शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

सज़ा औरत होने की



‘महिलाओं के साथ बेइज़्जती’ कइयों ने नारी के सर दोष मढ़ने की कोशिश की है। उनका कहना है कि औरतें इन दिनों खुद ही भोगवस्तु बनने को उतारू हैं। अपनी चालढाल से पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करती है। किसी हदतक इसे स्वीकार किया जा सकता है। यह मौजूदा उपभोगतावादी समय का असर है। इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों ने उनके काम पर कम उनके कमर पर ज़्यादा ध्यान दिया है। उनके डगर में तब्दीली आई भी है। अकबर इलाहाबादी ने बहुत पहले कहा था:
हमहीं से सब यह कहते हैं कि रख नीची नज़र अपनी
कोई उनसे नहीं कहता न निकलें यूं अयां होंकर


पीरधान के मामले में सभी के अपनेअपने तर्क हैं। इसी वजहकर शायर असलम सादीपुरी को भारतीय नारी की पहचान करने में दुविधा होती हैं :
मशरिक की यह देवी है कि मग़रिब की परी है
बाज़ार के नुक्कड पर जो बेपरदा खडी है


अकबर हों या असलम सिर्फ़ शहरी महिलाओं की बात करते हैं जबकि यौनाचार की अधिकांश घटनाएं गांव में घटती हैं। सारे वैश्विक परिवर्तनों के बावजूद हमारे गांव का तानाबाना अभी तक 16वीं और 17 वीं सदी का है। तस्लीमा नसरीन ने कहा था कि पैर की पाज़ेब भी पुरुष द्वारा थोपी गई जकड़न की निशानी है। औरत कहां जा रही है इसका पता पाज़ेब की घुंघरू से चल जाता था । विज्ञान यह नहीं बता पाया है कि पहले पुरुष ने जन्म लिया या औरत ने! जैसे कोई नहीं बता सकता कि पहला व्यक्ति हिंदू था या मुसलमान! सभी देवी-देवताओं या आदमहव्वा की बात करते हैं। खै़र! पहले कौन जन्मा? इस माथपच्ची में न पड़े लेकिन जब से यह पृथ्वी पर हैं इनके मध्य-नफ़रत भरे प्रेम का खेल बदस्तूर जारी है। नरनारी का रिश्ता उस अंग्रेज़ी गाने की याद दिलाता है जिसमें कहा गया है कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता मैं तुम्हें नापसंद नहीं करता लेकिन तुम्हारे बिना मैं रह नहीं सकता। पुरुष पर फ़तवा लगाने वाली चंद महिलाएं हुयीं पर पुरुष ने उसे हर कोण से आंकने-परखने की कोशिश की है। ख्यात लेखक जैनेंद्र सवाल करते हैं स्त्री क्या चाहती है? अधीनता और स्वतंत्रता। शायद एक साथ दोंनो चाहती है। ऐसा कम ही देखने आता है। जटिल प्रश्न है।बाबा तुलसीदास नारी को ताडन का अधिकारी मानते हैं . कइयों को नारी पाप का जड़ लगती है तो किसी को नर्क का द्वार। किसी के लिए जन्नत का दरवाज़ा।किसी के लिए माया है किसी के लिए छल! सीताहरण करने वाले श्री लंकेश का पुतला हर साल जलाया जाता है। महज़ प्रतीक-भर किसी मुर्दे का पुतला जलाए जाने से बेहतर होता दहेज के नाम पर जलाई जा रही अनगिनत अबलाओं को बचाना। यहां तो पुरुष ने तलाक़ दिया और हलाला करे औरत!(गर तलाक़शुदा औरत से दोबारा शादी करनी है तो औरत किसी मर्द से शादी करे और फिर वह मर्द उसे तलाक़ दे तब जाकर वह पहला पुरुष उससे शादी कर सकता है। कुरआन की कोई दलील नहीं है बावजूद यह ग़लत परंपरा जारी है)। कुछ साल पहले राजस्थान में अजूबी घटना हुई। एक पंचायत ने फैसला सुनाया कि जिस औरत के साथ बलात्कार हुआ है उसका पुरुष उक्त बलात्कारी की पत्नी के साथ बलात्कार करे!!!!
यानी कुल मिलाकर नारी ही दंड भोगे!!!! वह रे न्याय!!! अब आप सर खुजलाएं या सिर फोडें़।आज भी कई रूपकुंवर मृत पति के साथ ज़िंदा स्वाहा कर दी जाती है।भले प्रसाद उसकी श्रद्धा करें या राष्ट्रकवि मैथिलिशरण उसके अबला जीवन पर आंख सुजाने तक रोएं हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है। पुरुष की जटिलताएं अजीब हैं। वह स्वयं समस्याएं खड़ी करता है और स्वयं ही समाधान भी चाहता है। बहुत बहुत पहले अरस्तु ने कहा थाः नारी की उन्नति या अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्भर करती है। आज़ादी से पहले नारी की दशा दलितों भी बदतर थी। कालांतर में काफ़ी क़ानूनी फेरबदल हुए। उन्हें आरक्षण दिए जाने की वकालत की जा रही है। लेकिन इस वकालतबाज़ी ने अख़बार के रिक्त पन्नों के सिवाय भरने के किया क्या है?
अरविंद जैन की चर्चित पुस्तक औरत होने की सज़ा बताती है कि वे तमाम क़ानून जो स्त्रियों को सुरक्षा और सुविधा देने के नाम पर बनाए जाते हैं या प्रचारित किए जाते हैं अपने मूल रूप में मर्दों द्वारा मर्दों की सुविधा के लिए बनाए गए हैं। हंस संपादक और नामीगिरामी लेखक राजेंद्र यादव पुस्तक की भूमिका में लिखते हैः हमारे सारे परंपरागत सोच ने नारी को दो हिस्से में बांट दिया है। कमर से ऊपर की नारी और कमर से नीचे की औरत...........कमर से ऊपर की नारी महिमामयी है करुणाभरी है। सुंदरता और शील की देवी है। वह कविता है संगीत है अध्यात्म है और अमूर्त है। कमर के नीचे वह कामकंदररा है कुत्सित और अश्लील है ध्वंसकारिणी है राक्षसी है और सब मिलाकर नरक है।
आएं इस परंपरागत सोच में तब्दीली लाएं। जागृति लाओ कि विश्व का अज्ञान दूर हो सके।












9 comments:

रंजना ने कहा…

Sundar sargarbhit aur sashakt aalekh....

Bahut sahi likha hai aapne....

uthojago ने कहा…

great article revealing truth

shikha varshney ने कहा…

शहरोज़ जी ! हम तो fan होते जा रहे हैं आपके विचारों और लेखनी के..बहुत ही सटीक और सही बात बहुत तार्किक ढंग से कही है आपने ...ईश्वर आपकी लेखनी को और ताकत दे.

Rajiv ने कहा…

Sahroj bhai,aapki vichar se main purnrupen sahmat hun.Aapke is lekh ne Sahadat munto ki Kahani "GARM GOST" ki yad taja kar di hai.Purush pradhan samaj mein jo "doglapan" vidhyaman hai usse nijat pana jaruri hai.Hamara pakhandpurn chehra hi in sari buraiyon ki jad hai.Hamein kabhi Ram to Kabhi Ravan banne se bachna hoga.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है शहरोज़ जी,आपने...खासकर कोई पुरुष अगर इतनी संजीदगी से नारी की विवशताओं के ऊपर लिखता है तो सर श्रद्धा से झुक जाता है....यहाँ इलज़ाम लगाने वालों की फ़ौज ही ज्यादा है...उसका दर्द समझने वाले उँगलियों पर गिने जाने वाले भी नहीं...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

शहरोज़ भाई,
तुलसीदास ने किसी भाषण या लेख में नारी को ताडन का अधिकारी नहीं कहा है. उनके राम चरित मानस का एक पात्र अपनी गलती की क्षमा मांगते हुए अपने प्राणियों की रक्षा के नाम पर उन सब को "तारण" का अधिकारी बताता है.

वन्दना ने कहा…

bahut hi sargarbhit lekh.

alka sarwat ने कहा…

सच ही कहने के लिए हमने कलम उठाई है ,मगर सच इतना कड़वा है कि किसी को पचता ही नहीं
लंकेश को श्री कहा आपने ,इसके लिए धन्यवाद
वह वाकई अनुकरणीय है --एक नारी (बहन) के अपमान का बदला लेने के लिए दूसरी नारी का अपहरण तो किया ,किन्तु उसको महल में न लाकर वाटिका में रखा ,और विवाह के लिए मनाने की कोशिश करता रहा ,
नारी की मर्यादा को सबसे ऊपर माना
आज कौन मानता है ,बहन और गैर नारी तो ज़रा दूर की चीजें हैं अपनी माँ का ही पूरा सम्मान कौन करता है ?
अब आप ही बताएं कि जागृति किस मुद्दे पर लायी जाए

ρяєєтι ने कहा…

pahli baar padha hai aapko, aur bas mantramugdh padhte hi ja rahe hai..!
satik aur satya baat wo bhi itne acche se aapne likha hai.. gr88888

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