स्त्री-विमर्श लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्त्री-विमर्श लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक बी आपा की



महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज की हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं।
इनके उत्थान के लिए बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी।
महात्मा गांधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था। मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।

पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।

लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है,इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81

मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।

पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने कहा था :

तुमने अगर इक मर्द को पढाया तो मात्र इक व्यक्ति को पढ़ाया। लेकिन अगर इक औरत को पढाया तो इक खानदान को और इक नस्ल को पढ़ाया।

लेकिन हुज़ूर का दामन नहीं छोड़ेंगे का दंभ भरने वाले अपने प्यारे महबूब के इस क़ौल पर कितना अमल करते हैं।

आलेख पूरा पढने के लिए क्लिक करें













रविवार, 13 दिसंबर 2009

विवादित है ‘नारी’!

वाह भाई! वाह!!! अब ब्लागर भी महिला-पुरुष, हिंदू - मुसलमान, अवर्ण-सवर्ण हो गया। औरत होने की सज़ा लिखने के बाद कइयों ने मुझसे कहा कि मुझे यह सब उनके हवाले छोड़ देना चाहिए। यानी महिला ब्लागरों के। आप अपने समाज के बारे में क्यों नहीं लिखते। मुस्लिम ब्लागर हैं ही कितने!!! किसी ने कहा कि नारी नामक ब्लाग विवादास्पद है।
इस विभाजन का मैं शुरू से ही मुख़ालिफ़ रहा हूं। हमारा हिंदी साहित्य समाज इस रोग से पहले ही ग्रसित था लेकिन चिट्ठा जगत को इससे गुरेज़ करना चाहिए। लेखक सिर्फ़ लेखक होता है। और कोई इस आग्रह-पूर्वाग्रह से किसी चीज़ को देखता है या लेखन करता है तो ऐसा लेखन अमरत्व हासिल कभी नहीं करेगा। गर कोई औरत के बारे में लिखता है या कोई दलित के मुतल्लिक़ सवाल करता है। यहां गलत क्या है। अंग्रेज़ी के चावसर और हिंदी के संभवत दूबेजी टोटा रटंत करा गए कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। और हम सब इसी समाज में तो रहते हैं। चाहे महिता हों ,पुरुष हों, अवर्ण या सवर्ण हों।
लेकिन भौतिक्तावादी उपभोगतावाद के पड़ते हथौड़े से दर्पण में आई किरचों ने सारा गुड़ गोबर कर दिया है। चीन्ह- पहचान ,भाई- भतीजावाद और वर्ग-जाति की सड़ांध पत्र -पत्रिकाओं से लेकर अब हिंदी ब्लागों तक स्पष्ट महसूस की जा रही है। ज्यादा से ज्यादा क्लिक करवाने की होड़ मची है। शोहरत का नशा भी भोगवाद की ही एक शक्ल है। ब्लाग अपनी बात रखने के लिए बहुत ही अच्छा मंच है। हम लोंगों को इसका सदुपयोग करना चाहिए। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं । लेकिन इधर जिस तरह की पोस्ट या कमेंट पढ़ने को मिल जाते हैं, ऐसी अमर्यादित बोली भाषा से हमें बचने की ज़रूरत है।

ज़िक्र साहित्य और पत्रकारिता का व्हाया ब्लाग

भोगवाद की बारिश ने हम जैसे कलम घिस्सुओं को भी पानी-पानी कर दिया है। भौतिक सुख-सुविधा के सामने आदर्श ,देशहित, नैतिक्ता सब कुछ नतमस्तक हो रहे हैं । रातों-रात सब कुछ भोग लेने की प्रवृति ने जोर पकड़ा है । उत्कृष्ट साहित्य, पटल से पूरी तरह ग़ायब है । प्रसिद्धि की भेड़चाल ने कला, साहित्य के नाम पर कुछ भी परोस देने की कुपरंपरा को जन्म दिया है। एक श्लोक याद आयाः

घटं मिंद्यात, पट छिंद्यात
कुर्यात रासम रोदनम्
येनकेन प्राकरेणः पुरुषो भवेत्।

यानी किसी को शोहरत पानी हो तो उसे चाहिए कि किसी का घड़ा फोड़े, किसी का कपड़े फाड़े या गधे की तरह रेकना शुरू कर दे । तब लोग उसे जान ही जाएंगे। साथियो, ऐसा भी हो रहा है, यह कहने में कोई संकोच नहीं। प्रायोजित मानसम्मान की फसल भी ख़ूब लहलहा रही है। एयरकंडीशंड में बैठकर कालाहांडी पर कविताएं की जाती हैं। पत्रपत्रिकाओं से लेकर ब्लागरों ने भी अलग-अलग दुकान सजा रखी है। देश-भर में जिसके अपने-अपने एजेंट तैयार हैं। लेकिन ऐसा हरगिज़ नहीं कि अच्छी रचनाएं लिखी ही नहीं जा रही हैं। दरअसल उनका यथेष्ठ प्रकाशन-प्रसारण नहीं हो पाता है। यदि कहीं हो गया तो उसकी चर्चा नहीं की जाती। कइयों के अंदर बहुत कुछ उबलता है पर परिस्थिति उसे बाहर आने से रोक देती है। गांव, क़स्बों और महानगरों में रोटी-रोज़ी के लिए जूझते ऐसे असंख्य क़लमकारों की पीड़ा को माधव कौशिक बयान करते हैं :

सपनों की दर्द आह पर कुछ भी नहीं लिखा
हमने बदन की चाह पर कुछ भी नहीं लिखा

जब सरफ़रोशी की तमन्ना लिए लोग सड़कों पर निकल आते थे। उस दौर में अकबर इलाहाबादी ने कहा थाः

है नहीं शमशीर तो अपने हाथों क्या हुआ
हम क़लम से ही करेंगे क़ातिलों के सर क़लम

हम कर तो यही रहे हैं लेकिन अपने ही भाइयों का सर क़लम कर रहे हैं। जो ग़लत है। अख़बार तो एक ब्रांड बन चुका है। इसका उपयोग हर भले बुरे कामों के लिए किया जाता है। नेता जैसा शब्द कभी आदर सूचक हुआ करता था लेकिन आज इसकी इतनी तौहीन-फ़ज़ीहत हो चुकी है कि उबकाई आती है। ऐसा ही कुछ-कुछ अब लेखक या पत्रकार जैसे शब्द को सुनकर होता है। प्रबुद्ध कहा जाने वाला तबक़ा नाम-भर का प्राणी रह गया है। जैसी कभी रही होगी वैसी सोच और व्यवहार में एकरूपता ढूंढते रह जाएंगे। सीख व विचार बहुत है। बात वही पेप्सी पीते हुए गांधी का स्मरण करना। बुद्धिजीवि लफ़्फ़ाज़ी करना तो खूब जानता है लेकिन कहां??? बस एक दूसरे की टांग खींचने में या फ़ला- फ़लां को नाम सम्मान दिलाने में अपनी ज़्यादातर ऊर्जा खपा देता है। यदि शब्दों का सार्थक उपयोग करे तो क्या कमाल की बात हो। प्रेमचंद ने कहा हैः साहित्य राजनीति के आगे आगे चलने वाली मशाल है। आम आदमी के दुख दर्द के प्रति इनका नज़रिया नित्य पार्टी बदलने वाले नेताओं से कम नहीं। बात यहीं तक महदूद नहीं है।
अब तो दलित लेखक, महिला ब्लागर, मुस्लिम कवि !!!!
ऐसा अगल्ला पुछल्ला क्या आपको उद्वेलित नहीं करता???



शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

सज़ा औरत होने की



‘महिलाओं के साथ बेइज़्जती’ कइयों ने नारी के सर दोष मढ़ने की कोशिश की है। उनका कहना है कि औरतें इन दिनों खुद ही भोगवस्तु बनने को उतारू हैं। अपनी चालढाल से पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करती है। किसी हदतक इसे स्वीकार किया जा सकता है। यह मौजूदा उपभोगतावादी समय का असर है। इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों ने उनके काम पर कम उनके कमर पर ज़्यादा ध्यान दिया है। उनके डगर में तब्दीली आई भी है। अकबर इलाहाबादी ने बहुत पहले कहा था:
हमहीं से सब यह कहते हैं कि रख नीची नज़र अपनी
कोई उनसे नहीं कहता न निकलें यूं अयां होंकर


पीरधान के मामले में सभी के अपनेअपने तर्क हैं। इसी वजहकर शायर असलम सादीपुरी को भारतीय नारी की पहचान करने में दुविधा होती हैं :
मशरिक की यह देवी है कि मग़रिब की परी है
बाज़ार के नुक्कड पर जो बेपरदा खडी है


अकबर हों या असलम सिर्फ़ शहरी महिलाओं की बात करते हैं जबकि यौनाचार की अधिकांश घटनाएं गांव में घटती हैं। सारे वैश्विक परिवर्तनों के बावजूद हमारे गांव का तानाबाना अभी तक 16वीं और 17 वीं सदी का है। तस्लीमा नसरीन ने कहा था कि पैर की पाज़ेब भी पुरुष द्वारा थोपी गई जकड़न की निशानी है। औरत कहां जा रही है इसका पता पाज़ेब की घुंघरू से चल जाता था । विज्ञान यह नहीं बता पाया है कि पहले पुरुष ने जन्म लिया या औरत ने! जैसे कोई नहीं बता सकता कि पहला व्यक्ति हिंदू था या मुसलमान! सभी देवी-देवताओं या आदमहव्वा की बात करते हैं। खै़र! पहले कौन जन्मा? इस माथपच्ची में न पड़े लेकिन जब से यह पृथ्वी पर हैं इनके मध्य-नफ़रत भरे प्रेम का खेल बदस्तूर जारी है। नरनारी का रिश्ता उस अंग्रेज़ी गाने की याद दिलाता है जिसमें कहा गया है कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता मैं तुम्हें नापसंद नहीं करता लेकिन तुम्हारे बिना मैं रह नहीं सकता। पुरुष पर फ़तवा लगाने वाली चंद महिलाएं हुयीं पर पुरुष ने उसे हर कोण से आंकने-परखने की कोशिश की है। ख्यात लेखक जैनेंद्र सवाल करते हैं स्त्री क्या चाहती है? अधीनता और स्वतंत्रता। शायद एक साथ दोंनो चाहती है। ऐसा कम ही देखने आता है। जटिल प्रश्न है।बाबा तुलसीदास नारी को ताडन का अधिकारी मानते हैं . कइयों को नारी पाप का जड़ लगती है तो किसी को नर्क का द्वार। किसी के लिए जन्नत का दरवाज़ा।किसी के लिए माया है किसी के लिए छल! सीताहरण करने वाले श्री लंकेश का पुतला हर साल जलाया जाता है। महज़ प्रतीक-भर किसी मुर्दे का पुतला जलाए जाने से बेहतर होता दहेज के नाम पर जलाई जा रही अनगिनत अबलाओं को बचाना। यहां तो पुरुष ने तलाक़ दिया और हलाला करे औरत!(गर तलाक़शुदा औरत से दोबारा शादी करनी है तो औरत किसी मर्द से शादी करे और फिर वह मर्द उसे तलाक़ दे तब जाकर वह पहला पुरुष उससे शादी कर सकता है। कुरआन की कोई दलील नहीं है बावजूद यह ग़लत परंपरा जारी है)। कुछ साल पहले राजस्थान में अजूबी घटना हुई। एक पंचायत ने फैसला सुनाया कि जिस औरत के साथ बलात्कार हुआ है उसका पुरुष उक्त बलात्कारी की पत्नी के साथ बलात्कार करे!!!!
यानी कुल मिलाकर नारी ही दंड भोगे!!!! वह रे न्याय!!! अब आप सर खुजलाएं या सिर फोडें़।आज भी कई रूपकुंवर मृत पति के साथ ज़िंदा स्वाहा कर दी जाती है।भले प्रसाद उसकी श्रद्धा करें या राष्ट्रकवि मैथिलिशरण उसके अबला जीवन पर आंख सुजाने तक रोएं हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है। पुरुष की जटिलताएं अजीब हैं। वह स्वयं समस्याएं खड़ी करता है और स्वयं ही समाधान भी चाहता है। बहुत बहुत पहले अरस्तु ने कहा थाः नारी की उन्नति या अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्भर करती है। आज़ादी से पहले नारी की दशा दलितों भी बदतर थी। कालांतर में काफ़ी क़ानूनी फेरबदल हुए। उन्हें आरक्षण दिए जाने की वकालत की जा रही है। लेकिन इस वकालतबाज़ी ने अख़बार के रिक्त पन्नों के सिवाय भरने के किया क्या है?
अरविंद जैन की चर्चित पुस्तक औरत होने की सज़ा बताती है कि वे तमाम क़ानून जो स्त्रियों को सुरक्षा और सुविधा देने के नाम पर बनाए जाते हैं या प्रचारित किए जाते हैं अपने मूल रूप में मर्दों द्वारा मर्दों की सुविधा के लिए बनाए गए हैं। हंस संपादक और नामीगिरामी लेखक राजेंद्र यादव पुस्तक की भूमिका में लिखते हैः हमारे सारे परंपरागत सोच ने नारी को दो हिस्से में बांट दिया है। कमर से ऊपर की नारी और कमर से नीचे की औरत...........कमर से ऊपर की नारी महिमामयी है करुणाभरी है। सुंदरता और शील की देवी है। वह कविता है संगीत है अध्यात्म है और अमूर्त है। कमर के नीचे वह कामकंदररा है कुत्सित और अश्लील है ध्वंसकारिणी है राक्षसी है और सब मिलाकर नरक है।
आएं इस परंपरागत सोच में तब्दीली लाएं। जागृति लाओ कि विश्व का अज्ञान दूर हो सके।












गुरुवार, 4 सितंबर 2008

अनपढ़ क्यों हैं मुस्लिम औरतें

तुमने अगर इक मर्द को पढाया तो मात्र इक व्यक्ति को पढाया। लेकिन अगर इक औरत को पढाया तो इक खानदान को और इक नस्ल को पढाया।

ऐसा कहा था पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने ।
लेकिन हुजुर का दामन नहीं छोडेंगे का दंभ भरने वाले अपने प्यारे महबूब के इस क़ौल पर कितना अमल करते हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर ४० प्रतिशत है,इसमें मुस्लिम महिला मात्र ११ प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाहों का प्रतिशत मात्र २ है और स्नातक तक का प्रतिशत ०.८१
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात ५६.५ फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ ४० प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात ५२.३ है तो छात्राओं का ३० प्रतिशत है।
मुस्लिम औरतों के पिछडेपन की वजह हमेशा इस्लाम में ढूँढने की कोशिश की जाती रही है।
इस्लाम कहता है , पिता या पति की सम्पति की उत्तराधिकारी वो भी है । वो अपनी से शादी कर सकती है.हाँ, माँ-बाप की सहमती को शुभ माना गया है। उसे तलाक़ लेने का भी अधिकार है.विधवा महिला भी विवाह कर सकती है.अगर मुस्लिम महिला नौकरी या व्यवसाय करती है तो उसकी आय या जायदाद में उसके पिता, पति, पुत्र या भाई का कोई वैधानिक अधिकार हासिल नहीं रहता। साथ ही उसके भरण-पोषण का ज़िम्मा परिवार के पुरूष सदस्यों पर ही कायम रहता है।
इसके अतिरिक्त भी कई सुविधाएँ और अधिकार इस्लाम ने महिलाओं को दिए हैं जो इस बात के गवाह हैं कि उनके अनपढ़ रहने या पिछडेपन के लिए धर्म के नियम-कानून बाधक नहीं हैं।
इसके बावजूद उनकी हालत संतोषजनक कतई नहीं है.इसका मूल कारण पुरूष सत्तावादी समाज है। महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज कि हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं।
इनके उत्थान के लिए
बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी।
महात्मा गाँधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था।
पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन वैगेरह , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।
लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
मुस्लिम महिलाओं के पिछडेपन की वाहिद वजह उनके बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार का न होना है। हर दौर में अनपढ़ को बेवकूफ बनाया गया है। अनपढ़ रहकर जीना कितना मुहाल है, ये अनपढ़ ही जानते हैं। पढ़े-लिखों के बीच उठने-बैठने में , उनसे सामंजस्य स्थापित करने में बहुत कठिनाई दरपेश रहती है। मुस्लिम औरतों का इस वजह्कर चौतरफा विकास नहीं हो पाता। वो हर क्षेत्र में पिछड़ जाती हैं। प्राय:कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद शरू होता है, घर-ग्रहस्ती का जंजाल। फिर तो पढ़ाई का सवाल ही नहीं। ग़लत नहीं कहा गया है कि पहली शिक्षक माँ होती है। लेकिन इन मुस्लिम औरतों कि बदकिस्मती है कि वोह चाह कर भी अपने बच्चों को क ख ग या अलिफ़ बे से पहचान नहीं करा पातीं।
परदा-प्रथा इनके अनपढ़ रहने के कारकों में अहम् है.ये कहना काफ़ी हद तक सही है.उसे घरेलु शिक्षा-दीक्षा तक सिमित कर दिया गया है.और ये शिक्षा-दीक्षा भी सभी को नसीब नहीं.पढने के लिए महिलाओं को बहार भेजना मुस्लिम अपनी तौहीन समझते हैं.और इसे धर्म-सम्मत भी मानते हैं.हर मामले में धर्म को घसीट लाना कहाँ कि अक्लमंदी है.जबकि इस्लाम के शुरूआती समय में भी औरतें घर-बहार हर क्षेत्र में सक्रीय रही हैं.इस्लाम में महिलाओं पर परदा जायज़ करार दिया तो है लेकिन इसका अर्थ कतई ये नहीं है कि चौबीस घंटे वो बुर्के में धनकी-छुपी रहें॥ बुर्का या नकाब का चलन तो बहुत बाद में आया.इस्लाम कहता है कि ऐसे लिबास न पहनो। जिससे शरीर का कोई भाग नज़र आ जाए या ऐसे चुस्त कपड़े मत पहनो जिससे बदन का आकार-रूप स्पष्ट हो अर्थात अश्लीलता न टपके। इसलिए पैगम्बर हज़रत मोहम्मद के समय औरतें सर पर छादर ओढ़ लिया करती थीं.कुरान में दर्ज है , पैगम्बर (हज़रत मोहम्मद) अपनी बीबियों, लड़कियों और औरतों से कह दो कि घर से बाहर निकलते वक्त अपने सर पर छादरें डाल लिया करें।
ईरान के चर्चित शासक इमाम खुमैनी ने भी बुर्का-प्रथा का अंत कर औरतों को चादर कि ताकीद कि थी.पैगम्बर के समय मुस्लिम औरतें जंग के मैदान तक सक्रीय थीं.लेकिन कालांतर में पुरूष-वर्चस्व ने उसे किचन तक प्रतिबंधित करने कि कोशिश कि और काफ़ी हद तक कामयाबी भी हासिल कर ली। कई मुस्लिम देश ऐसे हैं जहाँ महिलाएं हर क्षेत्र में सक्रीय हैं.लेकिन विश्व कि सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले धर्म-निरपेक्ष तथा गणतंत्र भारत में उसकी स्थिति पिंजडे में बंद परिंदे कि क्यों?
इसका जिम्मेदार मुल्ला-मौलवी और पुरूष प्रधान समाज ही नहीं स्वयं महिलाएं भी हैं जो साहस और एकजुटता का परिचय नहीं देतीं।
ज़रूरत है इक बी आपा की जिन्होंने अलीगढ में स्कूल कालेज की स्थापना की थी ।
Related Posts with Thumbnails

हमारे और ठिकाने

अंग्रेज़ी-हिन्दी

सहयोग-सूत्र

लोक का स्वर

यानी ऐसा मंच जहाँ हर उसकी आवाज़ शामिल होगी जिन्हें हम अक्सर हाशिया कहते हैं ..इस नए अग्रिग्रेटर से आज ही अपने ब्लॉग को जोड़ें.