सोमवार, 16 जून 2008

मेरे न रहने पर

मेरे न रहने पर
खिड़की पर चाँद अटक जायेगा
कमरे में रौशनी छिटका करेगी
कुछ न कुछ चमक रहा होगा
मेज़ पर बिखरे पन्ने
फर्श पर खिलोने ।


पूरी कविता पढने के लिए क्लिक करें :

2 comments:

Amit K. Sagar ने कहा…

खूबसूरत और भाव में लिपटी रचना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. दम है. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

शहरोज जी !आज आपकी कविता 'मेरे न रहने 'पर पढ़ी और गहरे डूबता गया !भगवान आपको लम्बी उम्र दे कम से कम हमसे तो बहुत लम्बी ताकि 'मेरे न रहने पर 'के यथार्थ से रूबरू न हो सकूं !बात तो निराशा की है पर लगती सत्य है !लेकिन इससे अधिक मुझे उस शहरोज़ का भरोसा है जो बकलम ख़ुद सच्चे कलाकार की तरह इस धारणा का खंडन करता है की दुनिया में कोई संवेदनशील नहीं बचा !इतने गहरे लेखन के लिए बधाई !

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