हाल-बेहाल बैसाखी छोड़ , खड़ा हो मुसलमान
तुष्टिकरण
भाजपा नेतृत्व की सरकार हो तो हर ओर हिन्दू-हिन्दू !!और इसके बरक्स सरकार कांग्रेसी नेतृत्व की रही तो मुसलमानों का शोर है.हमें इस तरह के शोर की मुखालिफ़त करनी चाहिए.ऐसी सारी राजनितिक क़वायद "तुष्टिकरण" के खाते में ही चली जाती है.
विभाजन
ऐसा नासूर जो रह-रह कर टीस देता रहता है.लेकिन इसका खामियाजा सबसे ज्यादा मुसलमानों को ही भुगतना पड़ा.दीगर कि आज की नस्ल इन सब से किसी तरह का लेना-देना रखना नहीं चाहती.विभाजन से पूर्व मुसलमानों की स्थिति सरकारी सेवाओं में ३३-३५ फीसदी तक आंकड़ों में थी , आज महज़ एक फीसदी पर आ टिकी है.घोर सेकुलर वामपंथी हुकूमत में ३२ सालों बाद भी पश्चिम बंगाल में ये फ़ीसद चार के आस-पास है.सरकारी आंकड़े कहते हैं कि मुसलमानों की हैसियत दलितों से भी बदतर है.यह कडुआ सच है!
इसकी कई वजहें हैं.बंटवारे के समय के भीषण दंगे.पलायन का न ख़त्म होने वाला सिलसिला.अजब कश-म-कश रही कि इधर जाएँ या उधर रहे.आज़ादी-बाद के दो दशक इसी में निकल गए.फिर ज़रा स्थिरता आई तो लोग काम-धंधे, पढाई-लिखाई में लगे कि बांग्लादेश का मामला आ टपका.आज भी लाखों आबादी अधर में लटकी है.न बांग्लादेश रखने को राज़ी है, न पाकिस्तान और न ही भारत! इनकी अलग दुखांत-कथा है.इन्हें इनके हाल पर छोड़ कर!
हम आगे बढ़ते हैं..लेकिन भारतीय मुसलमान ने फिर कोशिश की चार क़दम आगे बढाने की ..लेकिन क्रम से हुए आर्थिक ठिकाने वाले उसके शहरों के दंगे ने उसकी कमर तोड़ दी.बाबरी नाम का जिन सामने आ गया..जिसने घी का ही काम क्या..घर जलते रहे....बावजूद एक तबका अपनी जद्दोजिहद में लीन रहा...जिसका परिणाम है कि आज हर क्षेत्र में मुस्लिम नाम नज़र आने लगा है.लेकिन बुरी नज़र फिर लग गयी.ओसामा जैसे लोगों को यह पसंद न आया..उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी करतूतों में करने की रार ले ली.कुछ तो आ गए ग़ालिब की उनकी जन्नत में...बकिया को हमारी कर्मठ पुलिस ने ज़बरदस्ती आतंकवादी बनाने में कसर न छोडी.लेकिन उसकी तरक्की की रफ़्तार जारी है...उनकी ज़िद है:
नशेमन-दर-नशेमन इस क़दर तामीर करता जा
बिजली गिरते-गिरते खुद-ब-खुद बेज़ार हो जाय!
ठीक है कि यह आंकडा कोई ग्राफ नहीं बनाता..लेकिन नाउम्मीदी कुफ्र है..यह वह जानता है...गर अपनी तमाम कोशिशों और विश्वासों के साथ उसने आगे बढ़ने की ठान ली है तो ग्राफ भी अवश्य ही बढेगा.
सियासत
आरक्षण का शोशा
अब तक ज्यादा-तर हुकूमत कांग्रस की रही है.उन्नति-अवनति का दारोमदार बेहिचक उसके सर है.लेकिन उसे औचक होश आया [जैसा अब वामपंथियों को आ रहा है] कि मुसलमान-मुसलमान तो हम रटते रहे , किया क्या उनके लिए.यूँ भी उनसे यह तबक़ा नाराज़ चल रहा था. क्यों न एक आयोग बैठा दिया जाय.फैसला तो लोकसभा को करना है.जी जनाब!! तो इस तरह यूपीए ने अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समाज की स्थिति आंकने के लिए दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश रहे राजेन्द्र सच्चर की सदारत में एक कमीशन का गठन करवा दिया.कमीशन ने मुसलमानों की दुर्दशा का बेबाक वर्णन किया. जिसका लाभ लेते हुए मुर्दे पड़े मुस्लिम नेतृत्व में जान आ गयी विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा है कि विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.
इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही एक आयोग गोपाल सिंह की अध्यक्षता में बनवाया था.उसकी रपट भी दर्दनाक है.लेकिन भैया अब तक उस पर अमल क्या हुआ !!
खैर !! सच्चर रिपोर्ट को कैसे लागू किया जाय.एक और आयोग ! अब श्री रंगनाथ मिश्रा का चयन.आप भी जज रहे हैं.इन्हों ने राय दी कि सरकारी नौकरियों में पिछड़े समूहों को दिए जाने वाले २७% आरक्षण कोटे में ८% अल्पसंख्यकों को भी दिया जाय.और मुस्लिम आबादी के हिसाब से उन्हें ६% सुविधा दी जाय.तुरंत कभी दिग्गज रहे मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने मांग की "मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए, रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए."
यह सच है कि संविधान की धारा-२९ में शैक्षिक इन्तिज़ाम होने के बावजूद मुसलमान शैक्षणिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर पिछड़ता चला गया है.लेकिन क्या वास्तव में सियासत उनकी दशा सुधारना चाहती है.क्या रंगनाथ कमीशन की संस्तुतियों को पूरा करना सहज है!!जैसे सुझाव दिए गए हैं, उस से विवाद के अलावा और क्या रास्ता बचता है !क्या अनुसूचित जाति या जनजाति या पिछड़े अपनी हिस्सेदारी में इनका हिस्सा सहर्ष दे देंगे ! दूसरी जानिब महिला आरक्षण का बिल लंबित है .सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि ५०% से ज़्यादा कोटा नहीं होना चाहिए ! वहीँ रंगनाथ कमीशन इसी में से १५% कोटा अल्पसंख्यकों के लिए चाहता है.यानी न नौ मन तेल होगा, न ही राधा नाचेगी!!
भीख का प्याला नहीं चाहिए
मेरे मुस्लिम साथियों, बहनों, भाइयों, बुजुर्गों !
आप सियासत को बखूबी समझने की कोशिश कीजिये.किसी भी तरह के सरकारी आरक्षण की मुखालिफ़त कीजिये.हाँ सरकार से या रहनुमाओं से बस इतनी गुजारिश करें कि उनके साथ सौतेला बर्ताव न किया जाय, उनके बच्चों को नाहक़ पुलिस परेशान न करे.उन्हें अपने बूते पढने-लिखने दिया जाय...हर तरह की स्पर्धा में वह हिस्सा लेने की सामर्थ्य रखते हैं. बस अवसर की ज़रूरत है.बहुत कुछ करने की गर उनकी मंशा है तो बस इतना करे सरकार कि उन्हें पढने-लिखने की सहूलियतें फराहम कराये.उनके लिए स्कूल खोले जाएँ.मदरसा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा जाय.
आपको खुद आगे आना होगा... अपनी ताक़त पैदा करनी होगी..इस सिलसिले में हमवतन गैर-मुस्लिम भाइयों को भी खुले दिल-मन से साथ देना होगा.जब तक आप अपने बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे..तरक्की असंभव है.किसी भी तरह के कमीशन पर भरोसा हरगिज़ न करें इस में सिवाय वोट बैंक सियासत के इनके लिए कुछ भी धरा नहीं है.आप अच्छी तरह समझ लें कि किसी भी किस्म का आरक्षण उन्हें लाभ पहुचने वाला नहीं है.गर वह भीख के इस प्याले के चक्कर में रहे तो जो दो-चार नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होंकर सामने आ पाते हैं, वह भी मेहनत से जी चुराने लगेंगे.जानता हूँ, स्थितियां अनुकूल नहीं हैं, आप पर कई तरह के पहरे हैं..लेकिन इम्तिहान का मज़ा भी तब ही है यारो!! अंत में यही कहने का जी है:
डर गए मौजों से जो साहिल से पतथर ले गए
डूबने का शौक़ जिसको है गुहर ले जाएगा










