बुधवार, 2 जुलाई 2008

खड्गसिंह

बस्स धुन में चढ़ते जाना
पहाड़ों और पेड़ों पर
इससे बिल्कुल अंजान कि
वहाँ काँटे और ज़हरीले जीव भी हैं
बचपन की आदतें कहीं छूटती भी हैं ।


हम सब कुछ भला-भला सा समझने के
आदीजो ठैरे
जानती तो थी कि वह कई अस्तबलों में जाता है
अब उबकाई आती है कहते कि
वह बिल्कुल पिता की तरह था
हर संकट में साथ देने को तत्पर
उसकी डांट भी कभी बुरी नहीं लगी






सुलतान पर उसकी दृष्टि तो थी
पर मैंने हमेशा इसे वात्सल्य समझा


उस शाम
ज़रूरी निर्देश समझाते-समझाते
उसके हाथ पीठ पर रेंगे
तो उसकी कुटिल मुस्कान की हिंसा
मेरी आंखों से काफ़ी दूर थी कि
अचानक
उसकी पकड़ मज़बूत हो गई



सुलतान को मुझसे ज़बरदस्ती झपटने के
प्रतिकार में मैं बुक्का मार दहाड़ी




वह आज का खड्गसिंह है माँ
देर तक मुझे समझाता रहा और
नए-नए प्रलोभनों की साजिशें बुनता रहा




माँ , मुझे लोग सहनशील कहते हैं
उन्हें पता है इसमें छुपी यातनाओं का



मदद को बढ़ा अब हर हाथ सर्प-सा लहराता है
अपनत्व से निहारती निगाहें चिंगारियां उगलती हैं




हे प्रभु! मुझे क्षमा करना
मैं ने सभी संपर्क ख़त्म कर लिए हैं
पर माँ , हर कोई खड्गसिंह तो नहीं होता !

मुझे गर्भ में छुपा लो माँ
बहुत-बहुत डर लगता है




(रेखांकन चार साला साहबजादे आयेश लबीब का
जो अक्सर वह कंप्यूटर पर बैठ कर किया करते हैं )

8 comments:

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर्! आपके साहबजादे और् चित्र् बनायें ऐसे ही।

रंजना ने कहा…

अपना ब्लॉग लिंक दे आपने हमपर जो उपकार किया, उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..
आपकी यह रचना झकझोर गई.यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे शायद ही कोई किशोरी बच पाती है.और सचमुच ही उसकी मनःस्थिति इसी तरह की होती है. बहुत ही प्रभावी ढंग से आपने बयां किया है.बधाई.

Pragya ने कहा…

bahut khoob...
aaj ki hakikat bayaan ki hai...
aur rekhankan ke to kya kahane... sahabjade ko badhaiii :)

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

शहरोज़ जी,

नही समझ पाता कि, अनपढ़ ज्यादा समझदार थे, या फिर आज के पढ़े - लिखे लोग.
आज सामाजिक सम्बन्ध, नैतिकता, संस्कार ज्यों त्याज्य से हो गई है. इसी का परिणाम है कि सर्वत्र भय व्याप्त है और गर्भ से बाहर के नौजवान/ नव युवती भी स्वयं को पुनः: गर्भ में ही सुरक्षित पाने का एक मात्र स्थान समझाने लगा है.
समाज के पढ़े-लिखे लोगों की हरकतों से विश्वास किस कदर अविश्वास में परिणित हो चुका है कि खड़गसिंह को भी अपनी पहचान बताने के लिए लंका नगरी गए हनुमान के तरह कोई पहचान चिन्ह प्रस्तुत करना ही पड़ेगा , पर शायद तब सीता ने तो फिर भी विश्वास कर लिया था पर आज शायद पहचान चिन्ह प्रस्तुति भी संदेह से परे नही रह गई है.
अपनी रचना द्वारा निश्चय ही आपने एक प्रश्न चिन्ह तो छोड़ा ही है.

चन्द्र मोहन गुप्त

श्रद्धा जैन ने कहा…

hmmmmmmmm

aapne jo baat kahe di hai
wo kala roop hai har chehre ke peeche chupa hua ghinona chehra
matlabi chehra
halaki ladhkiyon ko ye shakti god gifted hai ki wo samjh sake
aise bhediyon se bach sake

mujhe nafrat hai un logon se jinhe ladhki sirf isi kaam ke liye dikhayi deti hai
aur har ladhki ko wo isi nazar se dekhte hain
aise log bimaar hai unhe ilaaz ki zarurat hai

aapki rachna bahut achhi lagi
aur achha laga aapka is tarah is taraf sochna

अनुराग ने कहा…

हे प्रभु! मुझे क्षमा करना
मैं ने सभी संपर्क ख़त्म कर लिए हैं
पर माँ , हर कोई खड्गसिंह तो नहीं होता !
bahut khoob andaje byan aor jis tarah se aapne potray kiya hai...
likhte rahe....

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

मदद को बढ़ा अब हर हाथ सर्प-सा लहराता है
अपनत्व से निहारती निगाहें चिंगारियां उगलती हैं

शहरोज़ भाई
पूरी कविता यथार्थ का आइना बन पड़ी है
अपने ही ऐसे वीभत्स चेहरों को देख कर एक ठंडी आह ही निकल पाती है
आपकी कलम ऐसे ही आइना दिखाती रहे
दुआगो हूँ

सतीश सक्सेना ने कहा…

अगर आप आयेश के बारे में चर्चा न करते तो मैं इसे JNU के किसी चित्रकार की कलाकृति मान कर वाह वाह करता शहरोज भाई !

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