बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

नेताओं का मिशन :कमीशन दर कमीशन

हाल-बेहाल बैसाखी छोड़ , खड़ा हो मुसलमान


तुष्टिकरण

भाजपा नेतृत्व की सरकार हो तो हर ओर हिन्दू-हिन्दू !!और इसके बरक्स सरकार कांग्रेसी नेतृत्व की रही तो मुसलमानों  का शोर है.हमें इस तरह के शोर की मुखालिफ़त करनी चाहिए.ऐसी सारी राजनितिक क़वायद "तुष्टिकरण" के खाते में ही चली जाती है.

विभाजन

 ऐसा नासूर जो रह-रह कर टीस देता रहता है.लेकिन इसका खामियाजा सबसे ज्यादा मुसलमानों  को ही भुगतना  पड़ा.दीगर कि  आज की नस्ल इन सब से किसी तरह का लेना-देना रखना नहीं चाहती.विभाजन से पूर्व मुसलमानों की स्थिति सरकारी सेवाओं में ३३-३५ फीसदी तक आंकड़ों में थी , आज महज़ एक फीसदी पर आ टिकी है.घोर सेकुलर वामपंथी हुकूमत में ३२ सालों बाद भी पश्चिम बंगाल में ये फ़ीसद चार के आस-पास है.सरकारी आंकड़े कहते हैं कि  मुसलमानों  की हैसियत दलितों से भी बदतर है.यह कडुआ सच है!

इसकी कई वजहें हैं.बंटवारे के समय के भीषण  दंगे.पलायन का न ख़त्म होने वाला सिलसिला.अजब कश-म-कश रही कि इधर जाएँ या उधर रहे.आज़ादी-बाद के दो दशक इसी में निकल गए.फिर ज़रा स्थिरता आई तो लोग काम-धंधे, पढाई-लिखाई में लगे कि बांग्लादेश का मामला आ टपका.आज भी लाखों आबादी अधर में लटकी है.न बांग्लादेश  रखने को राज़ी है, न पाकिस्तान और न ही भारत! इनकी अलग दुखांत-कथा है.इन्हें इनके हाल पर छोड़ कर!

हम आगे बढ़ते हैं..लेकिन भारतीय मुसलमान ने फिर कोशिश की चार क़दम  आगे बढाने की ..लेकिन क्रम से हुए आर्थिक ठिकाने वाले उसके शहरों के दंगे ने उसकी कमर तोड़ दी.बाबरी नाम का जिन सामने आ गया..जिसने घी का ही काम क्या..घर जलते रहे....बावजूद एक तबका अपनी जद्दोजिहद में लीन रहा...जिसका परिणाम है कि आज हर क्षेत्र में मुस्लिम नाम नज़र आने लगा है.लेकिन बुरी नज़र फिर लग गयी.ओसामा जैसे लोगों को यह पसंद न आया..उन्होंने इसका इस्तेमाल अपनी करतूतों में करने की रार ले ली.कुछ तो आ गए  ग़ालिब की उनकी जन्नत में...बकिया को हमारी कर्मठ पुलिस ने ज़बरदस्ती आतंकवादी बनाने में कसर न छोडी.लेकिन उसकी तरक्की की रफ़्तार जारी है...उनकी ज़िद है:

नशेमन-दर-नशेमन इस क़दर तामीर करता जा
बिजली गिरते-गिरते खुद-ब-खुद बेज़ार हो जाय!


ठीक है कि यह आंकडा कोई ग्राफ नहीं बनाता..लेकिन नाउम्मीदी कुफ्र है..यह वह  जानता है...गर अपनी तमाम कोशिशों और विश्वासों के साथ उसने आगे बढ़ने की  ठान  ली है तो ग्राफ भी अवश्य ही बढेगा.

सियासत

मुसलमानों की दुर्दशा को लेकर हरेक दल ने आंसू बहाए..हरेक ने उसे गोद लेना चाहा.पुचकारने की कोशिश की..समय-समय पर कमीशन-दर-कमीशन बनाए जाते रहे..तुष्टिकरण का नारा लगानेवाली भाजपा ने भी अपने यहाँ अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बरक़रार रखा..उसकी हुकूमत में भी ऐसे आयोग काम करते रहे..इसके अलावा कई नीतियाँ कई घोषणाएं सरकारी अमले करते रहे...लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि इसका फायदा आज तक आम मुसलमान को नहीं मिला..यूँ हर एलान के वक़्त वह खुश होता रहा कि अब उसका कुछ भला अवश्य होगा..उसके दिन फिरेंगे..काया पलट होगी..उसकी भी...लेकिन यह पलट तो होती है..लेकिन उनकी जो इनके रहनुमा कहे जाते हैं..जो इनकी सियासत करते हैं..और ऐसे नामों की ज़रूरत हर सियासी पार्टियों को रहती है.यही गोटियाँ बिठाते हैं और मुस्लिम के नाम पर सेंकी  गयी रोटियाँ भी यही चुभलाते, डकारते रहते हैं..सरकार अरबों-खरबों का फंड देती है..कभी तो इसकी राशि  सरकारी खजाने में  वापस चली जाती है..तो कभी इसका इस्तेमाल दर्शित हुआ भी, तो लाभ उन्हें मिला जिनके पेट भरे ही रहते हैं..यानी ..जो नेता या आक़ा के करीबी हैं.आम धारणा है कि  बड़े ओहदे पर पहुंचे कुछ ही मुस्लिम रहनुमा ऐसे हुए हैं जिन्होंने कौम के लिए कुछ भला किया.ऐसे लोगों में मौलाना आज़ाद, रफ़ी अहमद किदवई, ज़ाकिर हुसैन और जाफ़र शरीफ़ का शुमार किया जा सकता है.

आरक्षण का शोशा

अब तक ज्यादा-तर हुकूमत कांग्रस की रही है.उन्नति-अवनति का दारोमदार बेहिचक उसके सर है.लेकिन उसे औचक  होश आया [जैसा अब वामपंथियों को आ रहा है] कि मुसलमान-मुसलमान तो हम रटते रहे , किया क्या उनके लिए.यूँ भी उनसे यह तबक़ा नाराज़ चल रहा था. क्यों न एक आयोग बैठा दिया जाय.फैसला तो लोकसभा को करना है.जी जनाब!! तो इस तरह यूपीए ने अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम समाज की स्थिति आंकने के लिए दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश रहे राजेन्द्र सच्चर की सदारत में एक कमीशन का गठन करवा दिया.कमीशन ने मुसलमानों की दुर्दशा का बेबाक वर्णन किया. जिसका लाभ लेते हुए मुर्दे पड़े मुस्लिम नेतृत्व  में जान आ गयी विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा है कि विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी अधूरी है.

इंदिरा  गांधी ने भी ऐसा ही एक आयोग गोपाल सिंह  की अध्यक्षता में बनवाया था.उसकी रपट भी दर्दनाक है.लेकिन भैया अब तक उस पर अमल क्या हुआ !!
खैर !! सच्चर रिपोर्ट को कैसे लागू किया जाय.एक और आयोग ! अब श्री रंगनाथ मिश्रा का चयन.आप भी जज रहे हैं.इन्हों ने राय दी कि सरकारी नौकरियों में पिछड़े समूहों को दिए जाने वाले २७% आरक्षण कोटे में ८% अल्पसंख्यकों को भी दिया जाय.और मुस्लिम आबादी के हिसाब से उन्हें ६% सुविधा दी जाय.तुरंत कभी दिग्गज रहे मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने मांग की  "मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए, रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए."

यह सच है कि संविधान की धारा-२९ में शैक्षिक इन्तिज़ाम होने के बावजूद मुसलमान शैक्षणिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर पिछड़ता  चला गया है.लेकिन क्या वास्तव में सियासत उनकी दशा सुधारना चाहती है.क्या रंगनाथ कमीशन की संस्तुतियों को पूरा करना सहज है!!जैसे सुझाव दिए गए हैं, उस से विवाद के अलावा और क्या रास्ता बचता है !क्या अनुसूचित जाति  या जनजाति  या पिछड़े अपनी हिस्सेदारी में इनका हिस्सा सहर्ष दे देंगे ! दूसरी जानिब महिला आरक्षण का बिल लंबित है .सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि ५०% से ज़्यादा कोटा नहीं होना चाहिए ! वहीँ रंगनाथ कमीशन इसी में से १५% कोटा अल्पसंख्यकों  के लिए चाहता है.यानी न नौ मन तेल होगा, न ही राधा नाचेगी!!


भीख का प्याला नहीं चाहिए

मेरे मुस्लिम  साथियों, बहनों, भाइयों, बुजुर्गों !

आप  सियासत को बखूबी समझने की कोशिश कीजिये.किसी भी तरह के सरकारी आरक्षण की मुखालिफ़त कीजिये.हाँ सरकार से या रहनुमाओं से बस इतनी गुजारिश करें कि उनके साथ सौतेला बर्ताव न किया जाय, उनके बच्चों को नाहक़ पुलिस परेशान न करे.उन्हें अपने बूते पढने-लिखने दिया जाय...हर तरह की स्पर्धा में वह हिस्सा लेने  की सामर्थ्य रखते हैं. बस अवसर की ज़रूरत है.बहुत कुछ करने की गर उनकी मंशा है तो बस इतना करे सरकार कि उन्हें पढने-लिखने की सहूलियतें फराहम कराये.उनके लिए स्कूल खोले जाएँ.मदरसा को आधुनिक  शिक्षा से जोड़ा जाय.
आपको खुद आगे आना होगा... अपनी ताक़त पैदा करनी होगी..इस सिलसिले में हमवतन गैर-मुस्लिम भाइयों को भी खुले दिल-मन से साथ देना होगा.जब तक आप अपने बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे..तरक्की असंभव है.किसी भी तरह के कमीशन पर भरोसा हरगिज़ न करें इस में सिवाय वोट बैंक सियासत के इनके लिए कुछ भी धरा नहीं है.आप अच्छी तरह समझ लें  कि किसी भी किस्म का आरक्षण उन्हें लाभ पहुचने वाला नहीं है.गर वह भीख के इस प्याले के चक्कर में रहे तो जो दो-चार नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होंकर सामने आ पाते हैं, वह  भी मेहनत  से जी चुराने लगेंगे.जानता हूँ, स्थितियां अनुकूल नहीं हैं, आप पर कई तरह के पहरे हैं..लेकिन इम्तिहान का मज़ा भी तब ही है यारो!!  अंत में यही कहने का जी है:

डर गए मौजों से जो साहिल से पतथर ले गए
डूबने का शौक़ जिसको है गुहर ले जाएगा 





Indian MuslimNa Main Hindu Na Main MuslimSeparatism Among Indian Muslims: The Politics of the United Provinces' Muslims, 1860-1923 (Cambridge South Asian Studies)

19 comments:

शेरघाटी ने कहा…

किसने कब सुध ली है जनाब!! मुस्लिम कौम भी अजब है....आपने कई सवाल उठाये हैं...

T.M.Zeyaul Haque ने कहा…

शहरोज़ साहब!!आप उनकी ज़बान कब से बोलने लगे...दलितों ने आज जो तरक्की की है..क्या कहना गलत होगा की आरक्षण का लाभ उनको नहीं मिला..फिर हमें क्यों नहीं???

एमाला ने कहा…

क्या हमें यकीनन reservation मिल जाएगा!! अरे जनाब पुलाओ मत पकाएं..वैसे भी..अपने नेताओं ने क्या किया हमारे लिए!

shikha varshney ने कहा…

शहरोज़ आपसे सहमत..मेरी नजर में .आरक्षण भीख है सम्मान नहीं ...चाहे किसी को भी दिया जाये..बात तो तब है जब अपने बूते पर लड़कर आगे आया जाये

talib د عا ؤ ں کا طا لب ने कहा…

"Reservation is the right of Muslims. When other backward and under privileged sections of the society are being offered the Reservations, why not the Muslims?", M.J. Akbar Prominent Journalist & Columnist askedplese read

सतीश सक्सेना ने कहा…

शहरोज भाई !
मेरा अपना विचार है कि सरकार अगर कमजोरों को मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था कर दे तो बहुत बड़ी समस्या हल हो जाएगी !
शुभकामनायें !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

शहरोज़ साहब, बहुत सही अपील की है आपने. हम सब को इस अपील पर ध्यान देना होगा, और अमल में लाने की कोशिशें भी करनी होंगीं.

राज भाटिय़ा ने कहा…

शहरोज भाई ! बहुत सुंदर लगे आप के विचार, काश यह खेल सब लोग समझते वो चाहे मुस्लिम हो या बिछडी जाति के या दलित.. अगर यह बात सब की समझ मै आ जाये तो हम सब मिल कर एक नये भारत को बना सकते है जहां हम पहले भारतीया होंगे फ़िर हिन्दू मुस्लिम.... इस सुंदर विचार के लिये आप का धन्यवाद

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

शिक्षा पर समुचित व्यय करने के बजाय सरकारें झुनझुनों की ही बात करती आई हैं आज तक...जैसी शक़्ल वैसा चांटा.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सरकारें साठ-साठ हज़ार करोड़ के कर्ज़े माफ कर सकती हैं पर शिक्षा, आयकर पर 2-3% cess के भरोसे छोड़े बैठी हैं। कोई हंसने के अलावा कर भी क्या सकता है.

KAVITA RAWAT ने कहा…

Bahut samyik sawal uthaya hai aapne. kash ye Rajnitik chale sabhi logon ki samjh mein aa jay to kitna achha hota..
Bahut achha lekh...
Bahut shubhkamnayne.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

शहरोज़ साहब ,मैं आप से १०० फ़ीसदी इत्तेफ़ाक़ रख्ती हूं इस मामले में कि आरक्षण एक भीख है चाहे वो मुसलमान के लिये हो या महिलाओं के लिये ,हर क्षेत्र में ये साबित भी हो चुका है ,जहां तक नेताओं का सवाल है मुझे सिर्फ़ एक बात कहनी है
"वो भलाई की करें बात तो कैसे हो यक़ीं
जो किताबों की जगह हम को असा देते हैं "
मैं किसी भी नुक़सान को एक हिन्दुस्तानी का ही नुक़्सान मानती हूं

राकेश पाठक ने कहा…

बहुत ही सामयिक लेख.विचार सभी करें.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

मैं आपके ब्लाग पर कई दफा इसलिये नहीं जा पाया कि मेरे स्लो इंटरनेट कनेक्शन के कारण और आपके ब्लाग पर लगे गैजेट्स के कारण पेज खुल ही नहीं सका, अब नया कनेक्शन मिल गया. और भी कई ब्लाग जहां नहीं जा पाता था, अब जा सकूंगा. आपने बहुत ज्वलन्त, सम-सामयिक और चिन्तनीय मुद्दा उठाया है. बहुत अच्छा लेख, जो लोगों को आत्मचिंतन पर मजबूर करेगा. मैं फिर वही कहूंगा कि आरक्षण से एक और नई तरह के आधुनिक सवर्ण पैदा कर दिये जाते हैं. जिन्हें वास्तव में हक मिलना चाहिये, पहले उनके पेट पालने का इन्तजाम तो हो. मुस्लिमों के साथ बड़ी समस्या लगभग यही है, वे अपनी आबादी पर काबू के नाम पर भड़क जाते हैं, मैंने खुद ये अंतर देखा है, कि अब दलित भी अपने बच्चों की संख्या को लेकर फिक्रमन्द है. लेकिन मुस्लिम अभी इससे दूर हैं. मैंने तेईस लोगों को दो कमरे के मकान में शिफ्टों में सोते देखा है.

Nikhil Srivastava ने कहा…

आपकी विवेचना काफी सही है. लोगों को शगूफे के पीछे की नीयत भी देखनी चाहिए. आर्थिक आधार पर आरक्षण हों तो ही बेहतर रहेगा. हट जाये तो और भी बेहतर हो. इससे हमें सोचने का मौका तो मिलेगा कि आखिर हम क्यूँ तरक्की नहीं कर पा रहे हैं. थोड़ी दिक्कत जरूर होगी पर बेहतर भविष्य के लिए शायद यही सही है. फिर वो अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक. गाँव गाँव में पढाई की बेहतर सुविधा दी जाये तो ज्यादा बेहतर होगा. उसकी मॉनिटरिंग हो अच्छे से. घालमेल होगा तो हमेशा गरीब मरेगा. कटु है पर सत्य है. कितना भी चीख-चिल्ला लीजिए. राजनीति तो धर्म और जाति का फायदा उठाना ही चाहती है. राजनीती से कभी देश का भला नहीं है.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सब धर्मों को एकदम से मिटाया जाये
मानव धर्म को जीवन में अपनाया जाये
शिक्षा के प्रसार के लिए जुट जाएं सभी
कमीशन कितने भी हों लुट जाएंगे अभी।

श्रद्धा जैन ने कहा…

ek bahut shshakt lekh
kisko kya banna hai use khud hi decide karna hoga
aur aarakshan agar zarurat hai upar aane ke liye jeevan yaapan ke liye to burayi nahi hai
kahi n kahi bhedbhaav se peedit logon ka bhala hoga

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप को ओर आप्के परिवार को ईद-मिलादुन-नबी मुबारक वाद जी

मनुज ने कहा…

@शहरोज़ महोदय..
आपका लेख पढ़कर पहली बार अहसास हुआ कि मुसलमान भी इंसान होते हैं, और उनकी जेहाद के अलावा भी ज़रूरते होती हैं .आप लिखते हैं कि देश के दंगो में मुसलमानों ने बहुत कुछ खोया.
दंगे सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं हुए थे, दंगे हिन्दुओ के लिए भी उतने ही दुखदायी थे जितने मुसलमानों के लिए.

भारत के मुसलमान बहुत भाग्यशाली हैं कि वे भारत में अल्पसंख्यक हैं, अगर वो पाकिस्तान या बंगलादेश के अल्पसंख्यक होते...(इस बारे में तसलीमा नसरीन ने लज्जा में काफी कुछ कह दिया है, रिपीट करने की ज़रुरत नहीं है )
इसे देखें--> (http://blog.sureshchiplunkar.com/2008/12/how-muslim-could-be-secular.html)
कश्मीर घाटी को हिन्दुओ से खाली कर दिया गया और लगभग १० लाख हिन्दू अपने ही देश में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर कर दिए गए; तो क्या कश्मीरी हिन्दू जीना भूल गए? आज भी आप देख सकते हैं कि भारत की अग्रणी शख्शीयतों में कई कश्मीरी हिन्दू हैं.
और तार्किक ढंग से अन्वेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि मुसलमानों में भी कई मजबूत अपवाद शखशीयतें मोजूद हैं जिनकी सफलता का राज सच्चर रिपोर्ट में नहीं है...
.अगर आंकड़ो की भाषा प्रयोग की जाए, तो बहुत कुछ शीशे की तरह साफ़ हो जाएगा..देश में भ्रष्टाचार है, अनाचार है , कदाचार है, भाई-भतीजावाद है...लोग भूखे मरते है...अन्नदाता स्वयं के लायक अन्न नहीं बचा पाते और आत्महंता हो जाते हैं...लेकिन ये सब सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं हैं; ये समस्याए इस देश के हर नागरिक की राह का काँटा हैं ...इस बारे में और क्या कहूं...इस विषय पर लाखो टन कागज़ काला किया जा चुका है और हजारों गी. बी. इन्टरनेट बेंडविड्थ खर्च की जा चुकी है...

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