शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

बच्चे कभी दूध की बोतल नहीं पीते

फिर बच्चे चर्चा में हैं । एक ताज़ा सर्वे कहता है कि देश में 52 फीसदी बच्चे यौन दुर्व्यवहार   के शिकार होते हैं। 14 साला बच्ची से यौन अनाचार करने वाले पुलिस के एक वरिष्ठ अफ़सर की तस्वीर दांत निपोरते हुए छपती है। उसे महज़ छह माह की सज़ा मिली है और तुर्रा यह कि उसे ज़मानत भी मिल गयी। इस अफ़सर ने उदीयमान टेनिस खिलाड़ी के साथ यौन उत्पीड़न करने की कायरपूर्ण हरकत की थी। उसे इंसाफ़ मिलना तो दूर पुलिस ने उसे और उसके घरवालों को  ही धमकी देनी शुरू कर दी, जिसका कुपरिणाम यह हुआ कि उस किशोरी ने आत्महत्या कर ली। यह पढ़े लिखे घर का किस्सा है, जिसे न्याय नहीं मिला। उन बच्चों की दशा तो और भी बदतर है, जो गली कूचे में कबाड़ बीनते दिखलाई पड़ते हैं। किसी ढाबा में बरतन मांजते हैं। स्टेशन पर बूट पालिश करते हैं।

बचपन से यह फ़िक़रा सुनते आए हैं कि बच्चे देश के कर्णधार होते हैं, आज के यही बच्चे कल मुल्क की बागडोर संभालेंगे। पूरी तरह सच लगने वाली ऐसी कई उक्तियां जनमानस में सदियों से सत्य की शक्ल में दर्ज है। लेकिन कौन से बच्चे?फुटपाथ पर कबाड़ बीनने वाले या झुग्गियों में गोली बाटी खेलते अर्धनग्न बच्चे या 30से 40 हज़ार प्रतिमाह फ़ीस देकर कान्वेंट में पढ़ने वाले बच्चे? भावी कर्णधारों की श्रेणी में दाने दाने और अक्षर अक्षर को मोहताज बच्चों की गिनती है? या आलीशान कोठियों में संचालित पब्लिक स्कूलों में हाय हैलो के माहौल में जीते पलते बच्चों की? ज़ाहिर है देश की बागडोर भविष्य में थामने और संचालित करने का सौभाग्य फुटपाथी बच्चों को क़तइ नहीे मिल सकता! थ्कसी मिलिनियर डाग जैसे यथार्थ चमत्कार की बात अलग है। समाजिक ढांचे का यह ताना बाना वर्षो से चला आ रहा है।

कभी दिल से उतरकर यह शेर कागज़ पर उतरा था:

सो जाते हैं फुटपाथ पर बस यूंही दुबककर
यह बच्चे कभी दूध की बोतल नहीं पीते


ऐसे बच्चे आप को राजधानी दिल्ली के बस अड्डे और रेल्वे स्टेश्नों पर खूब दिखाई दे जाएंगे। यहां इनका ऐसा शोषण होता है कि भावुक ह्रदय मन कांप उठे!कई बच्चे गरीबी और मां बाप की डांट फटकार से तंग आकर घर से इसलिए भाग आए थे कि उन्हें मंक्ति मिल जाएगी। पर वह दूसरे दुष्चक्र में आ फंसे। यहां उन्हे नसीब हुई पुलिस की गालियां, भूखए शोषण और अप्राकृतिक यौनाचार करने वालों की एक लंबी क़तार। इन स्थितियों में लड़की की! आप कल्पना कर सकते हैं । नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर ऐसे बच्चों की तादाद सबसे ज़्यादा है। यहां हर क्षेत्र अंचल के बच्चे? हर उम्र के मिल जाते हैं। आपसी दुख दर्द साझा करने के लिए यह जाति, धर्म  और क्षेत्रियता के बंधनों से मुक्त होते हैं। ज़्यादातर बच्चे कबाड़ बीनने का काम करते हैं। कबाड़ी इनसे बस, कार और रेल के पुरज़े तक चुराने का काम लेते हैं। इसके एवज़ इन्हें 15 से 20 रु रोज़ाना मिलता है। कभी इन मासूमों को भूख से बिलखना भी पड़ता है। यह भी ब्याज़ पर पैसे लेते हैं। और वापसी की कथा बहुत ही दर्दनाक होती है। पुलिस के रोज़ के डंडे खना अब इनकी आदत सी हो चुकी है।

इन से ज़रा बेहतर स्थिति ढाबा या होटलों में बर्तन मांज रहे बच्चों की है। काम के घंटे यहां भी तय नहीं! लेकिन  पगार इन्हें समय पर ज़रूर मिल जाती है। कहते हैं, पेट तो डांगर भी भर लेता है। कमोबेश यही मनोदशा इन बच्चों की है। लेकिन रोज़्- रोज़ की मार- कुटाई और अप्राकृतिक यौन शोषण से यहाँ  भी छुटकार नहीं। घरेलू नौकरों की दशा और भी बदतर है। एक मिसाल का तो मैं महिनों गवाह रहा हूं। दक्षिण दिल्ली में स्थित एक पाश कही जाने वाली कालोनी में कभी मज़दूरों के अधिकारों के लिए  लड़ाई लड़ने वाली सक्रिय एक्टिविस्ट और एक पत्रिका की संपादक कवयित्री साहित्कार रहती हैं। पत्रिका का मैं सहायक संपादक था। रहता वहीँ  था। देर रात तक वह जगतीं और हमें भी जगना पड़ता। कोफ़्त होती जब वह रात बारह बजे सारे काम निबटा कर सो रहे 12 साला किशोर को चाय बनाने के लिए उठाने लगतीं। हमारे कहने पर उनका जवाब होताः अरे खाली खाता रहता है और सोता है। जबकि उसकी दिनचर्या के हम साक्ष्य थे। एक दिन इसी मुद्दे को लेकर हमारी बहस हो गयी।

सरकार ने बाल सुधार गृह बनवाए तो हैं। यहां दिल्ली गेट स्थित भी एक है। लेकिन यहां से भी अक्सर बच्चे भाग जाते है। फ़िलवक्त यहां लगभग दो सौ के आस पास बच्चे हैं, लेकिन हरेक के मन में यहां से मुक्ति की अकांक्षा है। सरकार तो इनके बेहतर खान -पान, रहन -सहन और कपड़े- लत्ते तथा शिक्षा -दीक्षा का वायदा करती है। लेकिन ज़मीनी सच यह कहता है कि इन्हें यहां भी आध पेट खाना कपड़े के नाम पर जर्जर वर्दी और बड़े बच्चे द्वारा अप्राकृतिक यौनाचार मिलता है।






5 comments:

vinay ने कहा…

इन बच्चों की दुर्दशा देख कर मन सिहर जाता है ।

Udan Tashtari ने कहा…

उफ्फ!!! अफसोसजनक!

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत देखा है ओर मन व्यथि भी होता है, बहुत दर्द नाक

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Kaash ham kuchh karne ki position men hote.

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क्या आपने लोहे को तैरते देखा है?
पुरुषों के श्रेष्ठता के 'जींस' से कैसे निपटे नारी?

श्रद्धा जैन ने कहा…

man tadap uthta hai itni nirdayta dekh kar rooh bhi kaanp jaati hai
koun kahta hai ki insaan insaan ko nahi kahata aajkal bas yahi ho rahi hai

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