रविवार, 27 जुलाई 2008

इस्लाम की व्याख्या !



आतंक के ग्रास बने तमाम मासूमों के नाम

वक़्त फ़ज्र का
मुअज़्ज़िन की सदा
अस्सलातो-खैरुन-मिनन-नोम

और तुम्हारा इस्लामिक बम
आ गिरता है

नमाज़ी-समेत
मस्जिद
हो जाती है
शहीद।

ऐ ! पाक हुक्मराँ
व्याख्या करो
अपने
इस्लाम की।

(प्रात:काल की नमाज़,अज़ान पुकारनेवाला, नमाज़ नींद से बेहतर है, पवित्र और पाकिस्तान )

13 comments:

Mired Mirage ने कहा…

अपने दुख के साथ साथ आपके दुख को भी समझ सकती हूँ। मेरी आज की पोस्ट आतंकवादी क्या चाहते हैं पढ़िए, शायद सहमत हों।
घुघूती बासूती

Smart Indian ने कहा…

कविता अच्छी है शहरोज़ जी!
आपकी कविता पिछले दो दिनों में जो हुआ उसके माकूल है मगर सवाल सब अधूरे ही हैं. हमारे देशावासीओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी है - पड़ोसी तानाशाहों की नहीं. इसी तरह हमारे यहाँ दहशतगर्दी करने वालों के लिए कड़े कानून बनाने और पकड़े गए आतंकवादिओं को सज़ा-ऐ-मौत देने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है. वक्त है पडौस का रोना छोड़कर अपने गरेबान में झाँकने का और अपना दिल कडा कर के अपने बिगड़े बच्चों को उनकी करनी की भरपूर सज़ा देने का.

ईश्वर शहीदों की आत्मा को शान्ति दे - नेताओं को इच्छाशक्ति दे और हैवानों को उनके गुनाहों की पूरी सज़ा दे.

परमजीत बाली ने कहा…

शहरोज़ जी,बहुत ही मार्मिक! बहुत ही बेहतरीन...इतनें कम शब्दों में इतनी बड़ी बात बहुत गहराई से कहा।

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

एकदम सच्ची और कथित जेहादियों को आइना दिखाने वाली रचना!
काश! इन कथित जेहादियों के बहकावे में आने वाले हमारे नौजवान भी ये आइना देख सकें!
सह्राज़ भाई का शुक्रिया कि उनके पास चाँद ऐसे आईने हैं और इस बात के लिए उन्हें दाद देना चाहूँगा कि उन्होंने हम सबको ये आईना दिखाने कि हिम्मत की

pallavi trivedi ने कहा…

कविता आपके दिल के हाल को बखूबी बयान करती हैं....सभी लोग शान्ति और अमन ही चाहते हैं!बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहा आप खूब जानते हैं!

abhishek ने कहा…

घर का भेदी लंका ढाए.हमारा ही सामाजिक परिदृश्य इसके लिए जिम्मेदार है.क्यों नहीं हम अपने लोगो को सही शिक्षा देते जिससे वो न भटके. कोई भी बाहरी कभी कुछ नहीं कर सकता अगर हमारा घर सही हो

सतीश सक्सेना ने कहा…

शहरोज भाई !
बहुत खूबसूरत लिखा है आपने ! हिन्दी अनुवाद साथ दे रहे हैं, इससे बहुत लोगों का भला होगा !
मुबारक हो

महामंत्री-तस्लीम ने कहा…

samvednaaon ko choone wali rachna hai. Badhayi.

श्रद्धा जैन ने कहा…

bhaut ghari rachna
pata nahi kya chaht ehain ye log
kyu begunaahon ko saza

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

शहरोज़ जी ! धर्म तो भीतर की यात्रा है ,हमारा स्वार्थ ही उसे बाहर खींचकर अपने अनुसार तोड़ता मरोड़ता रहता है !आपकी भावनाएं और ललकार प्रशंसनीय हैं !

vipinkizindagi ने कहा…

कम शब्दों में.........बहुत गहराई

Lovely kumari ने कहा…

mujhe to dusare logo ke bewajh marana samajh hi nahi aata.khair kavita achchhi thi badhayi swikaren.

शाहिद समर ने कहा…

bhai, shahroz
aapka rachana sansar adbhut hai. kafi khoobsurat hai aur apni baat her hal me nirbhayata se kahane ka huner aapse unko seekh deta hai jo hosala dikhane me samne nahin aate.
shahid samar

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