सहते हुए उसका जोश कितने दिन तक साथ देगा ! अधिकतर मौकों पर पोस्ट को ध्यान से बिना पढ़े ही वाह ! वाह ! की जाती है, और संवेदनशीलता के बारे में कहना ही बेकार है ! जब यहाँ आए थे तो सोचा था संवेदनशील मौकों पर भाई लोग सहारा देंगे....
यह सुनके हमने मयखाने में अपना नाम लिखवाया
जो मयकश लड़खडाता है, वो बाजू थाम लेते हैं !

मगर अब लगता है कि....
ये किस बाज़ार में बिकने कि खातिर आ गया हूँ मैं......

Priyankar ने कहा…

आप दोनों से सहमत हूं और आपके साथ खड़ा हूं .

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

एक बार फिर एक अच्छी और सार्थक पोस्ट देने के लिए बधाई!
दुआ भी की धीरे-धीरे ये कारवां बढ़ता जाये

अनुराग ने कहा…

जो भी लिखा है दिल से लिखा है पर एक बात कहना चाहूँगा ब्लॉग पर लिखने वाले सब विद्वान नही होते .....हाँ शहरोज जी आप बिंदास लिखिए .....

सतीश सक्सेना ने कहा…

प्रियंकर जी के आश्वासन के लिए हार्दिक आभार !
और यही शब्द हमारी जीत भी है जिसका हमें शुरू से विश्वास था ! मगर जरूरत है की आप जैसे मशहूर नाम कलम से इसका जवाब देन ! हमारे इस शानदार देश से भय और अविश्वास का माहौल ख़त्म करवाने के लिए रुढियों, पुराने सडे गले रीतिरिवाजों और सुनी सुनाई गाथाओं से बाहर निकलने में आप सब को आगे आना चाहिए. अन्यथा हममें और पकिस्तान में फर्क ही क्या बचेगा ! धर्मनिरपेक्षता को आज कुछ लोग राजनीति से जोड़ने लगे हैं जो सर्वथा अनैतिक है ! सवाल देश और हमारी नयी पीढी की बेहतरी का है, आने बाली पीढी इस देश की धरोहर है, इनका हिंदू - मुसलमान से कुछ लेना देना नहीं है, यह गंदगी हमारे साथ ही ख़त्म होनी चाहिए ! आपलोगों से करवद्ध प्रार्थना है की माहौल बनाये जिससे यह बबूल के पेंड हम मिल कर उखाड़ सकें ! आपका दुबारा आभार, नेकनीयती के साथ आपने आश्वासन दिया !

महामंत्री-तस्लीम ने कहा…

मैं भी इस बात का कायल हूं कि धर्म व्यक्गित आस्था का विषय है, उसपर राजनीति नहीं की जानी चाहए।

hum tum ने कहा…

hindu shashtro me kaha gaya hai ki sharir ke palan ke liye kiya gaya karm hi dharm hai.phir isme kattarta ki kahan gunjaish hai.ha is paribhasha ke anusaar ham sam dharmik jaroor hai.ab ye apni apni mati hai jo kuch logo ke bahkave me maari jaati hai.

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

मगर मौलाविओं और पुजारिओं को समझाने के लिए कबीर कब आयेंगे ?
बिल्कुल सच , वक्त की यही नजाकत है कि हमे कबीर जैसे सख्त चेहेरे की जरुरत है जो सही और गलत को बेनकाब करने की हिम्म्मत रखता हो ।

Nitin Anand ने कहा…

अच्छी बात कही है आपने, मगर मुझे ऐसा लगता है, धर्मं का विकास भी अनिवार्य है,
कालांतर में मान्यताएं और धारणाएं बदलती रहती हैं। समाज व्यतिवादी बन चुका है। धर्मं अपने आप में परिपूर्ण, सनातन नही हैं। अगर ऐसा होता तो दुनिया में सबसे ज्यादा युद्ध धर्मं के नाम पर नही हुए होते। धर्मं आस्था और व्यतिगत रुचि के दायरे में परिभाषित होना चाहिए। इसके सामाजिक या सामूहिक अस्तित्व में मैं विश्वास नही करता। इसके नियम, आस्थाएँ व्यक्ति के मन और आत्मा के बीच वार्तालाप पर अवलंबित होने चाहिए। इसे समाज या कुछ स्वयं सिद्ध लोग परिभाषित ना करें। जब तक धर्मं अपने सामाजिक अस्तित्व को नही त्यागता, ये कभी नही रुकेगा।

Saagar ने कहा…

दिमाग खोल कर लिखने के कायल हुए हम, उम्मीद करता हूँ यह तल्खी उन तक पहुचे जो कुँए को ही संसार मानते है आपने आमंत्रण दिया था हमने कुबूल की खुसी है मैंने वक्त जाया नही किया और एक सच्चे दोस्त से मुलाक़ात हो गयी शुक्रिया

sAAGAR

sushil ने कहा…

सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी
तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी

हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै

का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्‍ही जी
केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी

जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला
लम्‍बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला
चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला
एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला

नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी
हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी
झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्‍ही जी
खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी

उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ
कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ
दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ

कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी
चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी

घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले

तोहरै नाम बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्‍ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्‍ही जी
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी

जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै

अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी
आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी
करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी
एक समय क' बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी

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